नागरिकता विधेयक को प्रमाणीकरण नहीं करके राष्ट्रपति ने संविधान के भावनाओं को ठेस पहुँचाया है : रामचंद्र पोडेल

काठमांडू, २१ सितंबर । नागरिकता विधेयक को प्रमाणीकरण नहीं करके राष्ट्रपति ने संविधान के भावनाओं को ठेस पहुँचाने का काम किया है । नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रामचंद्र पौडेल ने नागरिकता विधेयक पर राष्ट्रपति द्वारा लिए गए कदम पर टिप्पणी करते हुए ये बातें कही है । आज सुबह नेता पौडेल ने टीव्ट किया है जिसमें उन्होंने राष्ट्रपति द्वारा नागरिकता विधेयक प्रमाणीकरण नहीं करने पर अपना आक्रेश व्यक्त किया है । उन्होंने लिखा है कि – बारम्बार संविधान के मर्म और भावना को चोट पहुँचाने का काम संवैधानिक निकाय द्वारा होने वाली व्यवस्था के उपर प्रहार हो रहा है मैं इसका घोर भत्र्सना करता हूँ ।
राष्ट्रपति विद्यादेवी भण्डारी ने नागरिकतिा विधेयक प्रमाणीकरण नहीं करके संविधान को ही चुनौती दिया है । संघीय संसद के दोनों सदन ने बहुमत से पारित करके प्रमाणीकरण के लिए सभामुख द्वारा भेजे गए नागरिकता विधेयक को राष्ट्रपति ने प्रमाणीकरण नहीं किया हे ।
सभामुख अग्निप्रसाद सापकोटा द्वार प्रमाणित होकर राष्ट्रपति विद्यादेवी भण्डारी के समक्ष भेजा गया विधेयक मंगलबार को १५ दिन पूरे होने के बावजूद उन्होंने प्रमाणीकरण नहीं किया है । भादव २० गते नागरिकता विधेयक शीतल निवास भेजा गया था ।
इससे पहले राष्ट्रपति भण्डारी ने कुछ विषयों को सही करना होगा संदेश सहित विधेयक प्रतिनिधिसभा में वापस भेज दिया था । लेकिन प्रतिनिधिसभा और राष्ट्रीय सभा ने एक अक्षर भी संशोधन नहीं करके विधेयक को हुबहु पारित करके फिर भेज देने से राष्ट्रपति असन्तुष्ट थी ।
मंगलबार की रात तक दूसरी बार राष्ट्रपति कार्यालय में प्रमाणीकरण के लिए पहुँचे नागरिकता विधेयक पारित नहीं होने के बाद अब क्या होगा ? सभी की चिंता है ।संविधान के धारा ११३ में विधेयक प्रमाणीकरण सम्बन्धी व्यवस्था किया गया है । धारा ११३ के उपधारा २ में प्रमाणीकरण के लिए राष्ट्रपति के समक्ष पेश हुए विधेयक को १५ दिन के भीतर प्रमाणीकरण कर इसकी सूचना यथा संभव जल्दी ही दोनों सदन को देने की व्यवस्था किया गया है । इसी धारा के उपधारा ३ में प्रमाणीकरण के लिए पेश हुए विधेयक में पुनर्विचार आवश्यक है ।
संविधान के धारा ११३ के उपधारा ४ में राष्ट्रपति ने किसी भी विधेयक को सन्देश सहित विापस करने में उस विधेयक के पर दोनों सदन पुनर्विचार करके उसे विधेयक प्रस्तुत रूप में वा संशोधन सहित पारित करके पुनः पेश करने में उसी तरह पेश हुए १५ दिन के भीतर राष्ट्रपति प्रमाणीकरण करेंगे ऐसा संवैधानिक व्यवस्था रखा गया है ।
इसका अर्थ एक बार पुनर्विचार के लिए राष्ट्रपति द्वारा वापस भेजे गए विधेयक को संसद् से हुबहु तथा संशोधन सहित पास करके पुनः प्रमाणीकरण के लिए भेजने के बाद राष्ट्रपति द्वारा प्रमाणीकरण करने के लिए बाध्यकारी व्यवस्था किया गया है । इसका अर्थ दूसरी बार आए हुए उसी विधेयक को १५ दिन तक उलझा के रखने के बाद भी पुनः अस्वीकृत करने का अधिकार राष्ट्रपति को हैं ऐसा नहीं लगता हेै ।

