प्रधानमंत्री की अर्थपूर्ण भारत–यात्रा : डॉ. श्वेता दीप्ति
डॉ. श्वेता दीप्ति (हिमालिनी मासिक, अप्रिल २०२२ अंक से)
प्रधानमंत्री शेरबहादुर की भारत–यात्रा ने ठंडे होते रिश्तों में एक बार फिर से गर्माहट लाने का काम किया है । देउबा ने अपने पिछले चार कार्यकालों में प्रधानमंत्री के रूप में हर बार दिल्ली का दौरा किया था । वर्तमान कार्यकाल की यह पहली भारत यात्रा थी । हर बार की तरह इस बार भी प्रधानमंत्री की भारत यात्रा पर विश्लेषकों की नजरें टिकी हुई थीं । कई एजेंडा, कई मुद्दों को लेकर राजनीतिक गलियारे में सरगर्मी बनी हुई थी ।
प्रधानमंत्री का जिस गर्मजोशी से भारत में स्वागत हुआ उसने यह जता दिया है कि भारत भी नेपाल के साथ ‘पड़ोसी पहले’ वाली नीति के साथ रिश्तों को बनाए रखने में दिलचस्पी रखता है । इसमें कोई शक नहीं है कि नेपाल के हर सुख–दुख में भारत की ओर से सहयोग का पहला हाथ बढ़ा है जो यह जताता रहा है कि भारत का नेपाल से सिर्फ एक पड़ोसी राष्ट्र के साथ राजनीतिक सम्बन्ध कायम रखने वाला रिश्ता नहीं है बल्कि कई एक आयामों से आबद्ध रिश्ता है ।
प्रधानमंत्री देउवा की यात्रा के सम्बन्ध में भारत ने कहा कि ‘प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा की भारत यात्रा ने द्विपक्षीय संबंधों में नए आयाम जोड़े हैं । नेपाल के साथ भारत का संबंध उसकी ‘पड़ोसी पहले’ नीति के मुख्य स्तंभों में से एक है । नेपाल के प्रधान मंत्री की भारत यात्रा दोनों देशों के बीच दोस्ती और सहयोग के पारंपरिक और सदियों पुराने संबंधों को और मजबूत करने में योगदान देगी ।’
यात्रा की उपलब्धियाँ

प्रधानमंत्री की इस यात्रा में, दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच व्यापक और फलदायक वार्ता ने उच्च–स्तरीय दिशा प्रदान की और कई क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग के लिए एक मजबूत एजेंडे को आकार दिया है । विशेष रूप से ऊर्जा और कनेक्टिविटी से संबंधित विषयों पर अधिक फोकस किया गया । भारत यात्रा के दौरान, प्रधान मंत्री देउबा और भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने आर्थिक और व्यापार एजेंडे पर विचारों का आदान–प्रदान किया और नेपाल और भारत के बीच व्यापार, निवेश और कनेक्टिविटी संबंधों को और तेज करने और सुविधाजनक बनाने के लिए कार्रवाई तेज करने का निर्णय लिया ।
प्रेस बयान में यह कहा गया कि, दोनों प्रधानमंत्रियों ने भारत से नेपाल को उर्वरकों की लंबी अवधि की आपूर्ति की सुविधा के लिए जी–टू–जी समझौते के हालिया निष्कर्ष और भारत से पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति के लिए पंचवर्षीय सामान्य आपूर्ति समझौते के नवीनीकरण का स्वागत किया है ।
वित्तीय क्षेत्र में एक और पहल की गई ‘रुपे कार्ड’ को नेपाल में जारी करने का निर्णय कर के । नेपाल में भारतीय ‘रुपे कार्ड’ के उपयोग की शुरुआत दोनों प्रधानमंत्रियों ने संयुक्त रूप से की थी । निश्चय ही यह वित्तीय संपर्क में सहयोग के लिए नए रास्ते खोलेगा, और उम्मीद है कि द्विपक्षीय पर्यटक प्रवाह को सुगम बनाने के साथ–साथ भारत और नेपाल में लोगों से लोगों के बीच संबंधों को और मजबूत करेगा ।
दोनों प्रधानमंत्रियों ने ऊर्जा क्षेत्र में पारस्परिक रूप से लाभकारी सहयोग के अभूतपूर्व अवसरों पर चर्चा की । इस संबंध में, विद्युत क्षेत्र के सहयोग पर एक संयुक्त विजन स्टेटमेंट, जो साझा प्रतिबद्धता के साथ–साथ बिजली उत्पादन, पारेषण और व्यापार पर मुख्यता के साथ चर्चा की गई । उन्होंने संयुक्त रूप से ९० किमी लंबी १३२ केवीडीसी सोलू कॉरिडोर ट्रांसमिशन लाइन और भारत द्वारा विस्तारित क्रेडिट लाइन के तहत निर्मित सबस्टेशन का उद्घाटन किया । दोनों पक्षों ने विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) को जल्द से जल्द अंतिम रूप देने के साथ शुरू होने वाली पंचेश्वर बहुउद्देशीय परियोजना के कार्यान्वयन में तेजी लाने पर सहमति व्यक्त की । इसी तरह, दोनों नेताओं ने व्यापक और मजबूत द्विपक्षीय विकास साझेदारी पर चर्चा की । उन्होंने नेपाल में भारतीय परियोजनाओं के कार्यान्वयन में प्रगति की समीक्षा की, जिसमें (ए) जयनगर–कुर्था–बिजलपुर–बरदीबास (बी) जोगबनी–विराटनगर (सी) रक्सौल–काठमांडू को जोड़ने वाली सीमा–पार रेल–लिंक परियोजनाएं शामिल हैं । जयनगर–कुर्था खंड में भारत और नेपाल को जोड़ने वाली पहली ब्रॉड–गेज यात्री रेल सेवा को यात्रा के दौरान दोनों प्रधानमंत्रियों ने झंडी दिखाकर रवाना किया । यह निश्चय ही आर्थिक रिश्तों में मील का पत्थर साबित होगा । साथ ही नेपाल ने महेंद्रनगर, नेपालगंज और जनकपुर के माध्यम से हवाई मार्ग प्रदान करने और भैरहवा में गौतम बुद्ध अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के संचालन के लिए सहायता का अनुरोध किया ।
जयनगर–कुर्था रेल लिंक भारत सरकार की अनुदान सहायता से बनाया गया है । इसके अलावा, भारतीय प्रधान मंत्री मोदी ने बाधाओं को हल करने में नेपाल सरकार को पूर्ण समर्थन का आश्वासन देने और काभ्रेपलान चौक में राष्ट्रीय पुलिस अकादमी, नेपालगंज और भैरहवा में एकीकृत चेक पोस्ट सहित सभी भारत–सहायता प्राप्त परियोजनाओं को समयबद्ध पूरा करने में मदद करने के लिए प्रधान मंत्री देउबा को धन्यवाद दिया ।
साथ ही रामायण सर्किट के तहत परियोजनाओं पर भी वृहत चर्चा हुई जो दोनों ही देशों के लिए पर्यटकीय क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि होगी । प्रधान मंत्री देउबा के साथ यह भी साझा किया गया कि भारत के ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ समारोह के तहत, भारत इस वर्ष नेपाल में ७५ विकास परियोजनाओं का उद्घाटन करेगा । प्रधान मंत्री देउबा ने भारत को पर्याप्त मात्रा में बिजली के निर्यात के लिए नेपाल विद्युत प्राधिकरण को दी गई नई मंजूरी की सराहना की, और नेपाल की जलविद्युत विकास परियोजनाओं में भारतीय कंपनियों की अधिक भागीदारी को आमंत्रित किया । नेपाल में ९०० मेगावाट अरुण–क्ष्क्ष्क्ष् जलविद्युत परियोजना में हुई प्रगति की भी समीक्षा की गई । भारतीय प्रधान मंत्री मोदी ने १ अप्रैल २०२२ को नेपाल के साथ अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) में शामिल होने के नेपाल के फैसले का स्वागत किया, नेपाल आईएसए के फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर करने वाला १०५वां देश बन गया है ।
भारत यात्रा: चीन की चिंता और पाकिस्तान की परेशानी
मिलेनियम अनुदान को नेपाल में स्वीकृति मिलने के बाद से ही चीन की चिंता चरम सीमा पर बढ़ती दिखाई दे रही है । विगत कुछ वर्षों में चीन से नेपाल की समीपता और अप्रत्यक्ष रूप से नेपाल की राजनीति में दखलअंदाजी ने भारत से नेपाल के रिश्तों पर प्रभाव डाला था । तल्खियाँ भी खुल कर सामने आईं थीं । प्रधानमंत्री की भारत–यात्रा ने जहाँ भारत से रिश्तों की इस कड़वाहट को कम करने का काम किया है, वहीं चीन की पेशानी पर पसीने लाने का भी काम किया है । अमेरिकन अनुदान स्वीकृत होने के साथ ही चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने नेपाल की यात्रा की । उस यात्रा में चीन से नेपाल ने स्पष्ट कहा कि हमें ऋण नहीं अनुदान चाहिए । चीन की ऋण नीति का विश्व पर क्या असर हो रहा है यह भी जगजाहिर है । ऐसे में नेपाल का यह निर्णय निश्चय ही स्वागत योग्य है । तथ्य यह है कि चीन की तमाम कोशिशों के बाद भी बेल्ट ऐंड रोड प्रोजेक्ट के तहत नेपाल ने कोई भी करार नहीं किया और काठमांडू से वांग यी खाली हाथ ही लौट गए । नेपाल के इस फैसले को दक्षिण एशिया के अन्य देशों के मुकाबले समझदारी भरा ही कहा जाएगा । पाकिस्तान और श्रीलंका में आज जो अस्थिरता और आर्थिक संकट के हालात हैं । उसकी एक वजह चीन को भी माना जा रहा है ।
पाकिस्तान के ऊपर जो कुल कर्ज है, उसमें १० फीसदी हिस्सा चीन का ही है । आज इमरान खान चीन के बेहद करीबी हैं और सेना अमेरिका के सुर में बात करती दिख रही है । नतीजा यह है कि देश में राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति बन गई है और उनकी कुर्सी खतरे में आ गई है । श्रीलंका की स्थिति तो बेहद विपरीत है, जहां उसके पास पेट्रोल और डीजल खरीदने के लिए विदेशी मुद्रा नहीं है और बत्ती गुल है । महिंदा राजपक्षे की सरकार गहरे संकट के दौर से गुजर रही है । कहा जा रहा है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर डिवेलपमेंट के लिए उन्होंने चीन से ऊंची ब्याज दर पर जो लोन लिए थे, उनके चलते भी देश की कमर टूट गई है । फिलहाल देश भर में लॉकडाउन की स्थिति है ताकि लोगों को आंदोलन करने से रोका जा सके, जो सरकार के खिलाफ गुस्से में हैं ।
पाकिस्तान और श्रीलंका की यह स्थिति दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया के अन्य देशों के लिए भी सबक की तरह है । सभी जानते हैं कि नेपाल, मालदीव और बांग्लादेश पर भी चीन बेल्ट ऐंड रोड प्रोजेक्ट से जुड़ने का दबाव बनाता रहा है । और नेपाल चीन के प्रभाव में आ भी गया था क्योंकि माओवादी विचारधारा के जरिए चीन नेपाल में घुसपैठ कर चुका था । जहाँ तक श्रलिंका का सवाल है तो श्रीलंका चीन की वजह से बर्बादी की बात समझता दिख रहा है, और अपनी वर्तमान परिस्थिति में सहयोग की अपेक्षा उसी भारत से कर रहा है जिसके साथ के रिश्ते को उसने हाशिए पर रखा हुआ था ।
लेकिन पाकिस्तान के हालात अलग हैं । पाक पीएम इमरान खान लगातार अमेरिकी प्रशासन पर हमला बोल रहे हैं और चीन के ही बेहद करीबी दिख रहे हैं । अमेरिका पर तो उन्होंने सीधे तौर पर अपनी सरकार गिराने की कोशिश करने का ही आरोप लगा दिया है । हालांकि यह आरोप एक सिरे से नकार दिया गया है । जानकार मानते हैं कि पाकिस्तान की यह रणनीति आत्मघाती है । इसकी वजह यह है कि यूक्रेन पर हमले के बाद से अमेरिका उसे साथ लाना चाहता था, लेकिन इमरान खान ने लगातार उसकी आलोचना की और अपने रास्ते ही बंद कर लिए । इसकी बजाय वह चीन के पाले में खुलकर जाते दिखे, जो ड्रैगन के लिए अच्छी बात है । लेकिन पाकिस्तान अमेरिका के पक्ष में कुछ बयान देकर चीन पर दबाव बना सकता था, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सका । अब एक कमजोर पाकिस्तान भले ही अमेरिका के हित में न हो, लेकिन चीन उसका दोहन जरूर करेगा । यही श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे मुल्कों की रणनीतिक चूक है और नेपाल की समझदारी है ।
आगामी दिनों में भारत से नेपाल की उम्मीदें
नेपाल स्वतन्त्र, सार्वभौम राष्ट्र है इस सच से भारत इनकार नहीं कर सकता और यही अपेक्षा नेपाल की जनता भारत से चाहती है कि भारत नेपाल की अस्थिरता, शासक वर्ग की स्वार्थपूर्ति का सहयोगी न बन कर नेपाल के साथ एक स्वस्थ सम्बन्ध का आधार रखे । हालाँकि यहाँ अपेक्षा तो हमें अपने नेताओं से होनी चाहिए क्योंकि बिकने या बेचने का दारोमदार उन पर टिका हुआ होता है । आप किससे कितना प्रभावित होते हैं और किसे कितना प्रभावित करते हैं यह खुद पर निर्भर करता है ।
दो राष्ट्रों के बीच महत्तवपूर्ण विषयों पर बहस होती रही है और यह स्वाभाविक सी बात है कि सामने वाला पक्ष अपने राष्ट्र के हित की ओर अधिक सतर्क रहेगा । ऐसे में कौन सा रुख अपनाएँ और अपने हित को साधें, ये कूटनीति तय करती है । जहाँ दो राष्ट्रों के बीच किसी विषय पर साझेदारी की बात होती है, वहाँ सबसे पहली आवश्यकता पारदर्शिता की होती है । किसी विषय पर अगर मतभेद है तो क्यों है इसका खुलकर विश्लेषण करना ही समय का सही तकाजा होता है और उस पर चर्चा करने की आवश्यकता होती है । दो राष्ट्रों के बीच किसी साझे विषय पर टक्कर स्वाभाविक है, पर उसका हल निकालने के लिए कूटनीतिक पहल का होना भी नितांत आवश्यक होता है । स्पष्ट विचारों के साथ बहस की जरुरत होती है । साझेदारी के विषय में कोई मसला गोप्य नहीं होता वहाँ विषय से सम्बन्धित हर बिन्दु पर खुलकर विचार और अपना पक्ष मजबूती के साथ रखने की आवश्यकता होती है, चाहे वह किसी प्रकार की पूर्व संधि हो या व्यापारिक योजनाएँ या भौतिक पूर्वाधार की बातें । हम २१वीं सदी में जी रहे हैं जहाँ समानता और स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है और अभी के समय में किसी के दवाब या डर की गुँजाइश नहीं है । विश्व परिदृश्य इसका गवाह है ।
कई एक मसले हैं जिनपर नेपाल की जनता भारत से सकारात्मक पहल की उम्मीद करती है । नेपाल के कालापानी, लिपुलेक और लिंपियाधुरा क्षेत्रों को कवर करने वाला नक्शा जारी करने के बाद से किसी नेपाली प्रधान मंत्री की भारत की यह पहली यात्रा थी । भारत दौरे पर प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने भारतीय प्रधानमंत्री से नेपाल और भारत के बीच सीमा मुद्दे को सुलझाने का अनुरोध किया । दोनों प्रधानमंत्रियों द्वारा आयोजित संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में प्रधानमंत्री देउबा ने प्रधानमंत्री मोदी से एक स्थापित तंत्र के माध्यम से इस मुद्दे को हल करने का आग्रह किया । उम्मीद है कि सीमा विवाद पर एक सकारात्मक कोशिश की जाएगी और असंतुष्टता को दूर किया जाएगा ।
इसके अतिरिक्त सामाजिक स्तर पर कुछ ऐसे मुद्दे भी हैं जिस पर गम्भीरता के साथ ध्यान देने की आवश्यकता है । नेपाल से भारत का जो आत्मिक रिश्ता है उसके परिप्रेक्ष्य में नागरिकता सम्बनधी विधानों पर भी नए सिरे से सोचने और निर्णय करने की आवश्यकता है । जब हम यह कहते हैं कि नेपाल और भारत में रोटी–बेटी का सम्बन्ध है तो इस जुमले के भाव को भी समझने की भी आवश्यकता है । क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता है तो सिर्फ रोटी के सम्बन्धों की ही चर्चा की जानी चाहिए । अगर भारत नेपाल से गई बेटियों को सात वर्ष के बाद अपनाता है तो फिर नेपाल ब्याही हुई बेटियाँ यहाँ किस अधिकार की बातें करें ? भारत में अगर नेपाल की बेटियों के शैक्षिक प्रमाणपत्र को स्वीकार नहीं किया जाएगा तो नेपाल में वहाँ की डिग्रियों को क्यों मान्यता दी जाएगी ? यह एक कटु सवाल है जिस पर दोनों देशों को मिलकर एक सही निर्णय लेने की आवश्यकता है । दोनों देशों की खुली सीमाओं ने जिस आत्मीयता से हमें जोड़ा है और जिस आधार पर हम हमेशा रोटी–बेटी के सम्बन्धों का हवाला देते हैं उसके लिए अगर शिक्षा और नागरिकता से सम्बन्धित नियमों को खंगाल कर एक नई नीति नहीं बनाई गई तो निश्चय ही नेपाल से भारत के सम्बन्धों की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी इतिहास बन जाएगा जो हमारी अगली पीढ़ी किताबों या नेट पर पढ़ेगी ।
-हिमालिनी मासिक (अप्रिल २०२२ अंक से)


