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दरवाजों का खुला होना खुद एक उम्मीद है, जो थामे रखता है नींव को : केदारनाथ सिंह

 

केदारनाथ सिंह हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि और साहित्यकार थे. वे अज्ञेय द्वारा सम्पादित तीसरा सप्तक के कवि रहे हैं.

 

दरवाजे खुला रखो

दरवाजे खुला रखो
वे लौट सकते हैं
उम्मीद मत रखो
बस उन्हें खुला छोड़ दो
दरवाजों का खुला होना
खुद एक उम्मीद है
जो थामे रखता है नींव को
मैंने ईंटों से सीखा है
घर का व्याकरण
हालांकि घर का हिसाब
आज तक समझ में नहीं आया
एक बार फेल हुआ था गणित के पर्चे में
तो होता रहा फेल-दर-फेल
मैंने किसुन कोइरी से सीखा
कुदाल का अर्थ
मंगनी कुम्हार से
माटी का सौन्दर्य समझा
मेरे बहुत से गुरु हैं
असंख्य उस्ताद
मैं हर पक्षी का शागिर्द हूं
हर वृक्ष का छात्र
पहली किताब मैंने पुस्तक-विक्रेता से
नहीं
पेड़ से खरीदी थी
पत्तों के बजने से
मैंने सीखा था छंद
नफरत के विरुद्ध मैंने पहला पाठ
एक मक्खी से जाना था
जीने की उद्दाम लालसा
मैंने पायी उसी से
सीखते-सीखते पक गए बाल
सोचता हूं अखबार में दे दूं विज्ञापन
एक ऐसे गुरु के लिए
जो मुझे पढ़ा दे
दुनिया का पंचतंत्र।

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