चुनावी गठबंधन और राजनीतिक निरंकुशता: लिलानाथ गौतम

लिलानाथ गौतम, हिमालिनी मासिक, मई (२०२२) अंक से
देश चुनावी माहौल में है । संघीय लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था लागू होने के बाद देश में दूसरी बार स्थानीय चुनाव होने जा रहा है । वैशाख ३० गते के लिए तय चुनाव को लक्षित कर सभी राजनीतिक पार्टी के प्रतिनिधि एवं स्वतन्त्र उम्मीदवार चुनाव में प्रत्यक्ष सहभागी हैं, जो स्थानीय सरकार सञ्चालन के लिए खुद को योग्य होने का दावा करते हैं । देशभर कुल ७५३ स्थानीय तह (स्थानीय सरकार)है, जिसमें कानूनतः कुल ३५ हजार २२१ जनप्रतिनिधि निर्वाचित होते हैं । लेकिन उम्मीदवारी मनोनयन करनेवालों की कुल संख्या लगभग डेढ़ लाख है । ३५ हजार जनप्रतिनिधियों के लिए डेढ़ लाख की उम्मीदवारी सामान्य नहीं है । उम्मीदवारी देनेवालो में से कई ऐसे युवा भी हैं, जो किसी भी राजनीतिक पार्टी के साथ आबद्ध नहीं हैं, उन लोगों ने स्वतन्त्र उम्मीदवारी दी है, इस तरह उम्मीदवारी देनेवाले सभी प्रतिनिधि स्थानीय स्तर में क्रियाशील सामाजिक कार्यकर्ता हैं । चुनाव में इसतरह अधिक संख्या में उम्मीदवारी मनोनयन होना लोकतन्त्र में विश्वास करनेवालों के लिए खुशी की बात है, यह लोकतन्त्र के प्रति आम नागरिकों का विश्वास और आकर्षण भी है । इसतरह की प्रतिस्पर्धा और अभ्यास से ही लोकतन्त्र को मजबूत बनाया जा सकता है ।
लेकिन ऐसे ही माहौल में एक अजीब–सा दृश्य भी देखने को मिल रहा है । वह है– चुनावी गठबन्धन के नाम से सृजित विभिन्न राजनीतिक गतिविधियां । चुनाव स्थानीय सरकार के लिए हो रहा है । प्रतिस्पर्धा करनेवाले जनप्रतिनिधि भी स्थानीय स्तर के ही हैं । हां, राष्ट्रीय शक्ति के रूप में स्थापित राजनीतिक पार्टी के कुछ सांसद, जिनकी पहचान राष्ट्रीय रूप में हो चुकी है, उन्होंने भी अपने पद से इस्तीफा देकर स्थानीय सरकार प्रमुख के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं । इस विषय को लेकर अलग ही बहस हो सकती है । लेकिन स्थानीय सरकार के लिए प्रतिस्पर्धा करनेवाले अधिकांश उम्मीदवार स्थानीय स्तर में ही क्रियाशील व्यक्तित्व हैं । ऐसी परिस्थिति में केन्द्रीय राजनीति का प्रभाव अनावश्यक रूप में स्थानीय तहों में दिखाई देना सुखद पक्ष नहीं है । स्थानीय चुनाव में केन्द्रीय स्तर से अधिक हस्तक्षेप होना, लोकतान्त्रिक मूल्य–मान्यता की दृष्टिकोण से ठीक नहीं माना जाता, लेकिन हमारे यहां ऐसा ही दृश्य देखने को मिल रहा है । उम्मीदवार चयन से लेकर चुनावी घोषणापत्र और उम्मीवारों की प्रतिबद्धतापत्र भी केन्द्र से ही निर्धारण हो रहा है, जिनका स्थानीय स्तर में कोई भी लेना–देना नहीं है । स्थानीय समस्या और आवश्यकता की पहचान किए बिना केन्द्र से उम्मीदवारों का चयन हो या अन्य राजनीतिक हस्तक्षेप, यह एक प्रकार की राजनीतिक निरंकुशता है । जिसके विरुद्ध कई जगहों में पार्टी के ही प्रतिनिधियों ने स्वतन्त्र उम्मीदवारी दी है, जिसको राजनीतिक भाषा में ‘बागी उम्मीदवार’ भी कहा जाता है ।
एक और दृश्य भी देखने को मिल रहा है, जो सामान्यतः असामान्य है । वह है– चुनावी गठबन्धन । सामान्यतः लोकतान्त्रिक अभ्यास में चुनावी गठबन्धन होना असामान्य नहीं है । लेकिन इस बार हमारे यहां इस तरह का चुनावी गठबंधन दिखाई दे रहा है, जहां सम्पूर्ण राजनीतिक शक्ति (मूल धार के राजनीतिक पार्टियां) दो ध्रुव में विभाजित हैं । वैसे तो विकसित देश में सिर्फ दो राजनीतिक शक्तियों के बीच में चुनावी प्रतिस्पर्धा होती है । लेकिन हमारे यहां वैसी अवस्था नहीं है । यहां तो बहुदलीय विकृति के रूप में इसका अभ्यास हो रहा है ।
दो ध्रुवों में से एक–ध्रुव सत्ता गठबंधन का है, जहां ५ राजनीतिक पार्टियां (नेपाली कांग्रेस, नेकपा माओवादी केन्द्र नेकपा एकीकृत समाजवादी, जनता समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनमोर्चा) शामिल है । और इसको सत्ताधारी गठबंधन के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने देशव्यापी रूप में भागबण्डा कर उम्मीदवारों का चयन किया है । अजीब सी बात तो यह है कि गठबंधन में शामिल नेपाली कांग्रेस प्रजातान्त्रिक विचार को लेकर वकालत करती है, वहीं कम्युनिष्ट विचारधारा को लेकर बहस और अभ्यास करनेवाला माओवादी केन्द्र, एकीकृत समाजवादी और राष्ट्रीय जनमोर्चा भी है । राजनीतिक विचार और दर्शन की दृष्टिकोण से कांग्रेस और अन्य पार्टी दो ध्रुव की ओर उन्मुख राजनीतिक शक्तियां हैं । लेकिन सत्ता के लिए आज यही दो ध्रुव एक ही जगह दिखाई दे रहे हैं ।
दूसरे ध्रुव में नेकपा एमाले है, जो सामान्यतः अकेले ही दिखाई देती है । कुछ जगहों पर एमाले ने भी अन्य दलों के साथ चुनावी गठबंधन किया है, जो सामान्य माना जाता है । लेकिन एमाले ने भी ऐसी राजनीतिक शक्ति के साथ चुनावी तालमेल किया है, जो सामान्यतः असामान्य है । हां एमाले ने राजावादी शक्ति के साथ चुनावी तालमेल की है । एमाले राजनीतिक विचार की दृष्टिकोण से कम्युनिष्ट पार्टी ही है, लेकिन उसने नेपाल में पुनः राजतन्त्र वापसी के लिए बहस करनेवाले राष्ट्रीय प्रजातन्त्र पार्टी के साथ चुनावी तालमेल की है, यहां भी सत्ता–स्वार्थ ही प्रमुख प्राथमिकता में दिखाई देती है ।
तब भी इस बार देश की राजनीति दो ध्रुव में विभाजित है । हां इस बार पाँच दलीय गठबंधन और नेकपा एमाले के बीच देशभर चुनावी प्रतिस्पर्धा है । जहां सत्ताधारी गठबन्धन में शामिल नेताओं का कहना है कि इस बार जैसे भी हो नेकपा एमाले को चुनाव में पराजित करना होगा, नहीं तो देश में संकट आ सकता है, प्रतिमगनकारी शक्ति हावी हो सकती है । इसीतरह नेकपा एमाले का कहना है कि वर्तमान सरकार अवसरवादी और अराजकतावादी समूह से संचालित है, पाँच राजनीतिक दलों का वही समूह गठबन्धन कर चुनाव में शामिल है, उसको पराजित नहीं किया जाता तो देश में राजनीतिक स्थिरता और संविधान का सही कार्यान्वयन सम्भव नहीं है । इसतरह केन्द्रीय सत्ता में विभाजित राजनीतिक शक्ति का प्रभाव स्थानीय चुनाव में भी दिखाई दे रहा है, जो स्थानीय राजनीति और अधिकार के विरुद्ध है, साथ में राजनीतिक निरंकुशता भी ।
यहां एक उदाहरण स्मरणीय है । मई ५ के दिन चितवन (भरतपुर) में आयोजित एक चुनावी सभा को सम्बोधन करते हुए गठबंधन में शामिल नेकपा माओवादी केन्द्र के अध्यक्ष तथा पूर्व प्रधानमन्त्री पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ ने कहा कि अगर भरतपुर महानगरपालिका में रेणु दाहाल चुनाव नहीं जीतेगी तो देश संकट में पड़ सकता है । उसी दिन नेपाली कांग्रेस की नेतृ एवं प्रधानमन्त्री शेरबहादुर देउवा की पत्नी आरजू राणा (देउवा) ने एक चुनावी कार्यक्रम में कहा कि अगर गठबंधन के उम्मीदवार चुनाव जीत जाएंगे तो उनको मुँह माँगी रकम मिल सकती है, नहीं तो बजट मिलनेवाला नहीं है । यह एक प्रकार की घिनौना राजनीतिक अभ्यास है । भरतपुर महानगरपालिका में प्रचण्ड पुत्री रेणु दाहाल मेयर पद की दावेदार हैं, चुनावी अभ्यास में हार–जीत होना स्वाभाविक है । लेकिन उनकी हार को राष्ट्रीय राजनीति से जोड़ कर आम मतदाता को धमकीपूर्ण अभिव्यक्ति देना लोकतन्त्र का सही अभ्यास नहीं है ।
सत्ता गठबंधन में शामिल प्रमुख दो पार्टी के प्रमुख नेता प्रचण्ड और आरजू की ओर से व्यक्त उल्लेखित कथन और राजनीतिक गठबन्धन के बीच जारी अराजनीतिक अभ्यास से हम लोग सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि हमारे राजनीतिक दल आज भी लोकतान्त्रिक अभ्यास के प्रति अभ्यस्त और इमानदार नहीं हैं । सिर्फ भरतपुर और धनगढी की बात नहीं है । काठमांडू से लेकर विराटनगर तक, पोखरा से लेकर जनकपुर तथा वीरगंज तक लगभग यही दृश्य दिखाई दे रहा है, जहां उम्मीदवार चयन में केन्द्रीय नेतृत्व हावी हैं । राजनीतिक सहमति अनुसार केन्द्रीय नेतृत्व से स्थानीय उम्मीदवारों का चयन होना बहुत बड़ी बात नहीं है, लेकिन केन्द्रीय हस्तक्षेप से जिन–जिन व्यक्तियों को टिकट मिला है, उसको देखते हैं तो लोकतन्त्र के प्रति ही वितृष्णा पैदा हो जाती है ।
सच यही है, स्थानीय स्तर में उम्मीदवार बननेवाले अधिकांश प्रमुख राजनीतिक दल के प्रतिनिधि केन्द्रीय नेताओं की पत्नी, बेटी, बेटा, भाई, बहन, साली, गर्लफ्रेण्ड, तथा अन्य नातेदार हैं । उदाहरण के लिए देश के ही प्रमुख शहर काठमांडू महानगरपालिका को ही ले सकते हैं, जहां लौह पुरुष के रूप में परिचित सर्वमान्य नेता गणेशमान सिंह की बहू एवं कांग्रेस नेता प्रकाशन सिंह की पत्नी सिर्जना सिंह को कांग्रेस की ओर से मेयर पद का टिकट मिला है, जो विगत ३० साल से किसी भी राजनीतिक संगठन से आबद्धं नहीं हैं । चुनाव में टिकट मिलने के बाद राजनीतिक भाषण करना और विचार व्यक्त करने में भी सिर्जना जी को मुश्किल हो रही है । यही हाल अधिकांश चुनावी क्षेत्र और सभी राजनीतिक पार्टी में है । इस तरह लोकतान्त्रिक अभ्यास को परिवारवाद में फंसना राजनीतिक बेइमानी है, निरंकुशता है, जिसके चलते राजनीति के प्रति युवाओं में वितृष्णा पैदा हो जाती है और लोकतन्त्र के प्रति आम लोगों की विश्वास कमजोर पड़ जाता है । –हिमालिनी मासिक, मई (२०२२) अंक से


