प्रदीप गिरी में हिमालय का धीरज और गंगा की गतिशीलता थी : बनारस से प्रो. आनंद कुमार
वाराणसी। समाजवादी चिंतक, नेपाल की जनतांत्रिक क्रांति के महत्वपूर्ण नायक, भारत नेपाल मैत्री के आधार स्तंभ, नेपाल की संसद और संविधान सभा के वरिष्ठ सदस्य और नेपाली कांग्रेस के एक शिखर पुरुष प्रदीप गिरी का २० अगस्त को काठमांडू में निधन एक अपूरणीय क्षति है. उनकी आठ दशक लंबी ज़िंदगी नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना जैसे बड़े सपने के लिए संपूर्ण समर्पण, रोमांचक संघर्ष और तमाम अवरोधों के बावजूद सफलता हासिल करने की अद्भुत कथा है. उनमें हिमालय का धीरज और गंगा की गतिशीलता थी.
प्रदीप जी के मोहक व्यक्तित्व में विद्यासाधक और कर्मयोगी; चिंतक और नायक; साहस और समझदारी; विद्रोह और अनुशासन; कविता और क्रांति; सपनों और सच का असाधारण समन्वय था.
नेपाल के एक संपन्न भूमिपति परिवार में जन्मे व विराटनगर-काठमांडू-बनारस-दिल्ली में सुशिक्षित और नेपाल के कठोर राणाराज द्वारा तरुणाई में ही राजबंदी बनाए गए प्रदीप गिरी अपने आप में प्रेरणा पुंज थे. उत्साह का अक्षय स्त्रोत थे. उनके ज्ञान और अनुभव का कम उम्र से ही बहुत बड़ा दायरा था. वह विद्यार्थी जीवन से ही दोस्त बनाने में सिद्ध थे.
लोकतांत्रिक समाजवादी की पक्की पहचान के बावजूद नेपाल के राजनीतिक इंद्रधनुष के हर रंग के समूहों में वह सम्मान से देखे जाते थे. वैसे भारतीय राजनीतिज्ञ दायरे में भी उनकी कांग्रेस से लेकर राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल (यूनाइटेड) तक के नेतृत्व मंडल से मैत्री संबंध रहा. नेपाली कांग्रेस परिवार में वह व्यक्ति के रूप में कृष्ण प्रसाद भट्टराई के प्रति श्रद्धा रखते थे और प्रधानमंत्री पद के लिए शेरबहादुर देऊबा उनकी खुली पसंद रहे. भारतीय राजनीति में लोहिया पसंद थे. उनकी पहली बार की गिरफ़्तारी लोहिया के साथ पत्र व्यवहार के कारण भी हुई थी. गांधी, नेहरू, जे. पी., नंबूदरीपाद, जार्ज फ़र्नाडिस से लेकर किशन पटनायक तक के सोच की उनकी अच्छी समझ थी. अपनी असहमतियों के बावजूद प्रदीप जी ने बी. पी. कोईराला की रचनाओं का संकलन-संपादन करके नेपाल के बौद्धिक विमर्श के लिए एक बुनियादी काम संपन्न किया. वैसे भी नेपाली राजनीति में उनकी पहचान ‘वैचारिक साहस’ में अद्वितीय नायक की थी.
माओवादियों और नेपाली कांग्रेस में सहयोग की बुनियाद बनाने में उनका असाधारण योगदान था. नेपाल में बसे तिब्बती प्रवासियों के भी वह मददगार थे.
मेरा उनसे परिचय १९६७ में बी. एच. यू. समाजवादी युवजन सभा की पहली विचार गोष्ठी में अपने समय के बेमिसाल समाजवादी विद्यार्थी नेता डी. मजूमदार ने कराया था. मद्रास कैफ़े की एक टेबल के इर्द-गिर्द पाँच युवजनों को नेपाल की जेल से रिहा होकर आए प्रदीप गिरी ने १ घंटे तक समाजवादी विचार प्रवाह का क-ख-ग समझाया था. शंका समाधान भी किया. मार्क्स -एंगेल्स की कम्यूनिस्ट मेनिफेस्टो, नरेंद्र देव की राष्ट्रीय और लोहिया के इतिहास चक्र को पढ़ने का सुझाव दिया. इस तरह से एक नेपाली मशाल से बनारस में समाजवादी विचारों की दीवाली सजाना शुरू हुआ. तब से इस जुलाई में बंबई के अस्पताल में गले के कैंसर के इलाज के लिए भर्ती होने के बाद तक हमलोगों का संपर्क बना रहा. इस बीच लगभग छः दशक बीत गए लेकिन प्रदीप जी से बनारस-दिल्ली-काठमांडू में हुई अनगिनत मुलाक़ातों में उनका रंग-स्वर-सरोकार-सहयोग जस का तस रहा. हमेशा किसी बड़ी योजना को लेकर कुछ चिंतित, कुछ आशान्वित. कुछ जिज्ञासाएँ, कई सुझाव. कभी व्यस्तता के कारण संक्षिप्त फोनवार्ता और कभी फ़ुरसत में चाय के कई प्याले. वैसे यह भी सही रहा कि उनका स्वभाव ‘रमता जोगी, बहता पानी ‘ जैसा था. कल, आज और कल के बीच अक्सर कोई सिलसिला नहीं बना पाते थे. इसीलिए उनके साथ बीता ‘आज और अभी ‘ का जादा महत्व था. नेपाली राजनीति की संसदीय लहर में छलांग लगाने के बाद मुलाक़ात का महत्व जरूर बढ़ गया. लेकिन तत्व की बात कम रही और तात्कालिकता की प्राथमिकता हो गयी.
इसलिए बाद की भेंट के अंत में यह ज़रूर कहा करते थे कि ‘ देखिए, कितनी ज़रूरी बातें करने की सोच के आया था. कोई काम की बात नहीं हुई. अभी तो काठमांडू में बहुत उलट पलट का माहौल है इसलिए चलता हूँ. अगली बार व्यवस्थित चर्चा करेंगे.’! अब तो वह भी कहने के लिए नहीं ठहरे.
दूसरी तरफ़, वह आजीवन नेपाली लोकतांत्रिक नवनिर्माण के लिए प्रतिबद्ध रहे. उनके मन में नेपाल को सामन्तवाद की बंद गली से मुक्ति दिलाने और लोकतंत्र के सूरज की ऊर्जा से समाजवादी नवनिर्माण से सजाने – संवारने का सपना नेपाल के बंदी जीवन के दौरान हीअंकुरित हो गया था. यह उनका सौभाग्य रहा कि उनकी तरुणाई का सपना अधेड़ उम्र में साकार हो गया. हालाँकि इसकी हज़ारों नेपाली वीरों की तरह प्रदीप गिरी ने भी बड़ी क़ीमत चुकायी.
अलविदा प्रदीप जी…….प्रोफेसर आनंद कुमार


