उपेन्द्र यादव ने मधेश की सामाजिक समरसता को ध्वस्त कर दिया है : जय प्रकाश आनन्द
जयप्रकाश आनन्द, कंचनपुर । राजनीतिक पार्टी तत्काल की समस्याओं के बारे में नहीं बोल रहें हैं । जनजीविका की समस्या और आज के दिन में नागरिक जिस कठिनाईयों का सामना कर रही है इससे मुक्ति दिलाने के बारे में बात नहीं कर रही है । दलों के प्रति बिश्वसनीयता पर बहुत बड़ा प्रशन उठ रहा है । आज की जनता नेताओं द्वारा कही हुई बातों को गम्भीरता पूर्वक मनन करने, उसपर बहस करने के बदले में उसे मजाक के रुप में लेना शुरु कर दिया है । इस बार की चुनाव में राजनीतिक पार्टी ने बहुत बड़ी–बड़ी बातें की हैं पर जनता को उनकी बातों पर जरा सा भी विश्वास नहीं है ।
मधेश प्रदेश की अवस्था अगर देखी जाए तो लोसपा नेपाली कांग्रेस के साथ गठबन्धन में है । जसपा ने एमाले के साथ गठबन्धन किया है । दोनों एक ही बात कह रहें हैं हम सरकार बनाऐंगे “हामी सरकार बनाउँछौं।” जिस पार्टी ने १०और २० जगहों पर अपने उम्मीदवारों को खड़ा किया है । वो जीतेंगे भी तो ५ या ७ सीट ही इसकी सम्भावना है वो भला कैसे सरकार बनाएगी । सरकार बनाने वाले दल में मंत्री होने के लिए ही इन लोगों ने कांग्रेस, एमाले तथा माओवादी के पीछे लगे हुए हैं । जबकि, काँग्रेस, एमालेशुरु से ही मधेस के सवालों में संविधान संशोधन को निरन्तर अस्वीकार करती आई है । कहने का तात्पर्य यह है कि इन नेताओं द्वारा उठाए गए राजनीतिक सवालों को आम नागरिक अब विश्वास करने की अवस्था में नहीं है ।
उपेन्द्र यादवजी ने संविधान पुनर्लेखन की बात को एकबार फिर से उठाया है । शासकीय ढाँचा में बहुत बड़ी बदलाव की बात को उठाया है । कार्यकारी अधिकार पाए हुए राष्ट्रपति की बात को उठाया है । उपेन्द्र यादव इससे पहले भी समय समय पर कांग्रेस के साथ सरकार में बैठते आए हैं । एमाले के साथ भी सरकार में बैठे हैं । सरकार में जाने के समय में दोनों के साथ भेग में समझदारी भी दिखाई है । भेग शब्दावली में मधेश के सवालों का सम्बोधन करते हैं लेकिन सरकार में जाने के बाद वे सभी बातों को भूल जाते हैं । केपी ओली के साथ सरकार में गए तो उस समय संविधान पुनर्लेखन की तो बात छोड़ दे संविधान के किस किस विषय में संशोधन करना आवश्यक है उसकी पहचान के लिए एक समिति बनाने का उपेन्द्रजी ने प्रस्ताव रखा तो ओली ने उस प्रस्ताव को बिना कुछ सुने ही अस्वीकार कर दिया । उसके बाद उपेन्द्रजी का अपमानपूर्वक मन्त्रालय परिवर्तन किया और बाद में उन्हें राजीनामा देना पड़ा । वही उपेन्द्र जी एकबार फिर केपी ओली के साथ गठबन्धन करके संविधान पुनर्लेखन की बात को उठा रहे हैं । संशोधन के लिए कौन कौन से विषय में संशोधन करना है, इसकी पहचान करने और समिति बनाने के कारण ही तो उपेन्द्रजी को केपी ओली के सरकार से बाहर निकलना पड़ा था । और आज वही उपेन्द्रजी संविधान के पुनर्लेखन की बात को उठा रहे हैं । इसी कारणों से इस बार मधेश में दलों के घोषणापत्र या चुनाव प्रति कोई तरंग नहीं है । उनकी चुनावी घोषणा पत्र के बारे में कही भी चर्चा नहीं हो रही है ।
स्थानीय निर्वाचन और अभी की ये संसदीय निर्वाचन ने मधेश के सामाजिक समरसता को ध्वस्त किया है । सभी बड़े नेताओं ने जातीय बर्चस्व को निर्वाचन क्षेत्र का आधार बनाया है । सर्लाही के यादव और साहों के बहुल क्षेत्र के निर्वाचन क्षेत्र को छोड़कर महन्थ ठाकुर महोत्तरी आए हुए हैं । यहाँ जातीय अनुकूलता देखी होगी । जातीय अनुकूलता की ही तलाश में राजेन्द्र महत्तो जनकपुर से वापस सर्लाही पहुँच गए हैं । जातिवाद के उर्वर भूमी समझकर उपेन्द्र यादव सप्तरी आ गए हैं । उपेन्द्र यादव ने सप्तरी को जातीय उन्माद में झोंक दिया है । सप्तरी जिला में इससे पहले भी जातीयता की बात हुआ करती थी । यहाँ यादवों की १७ और १८ प्रतिशत है । यादव सप्तरी में एक जाति के रूप में निश्चित रुप से प्रभावकारी जाति है । लेकिन सप्तरी में एक समय में ऐसी स्थिति थी जहाँ गुप्ता, राजपुत, अल्पसंख्यक अमात, पर्वते बाहुन और थारू क्रमशः जीतते थे । यादव लोग समेत सभी को सहयोग करते थे । यादव थारू का भी प्रचार करते थे । थारू राजपूत का प्रचार करते थे । राजपूत अमात का प्रचार करते थे । उपेन्द्रजी ने इस सदभाव को क्षत बिक्षत कर दिया है । उन्होंने सप्तरी के राजनीति को जातीय आधार में ध्रुवीकृत कर दिया है । इसी का दुष्प्रभाव अभी सप्तरी के चारों निर्वाचन क्षेत्र में दिख रहा है । अभी सप्तरी क्षेत्र नं २ में उपेन्द्र यादव के चुनावी प्रचार का उद्देश्य पहले अपने जातीय भोट को सुरक्षित करना, उसको किला के रुप में बनाना, एक ऐसा माहोल खड़ा कर दिया है कि यदि उनकी जाति के लोग उन्हें वोट नहीं देंगे तो वो कुजात होंगे । वो कभी मुसलमानों के साथ गठबन्धन की बात कर आगे बढ़ते हैं तो कभी साह के साथ गठबन्धन की बात को बढ़ाया है । उन्होंने टिकट वितरण भी इसी आधार में किया है । सप्तरी में उपेन्द्र जी के पदार्पण होने के बाद पुरानी संसद काल में जातीय राजनीति लगभग समाप्त हो चुकी थी अभी अचानक से बढ़ गई है । अभी यादव के बिरूद्ध पचपनीया, पचपनीया बिरूद्ध यादव के बीच द्वन्द खड़ा कर दिया है । उन्होंने यादव–मुसलमान–साह का इस प्रकार से ध्रुवी करण किया है । पूर्ण रुप से चुनावी अभियान को दिशा ही इस तरह का दे दिया है ।
जातिवादी राजनीति ने यहाँ भी आमजनता के मूल समस्या से भटका दिया है । जातिवादी राजनीति हावी होने के बाद जनता के मूल समस्या से दलों का ध्यान हट गया है और भावनात्मक बात में ज्यादा ध्यान गया है । मधेश में अभी मधेश के मुद्दों को समाप्त कर दिया है । मधेश के मुद्दों के बारे में कही कोई चर्चा नहीं है । ये सभी चुनाव में उठकर, जीतकर मधेश के सवालों को आगे बढ़ाऐगे । हमें हक अधिकार दिलाने की बात में कोई विश्वास नहीं है । ये सभी चुनाव में जीतने के बाद भी अपने– अपने समुदाय और जाति के लोग सांसद बनेंगे । बि.स २०६४ के आन्दोलन में सारे मधेशी मधेश के सवाल को लेकर आगे बढ़ा हुआ समाज अभी पूरे जातीय रुप में विभाजित हो चुका है ।



