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किसने ‘कन्वर्जन के विरोध’ को लुप्त करने का षड्यंत्र रचा ? : राजेश झा

 

स्वामी विवेकानंद के शिकागो- भाषण सन्देश से किसने’ कन्वर्जन के विरोध’ को लुप्त करने का षड्यंत्र रचा ?

राजेश झा, मुंबई।यह मानवीय सभ्यता के इतिहास के सबसे बड़े षड्यंत्रों में एक है कि विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद द्वारा दिये गए सन्देश का मूल ही छिपा लिया गया जिसमें उन्होने कन्वर्जन का विरोध करते हुए हिंदुत्व की सार्वकालिकता और सार्वभौमिकता (सीधे -साधे ,प्रचलित शब्दों में कहें तो ‘सनातनता’ ) को स्थापित किया था। यह कुप्रचार तथा मानसिक गंदगी ही है कि ‘दिल से मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों !’ के सम्बोधन पर स्वामी जी को सभागृह की हर्षित तालियां मिलीं। सच यह है कि क्रिश्चियनिटी की सर्वोच्चता और श्रेष्ठता को स्थापित करने के लिए आयोजित विश्व धर्म संसद में ‘स्वयंभू पंथ श्रेष्ठियों’ को स्वामी विवेकानंद ने आइना दिखाया और गर्दनें उचका – उचकाकर अपनी -अपनी ऊंचाई साबित करने में लगे ‘फादर – चादर’ तंत्र को उत्तुंग हिमालय पहाड़ के नीचे खड़ा कर उनका बौनापन सिद्ध कर दिया था।

गत 11 सितंबर 1893 दिए अपने प्रथम भाषण ‘Response to Welcome’ में स्वामी विवेकानंद ने हिंदुत्व को भारत की राष्ट्रीय पहचान के रूप में प्रतिष्ठित करते हुए अपने हिंदू होने पर गर्व का विस्तार से वर्णन किया हैतो 17 सितंबर 1893 को अपने भाषण के दूसरे चरण में प्रस्तुत ‘Paper on Hinduism’ में हिंदुत्व की परिभाषा का सुस्पष्ट एवं सरल पारायण सभी ‘धर्म गुरुओं’ को ऐसा कराया कि सब समझ गए विश्व में एक ही धर्म है ‘सनातन अर्थात हिन्दू’ शेष सभी उसकी कोंपलें हो सकती हैं जिसे मज़हब कहा जाए अथवा रिलीजन या फिर सम्प्रदाय और पंथ -किन्तु धर्म इस धरती पर सिर्फ हिन्दू है।इस अकेली घटना ने पश्चिम में भारत की एक ऐसी छवि बना दी, जो आजादी से पहले और इसके बाद सैकड़ों राजदूत तथा साधू -संत मिलकर भी नहीं बना सके। स्वामी विवेकाननंद के 17 सितंबर के भाषण के बाद भारत को एक अद्वितीय ,अनुपम संस्कृति के देश के रूप में देखा जाने लगा।

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यह ऐसा थप्पड़ था जिसे विश्वभर की ईसाई- मुस्लिम तथा अन्य ‘अहिन्दु’ सरकारें तथा उनके अनुप्राण पंथ-प्रतिनिधि नहीं सह सके । स्वामी विवेकानंद के हिंदुत्व की हुंकार की अनुगूँज संसार के हर कोने में गूँजी पर ‘हत्भाग्य’ भारत के, कि उसके ‘बेटे’ का असली पराक्रम छिपा लिया गया और ‘भाईचारा’ का फर्जी नारा गढ़ा तथा उछाला गया कि उनके ‘प्यारे भाई -बहन’ वाले संबोधन दिल से निकले थे इसलिए सभागृह का विपुल समर्थन एवं आशीर्वाद मिला जबकि यह नरेटिव इस बात से ध्वस्त हो जाता है कि स्वामी विवेकानंद के पहले चार अन्य वक्ताओं ने सभागृह में उपस्थित पंथ -प्रतिनिधियों को ‘भाइयों और बहनों ‘ का सम्बोधन दिया था । यह बात दिल को अधिक कचोटनेवाली है कि स्वाधीनता के अमृतकाल में भी हमारी सरकार 17 सितंबर 1893 को स्वामी जी द्वारा प्रस्तुत ‘Paper on Hinduism’ को विमर्श के केंद्र में नहीं ला सकी जो इस संसार को ‘ भारत को नई दृष्टि से देखने’ का ,स्वामी जी द्वारा दिया वरदान था (और है )। इसको विमर्श के केंद्र में लाया जाना चाहिए।

अमेरिकी प्रेस ने विवेकानंद को उस धर्म संसद की महानतम विभूति बताया था। स्वामी विवेकानंद के बारे में लिखा था, उन्हें सुनने के बाद हमें महसूस हो रहा है कि भारत जैसे एक प्रबुद्ध राष्ट्र में मिशनरियों को भेजकर हम कितनी बड़ी मूर्खता कर रहे थे। यह ऐसे समय हुआ, जब ब्रिटिश शासकों और ईसाई मिशनरियों का एक वर्ग भारत की अवमानना और पाश्चात्य संस्कृति की श्रेष्ठता साबित करने में लगा हुआ था। सर्वधर्म सम्मेलन में अंत में दस का घंटा बजा। ईसाई पादरी अनुभव करने लगे कि जगत में ईसाई पंथ सर्वश्रेष्ठ है। इस तथ्य को दुनिया के सामने प्रकट करने का समय आ पहुँचा और वास्तव में इसी भावना से अमेरिका के बड़े धार्मिक नेताओं ने इस महासम्मेलन का आयोजन किया था। परंतु किसी को खबर न थी कि यह घंटा तो सनातन हिन्दू-धर्म की विजय का बज रहा है।शिकागो व्याख्यान में स्वामी विवेकानंद ने अपने भाषण में उसको प्रस्तुत किया व स्थापित भी किया।

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विश्व धर्म सभा में जब सभी पंथ स्वयं को ही श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास कर रहे थे, तब स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि भारत का विचार सभी सत्यों को स्वीकार करता है।स्वामीजी बोले – “मुझे यह कहते हुए गर्व है कि जिस धर्म का मैं अनुयायी हूँ उसने जगत को उदारता और प्राणी मात्र को अपना समझने की भावना दिखलाई है। इतना ही नहीं, हम सब पंथों को सच्चा मानते हैं और हमारे पूर्वजों ने प्राचीन काल में भी प्रत्येक अन्याय पीड़ित को आश्रय दिया है।” इसके बाद उन्होंने हिंदू धर्म की जो सारगर्भित विवेचना की, वह कल्पनातीत थी।उन्होंने यह कहकर सभी श्रोताओं के अंतर्मन को छू लिया कि हिंदू तमाम पंथों को सर्वशक्तिमान की खोज के प्रयास के रूप में देखते हैं। वे जन्म या साहचर्य की दशा से निर्धारित होते हैं, प्रत्येक प्रगति के एक चरण को चिह्नित करते हैं। स्वामीजी द्वारा दिये गए अपने संक्षिप्त भाषण में हिंदू धर्म में निहित विश्वव्यापी एकता के तत्व और उसकी विशालता के परिचय ने पश्चिम के लोगों के मनों में सदियों से भारत के प्रति बनायी गयी नकारात्मक सोच की चूलें हिला दीं ।

स्वामी विवेकानंद ने विश्व धर्म संसद के कालखंड में तीन भविष्यवाणियाँ की थीं (क) 1890 के दशक में उन्होंने कहा था, “भारत अकल्पनीय परिस्थितियों के बीच अगले 50 वर्षों में ही स्वाधीन हो जाएगा” ठीक वैसा ही हुआ ,(ख) उनकी दूसरी भविष्यवाणी थी कि रूस में पहली बार श्रमिक क्रांति होगी, जिसके होने या हो सकने के बारे में तब किसी को कल्पना तक न थी(ग ) उनकी तीसरी भविष्यवाणी थी, भारत एक बार फिर समृद्ध व शक्ति की महान उँचाइयों तक उठेगा और अपने समस्त प्राचीन गौरव को प्राप्त कर आगे बढ़ेगा। उनकी दो भविष्यवाणियां सिद्ध हो चुकी हैं और तीसरी सच होने की प्रक्रिया में है।आज भारत समृद्धि व शक्ति के पथ पर अग्रसर होता हुआ दिख भी रहा है और पूरी दुनिया स्वावलंबी, संस्कारित, संगठित तथा समृद्धशाली भारत के बढ़ते वर्चस्व को देख और मान भी रही है।

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स्वामी विवेकानंद आधुनिक भारत के निर्माता थे। उन्होंने अध्यात्म और सामाजिक संगठन के द्वारा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को जो ऊर्जा और संकल्प दिया उसने देशवासियों को झकझोरकर रख दिया ।वे बराबर युवाओं से कहा करते थे कि हमें ऐसे युवकों और युवतियों की जरूरत है जिनके अंदर ब्राह्मणों का तेज तथा क्षत्रियों का वीर्य हो। दिनांक 17 सितंबर 1893 को उनके द्वारा प्रस्तुत ‘Paper on Hinduism’ हिंदुत्व की राष्ट्रीय परिभाषा ही है। इस परिप्रेक्ष्य में समझने पर हमें हमारे विशाल देश की बाह्य विविधता में अंतर्निहित एकात्मता के दर्शन होते हैं। उन्होंने हिंदू समाज को जागृत किया तथा भारत को पुन: एक सबल, सशक्त, सुसंपन्न तथा वैभवशाली बनाने की प्रेरणा दी।दुनिया में लाखों-करोड़ों लोग उनसे प्रभावित हुए और आज भी उनसे प्रेरणा प्राप्त कर रहे हैं। सी राजगोपालाचारी के अनुसार “स्वामी विवेकानंद ने हिन्दू धर्म और भारत की रक्षा” की। सुभाष चन्द्र बोस ने कहा “विवेकानंद आधुनिक भारत के निर्माता हैं”। महात्मा गाँधी मानते थे कि विवेकानंद ने उनके देशप्रेम को हजार गुना कर दिया। स्वामी विवेकानंद ने खुद को एक भारत के लिए कीमती और चमकता हीरा साबित किया है। उनके योगदान के लिए उन्हें युगों और पीढ़ियों तक याद किया जाएगा।

राजेश झा
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