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मधेश संकट ? जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ .: वृषेशचन्द्र लाल

 

  • वृषेशचन्द्र लाल, जनकपुर धाम।

मधेश आन्दोलन और मधेश के मुद्दों के लिए समर्पित आन्दोलनकारीयों के लिए वर्त्तमान समय वाकई संकट का समय है । स्वाभिमानी मधेशी मधेश-आन्दोलन के भावना और अन्तर्य से हो रहे लगातार खेलबाड़ से शर्मसार हैं । मधेशीयों के लिए शहादत देनेबाले अमरशहीद तो और अधिक पीड़ा से छटपटा रहे होंगे । वर्त्तमान पीड़ा कदाचित् शहादत के समय से भी अधिक असहनीय महशूस हो रहा होगा ।

मधेश-आन्दोलन के तथाकथित नेतृत्व पंक्ति के लोग आन्दोलन के मुख्य शत्रुयों के शरण में नाक रगड़ते प्रस्तुत हो रहे हैं । स्थिति मीर जाफर के जैसा ही  लज्जास्पद दिखाई दे रहा है । मीर जाफर नबाब  शिराजुद्दौला का सेनापति था मगर खुद बंगाल का नबाब बनने का सपना  देखा करता था । अंग्रेज राबर्ट क्लाइब ने इसी कमजोरी को पकड़ लिया और बंगाल का नबाब बनाने का लालच दे कर प्लासी के निर्णायक लड़ाई में अपने साथ मिला लिया । भारत में अंग्रेजों के शासन का यही शरुआती कारण  शुरुआत बना । मीर जाफर ३ वर्ष के लिए बंगाल का शासक तो बन गया मगर भारत को लगभग २०० वर्षों तक अंग्रेजों का गुलाम और उपनिवेश बन कर रहना पड़ा । नेपाल में नई संविधान के घोषणा  के बाद के महत्वपूर्ण और निर्णायक समयावधि में मधेश-आन्दोलन को ऐसे ही मीर जाफरों के घात का शिकार होना पड़ रहा है । मंत्री, उप-प्रधान मन्त्री और राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति बनने के लालच में लोग ऐन मौकों पर मीर जाफर बनते रहे हैं ।

संविधान के जबरन घोषणा के बाद मधेश के आन्दोलनकारियों ने संविधान के बिरुद्ध संघर्ष की घोषणा कर दी थी । ऐसा नहीं कि वे नये संविधान के सभी खण्डों के पूर्णतः विपक्ष में थे । मलाल के दो कारण थे – १. संविधान की घोषणा संविधानसभा में मधेश के निर्वाचित प्रतिनिधियों के सभा से बहिर्गमन की स्थीति में की गई थी । अर्थात्, सार्वभौम जनता के अंग के रुप में मधेशीयों को नजरन्दाज किया गया था जो संविधानसभा से संविधान निर्माण के मूल अवधारणा का बिल्कुल उलटा था । वर्चस्ववादीयों के द्वारा रचित यह षडयन्त्र मधेशीयों के लिए अपमानजनक था । मधेश बिरोधीयों ने संविधान की घोषणा को मधेश आन्दोलनकारीयों पर जीत के रुप में प्रस्तुत किया । मधेशीयों को संविधान पर अपनत्व से वंचित रखा गया । २. सीमांकन, प्रतिनिधित्व, भाषा और संस्कृति, समावेशिता और सहभागिता, समान नागरिक अधिकार आदि विषयों पर मधेश के आन्दोलनकारी सहमत नहीं थे और संविधान में तत्काल सुधार अर्थात् संशोधन की मांग कर रहे थे ।

संविधान घोषणा के बाद मधेश आन्दोलन के नेतृत्व के समक्ष मुख्य चुनौती रणनीति निर्माण की थी । संविधान के मामले में सम्मानजनक अपनत्व, प्रदेशों का सही सीमांकन, प्रतिनिधित्व, भाषा और संस्कृति, समावेशिता और सहभागिता, समान नागरिक अधिकार आदि विषयों पर निरन्तर प्रगतिजन्य विकास प्राथमिकता पर थे । मधेश और थरुहट के लोग अपना राजनीतिक संगठन निर्माण का जो शुरुआत किया था उसे विश्वसनीय और प्रभावकारी बनाना भी एक प्रमुख दायित्व था । प्रारम्भ के दिनों में, कुछ प्रयासें हुई । मगर, हरेक प्रयास में सत्ता सुख के लार, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा तुष्टि की तृष्णा और व्यक्तिगत उच्चता की आत्मश्लाघी खुदपसंदगी ने इन प्रयासों का गर्भपात ही कराता गया । हरेक संवाद के अवसर पर वार्ता तो मधेश आन्दोलन के महान मुद्दों के पृष्ठभूमि में ही होता था तत्काल तुरत सम्पूर्ण संवाद सत्ता में सहभागिता के ग्रहण छाया से ग्रसित हो जाता था । संवाद की तैयारी भी  शल्यों के जमात में ही ली जाती थी । इस तरह मधेश के मुद्दों का गला घोंटना शुरु हुआ और फिर,आन्दोलन से प्राप्त तमाम उर्जा और परिवर्त्तन के लिए संकलित शक्ति अवसरवादी दिमकों ने तेजी से चाट कर चट्ट कर दी ।

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मधेश आन्दोलन के मुद्दे मधेश के ही नहीं देश के मुद्दे हैं और इनके सम्वोधन से मधेश का ही नहीं नेपाल के सभी क्षेत्रों के निवासी लाभान्वित होंगे । समान नागरिक अधिकार किसे पसन्द नहीं आएगा ? कौन समावेशिता और सभी की सहभागिता से असन्तुष्ट होंगे ? अपने क्षेत्र में स्वशासन और संघ में संघीय सहशासन किसके लिए हानिकारक होगी ? जो इन न्यायपूर्ण बातों का बिरोध कर रहे थे उनका भण्डाफोर किया जा सकता था वशर्ते उन्हीं से सत्ता स्वाद चखने के लिए सटने की बात नहीं होती । कुछ मुद्दों पर आग्रह के साथ आगे बढ़ा जा सकता था । बाहर उग्र भाषा में शंख और भीतर सत्ता लोभ का डंक सारी सम्भावनाओं पर सेंघ लगाती रही । अगर नेतृत्व में इन सभी चीजों के लिए दृढ़ता और कौशल होती तो समाधान सम्भव था । मधेश मुद्दों के समाधान से देश के सम्भावनाओं का सभी द्वार खुल जाते । उग्र राष्ट्रवाद मधेश और थरुहट के न्यायोचित समाहन से दब जाती । पड़ोसी के सम्बन्ध में व्याप्त खटास कम हो जाते और सुसम्बन्ध से विकास की गति बढ़ती ही जाती । लेकिन, इस पर सम्वद्ध क्षेत्रों का ध्यान नहीं गया । दोष का सारा हिस्सा नेतृत्व पर आसन जमाये लोगों पर ही जाएगा ।

अब आलम यह है कि मधेश के लोग हद तक निराश हैं । अपने मुद्दों का महत्व समझते हैं, लेकिन इसके वाहक बननेबालों पर कोई भरोसा नहीं है । जो कुछ अलग-थलग हैं, वे भी गद्दारों के रेंड़ के गर्दिश में घिरे पड़े हैं । कल्ह तक जो आन्दोलनकारीयों के खिताब दिखाते घुम रहे थे आज आन्दोलन के स्थापित दुश्मन और मधेश तथा मधेशीयों पर गाली का बौछाड़ करनेबालों के झुन्ड के साथ निर्लज्जता से खड़े मिल रहे हैं । रघुनाथ ठाकुर, बाबा रामजनम, गजेन्द्र नारायण सिंह को भजा कर दुसल्ला ओढ़ने ओढ़ाने से लेकर उन्हीं नामो पर अकूत सम्पत्ति जमा करनेबाले भी आज दुश्मनों के साथ मलेठ के भूमि को रौंद रहे हैं । क्रान्तिकारी और सन्तों की पार्टी  के लोग अपनी सीट की भीख के लिए मधेश बिरोधी दरबारों की सीढ़ीयाँ गिन रहे हैं ।

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जनता का आन्दोलन खुद ही उठ जाता है । वर्षों से सुनगी आग से ज्वाला लपलपाने लगती है । कभी फ्रेडरिक एच गेज ने ‘नेपाल में क्षेत्रीयता और राष्ट्रीय एकता’ नामक पुस्तक में मधेश को भूस का आग कहा था । जब नेपालगंज और लहान में उसे कुरेदा गया तो मधेश-आन्दोलन वहीं से सुलग गई थी । कोई नेता नहीं था । लिखित एजेन्डा भी नहीं था । लोग बराबरी चाहते थे । अपने क्षेत्र में खुद का सरकार चाहते थे । अपनी राजनीतिक शक्ति चाहते थे । कुछ लोगों ने नेतृत्व की इस शून्यता को भाँप लिया और नेतृत्व के रथ पर चढ़ बैठे । आन्दोलन स्वस्फूर्त तो सुनग जाती है, मगर उपलब्धि, निष्कर्ष के लिए नेतृत्व पंक्ति की आवश्यकता होती है । इसके लिए जल्दबाजी में कुछ निर्माण तो किया नहीं जा सकता था तो लोगों ने विकसित परिस्थिति को मान लिया और रथ पर बैठे लोगों को निशर्त सम्पूर्ण समर्थन और सहयोग दिया । गल्ती यहीं से हुई । अधिकांश और खास कर सभी शिर्ष नेता अवसरवादी निकले जिनके लिए व्यक्तिगत स्वार्थ, राजनीतिक महत्वाकांक्षा और ताकतवर बनने का ख्वाब प्राथमिकता में था, मधेश-आन्दोलन और इसका एजेन्डा फाल्तु और बस सिर्फ एक औजार था । आज ये अवसरवादी अपनी धाराओं में समाहित हो रहे हैं । हो सकता है कल्ह के लिए यह ठीक हो, अवसरवादीयों के जाने से मधेशीयों को अपनी गल्ती सुधारने का एक प्राकृतिक मौका प्राप्त हो । हो सकता है परिवर्त्तन ने अपना कठीन रास्ता चुन लिया हो । मगर, इसके लिए परिवर्त्तनकामीयों को अपना काम तो करना ही होगा ।

अब क्या होगा ? मधेश मधेश ही रहेगा और अगर बदलाव नहीं हुआ तो मधेशी की भी स्थिति यही रहेगी ! मधेश आन्दोलन के वजूद को समाप्त करने का कोशिश किया जा रहा है । परिणाम मधेशी को ही भुगतना पड़ेगा । मधेशीयों का सर शर्म से झुक जाएगा । नई सन्तति इस अध्याय को अपमान से याद करेंगे । मधेश के गद्दार और मीर जाफरों सड़कों पर पड़े पत्थरों के तरह हो जायेंगे । शहीदों के मजार धूल से भर जाएगा । हरेक कदम पर अपमान का बोध होगा । अपने ही भूमि पर हम फिर विदेशीयों जैसा व्यवहार पायेंगे । फिर हमारे भूमि पर लोग नीचे उतर-उतर कर कब्जा का खेल खेलेंगे । वर्चस्ववादी राज्य उनका पक्षपोषण करते रहेंगे । हमारे बच्चे रोजगार नहीं नोकरी करेंगे । न जाने कब तक यह खेल चलता रहेगा और शहीदों के मजार गर्म पत्थरों की तरह जलता रहेगा ?

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बदलेगा ! मशाल फिर से जलेगी !! इतिहास में कोई अन्तिम नहीं होता । मधेशीयों का यह संघर्ष भी यहीं नहीं बिखर जाएगा । बस दिया जलाये रखना है । शंख बजाये रखना है । 

हम निराश हैं । एक तरफ आक्रोश है तो दूसरे तरफ खाई । और हम हालात के आगे समर्पण कर रहे हैं । शुतुरमुर्ग की तरह स्थिति से आँखें मूँद रहे हैं । शुतुरमुर्गी  क्रिया से समाधान नहीं होगा । अतएव, गद्दारों को सबक सिखाया जाय । उन्हें बेकार पत्थरों की तरह सड़क पर फेंका जाय । ताकि फिर से कोई, मीर जाफर बनने से पहले सौ बार सोचे । अभी जो बचा है, जो  मुद्दों पर अड़ा है उसे पूरा हौसला और समर्थन देना चाहिए । मशाल जलाये रखने का यही एक तरीका और विकल्प है ।

कुछ नहीं क्यों ? सब कुछ करना होगा । यह चुनाव ही यात्रा का कोई अन्तिम ठिकाना नही है । गठबन्धन की राजनीति की समाप्ति भी एक दिन होगी ही । मधेशीयों का अपना लोकतान्त्रिक और संस्थागत पार्टी भी बनेगी जो मुद्दों पर आधारित होगा । कुछ लोग कहते है मधेशवाद क्या है ? वे इसे बेकार की बातें कहते हैं । मगर, हरेक बार उर्जा प्राप्त करने के लिए फिर मधेश में ही उतर कर आते हैं । मधेशवाद मधेशीयों के समान नागरिक अधिकार, समावेशिता और सहभागिता स्थापित करने का ‘वाद’ है । जैसे मार्क्स के नजरों में दुनियाँ के मजदूरों का एक होना ‘श्रमवाद’ है वैसे ही अपने राजनैतिक, आर्थिक और सभी अधिकारों के लिए मधेशीयों का एक होना ‘मधेशवाद’ है ।

कुछ लोगों के बारे में लोग अभी भी कहते हैं कि वे मन से इस स्थिति के लिए तैयार नहीं हैं और किसी दबाब में ऐसा करने को मजबूर हैं । अगर वास्तव में ऐसा है तो उन्हें सार्वजनिक आत्मसमीक्षा करनी चाहिए । आत्म समीक्षा से लोग छोटा नहीं होता । अगर ऐसा करेंगे तो रास्ता जरुर मिलेगा । सन्त कबीर दास ने कहा था –

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ ।।

आत्म समीक्षा करें और मुद्दों पर आधारित लोगों के साथ सहकार्य में उतरें । निर्वाचन में जीत-हार अन्तिम नहीं होगा क्योंकि मशाल  प्रज्ज्वलित तो  रहेगी । शहीदों के मजार पर दिया अगर जलता रहा तो आनेबाले दिनों में संघर्ष को रास्ता जरुर दिखाएगा ।

 

वृषेशचन्द्र लाल

 

 

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