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कांग्रेस ने एकसाथ सभी अवसर को खो दिया : कंचना झा

असक्षम नेतृत्व का शिकार कांग्रेस : कंचना झा 



कंचना झा, काठमांडू, १३ पुस । बचपन में एक कहानी सुनी थी दो बिल्ली एक रोटी और बंदर की । यह एक जगजाहिर कहानी है । बस यही बात हुई है अभी नेपाल की राजनीति में । दो लोग, दो पार्टी की लड़ाई में सबसे ज्यादा अगर किसी का फायदा हुआ तो वह है एमाले यानी अद्भूत खिलाड़ी केपी शर्मा ओली ने एक झटके में सबको चारो खाने चित्त कर दिया । वो हैं असली खेल के मदारी । जिसे जब चाहेजैसे चाहे नचा दें वो हैं ऐसे मदारी । इस मदारी ने ऐसा खेल दिखाया कि कांग्रेस का तो सबकुछ छिन लिया ।
नेपाल की राजनीति पर निगाहें सभी की रहती है । आम नागरिक की बात करें तो सही में झटका लगा है लोगों को । उन्हें लगता है कि उनके मत का माखौल उड़ाया गया है । जिस सोच के साथ उन्होंने अपने नेता को चुना वह उसपर खड़ा नहीं उतरा ।
सबसे पहले तो रवि लामिछाने की ही बात करें जिन्होंने शुरु से ही कहा था कि वो सरकार में जाने के लिए नहीं अपनी आवाज को उठाने के लिए काम करेंगे । आम नागरिक की समस्याओं का ध्यान रखेंगे । एक बार आगाज हुआ कि सीधे गृहमंत्री और उप प्रधानमंत्री की बात कर ली । अगर जोर जोर से चिल्लाने से बात बनती है तब अलग बात है । इसमें कोई कुछ कह नहीं सकता है ।
वैसे सच कहें तो देश का दुर्भाग्य है ये कि हम सबकुछ आराम से देख लेते हैं । अब परेशान हाल बेहाल हैं देउवा । यहाँ तक कि शपथ ग्रहण समारोह में जब प्रचंड शपथ ले रहें थे तो देउवा सुरक्षाकर्मी के कहने के बाद खड़े हुए और उनकी बेचैनी साफ चेहरे पर झलक रही थी ।
चाहा क्या था और क्या हो गया । कहाँ सोच थी पाँच वर्ष तक सत्ता में रहने की लेकिन इस अवसर को कांग्रेस ने खो दिया है । प्रधानमन्त्री पद के लिए उन्होंने जो हठ रखी उसने पार्टी को कहीं का नहीं रखा । बहुत से कांग्रेस के नेता तथा कार्यकर्ता देउवा से राजीनामा की मांग कर रहे हैं । विशेष महाधिवेशन करके नेतृत्व परिवर्तन करने के लिए आवाज भी उठ रही है ।
देउवा की बेचैनी इतनी थी कि उन्होंने शपथ ग्रहण समारोह में प्रचण्ड के शपथ लेने के बाद उन्हें जल्दी जल्दी शुभकामना देने की औपचारिकता ही पूरी की और वहाँ से चले आए ।
समीकरण बनाने वालों का कहना कि कितनी बड़ी किमत चुकानी पड़ी कांग्रेस को केवल एक प्रधानमंत्री पद के लिए किए गए हठ के कारण । यदि पहले प्रधानमन्त्री पद दाहाल को देने के लिए देउवा तैयार हो जाते तो कांग्रेस राष्ट्रपति और सभामुख पद का हकदार होता साथ ही चारों प्रदेश के मुख्यमन्त्री कांग्रेस को देने के लिए माओवादी भी तैयार ही थी ।
कांग्रेस के भीतर भी बहुत से सवाल उठाए जा रहे हैं । देउवा के व्यक्तिगत हठ के कारण सभी ने अवसर को खो दिया है । कांग्रेस के नेता रामचन्द्र पौडेल ने कहा कि –समय रहते हुए निर्णय नहीं लेने के कारण राजनीति कितनी मंहगी पड़ती है ये बात अब साबित हो गई है ।
कांग्रेस के महामन्त्री गगन थापा ने कहा है कि –पार्टी महाधिवेशन और संसदीय दल नेताओं के चुनाव में प्रहरी परिचालन करने, गृह प्रशासन और प्रधानमन्त्री कार्यालय बालकोट (ओली निवास) में हो रहा है इसकी जानकारी नहीं होने के कारण यह स्थिति आई है । उनका कहना था कि ‘नेतृत्व ही स्मार्ट प्लेयर नहीं बन सका और ना ही उसके पास कोई सूचना पहुँची, निर्वाचन में लोकप्रिय मत भी नहीं ला पाई कांग्रेस ,उल्टे हमने ७, ८ लाख मत को खोया है । थापा का कहना था कि कम से कम एकबार शनिवार हुई बैठक में मुझे बुलाया जाना चाहिए था । अगर बुला लिया होता तो आज यह दुर्घटना नहीं होती । उन्हें बहुत शिकायत है देउवा से ।सूत्रों के अनुसार उन्होंने कहा कि हमें राष्ट्रपति, सभामुख, मन्त्री कुछ नहीं बनना था । सिर्फ एक व्यक्ति की ईच्छा को ध्यान में रखकर काम हुआ है पार्टी और मुलुक केन्द्रित कुछ भी नहीं था । एक व्यक्ति का महत्वाकांक्षा के कारण सभी को खामियाजा भुगतना पड़ रहा है इसकी समीक्षा पार्टी में होनी ही चाहिए ।
पार्टी के भीतर ही बहुत से नेता देउवा का खुले रुप में विरोध कर रहें हैं । उनकी भी चाहत है कि अब देउवा युवाओं को उनका हक दें । सूत्रों के अनुसार पार्टी स्थापना करने के केवल ६ महिना में ही राज्य सत्ता के केन्द्रीय मुख्य भूमिका में आने में सफल रहे रवि लामिछाने को सभी देख रहे हैं । ६ महिना के ही समय मेें रवि लामिछाने गृह मन्त्रालय सहित उपप्रधामन्त्री की महत्वपूर्ण भूमिका में आ गए और हमारे यहाँ हम इतने वर्षो काम कर रहे हैं, पार्टी के भीतर अन्तर संघर्ष कर रहे हैं लेकिन जिम्मेदारी देने का नाम ही नहीं ले रहे हैं । जबकि पार्टी को मालुम है कि अब पार्टी के नेतृत्व और संसद् की भूमिका में युवाओं का प्रभावकारी हस्तक्षेप होनी ही चाहिए लेकिन पार्टी अध्यक्ष को इन सबसे कोई लेना देना नहीं है वो केवल अपना देख रहे हैं । इसलिए बहुत से नेताओं ने समीक्षा करने तथा तत्काल केन्द्रीय कार्यसमिति की बैठक बुलानी चाहिए । कांग्रेस ने एकसाथ सभी अवसर को खो दिया है ।
ये भी सच है कि देउवा हरबार प्रधानमंत्री अचानक से ही बनें हैं कभी ऐसा नहीं हुआ है आमनिर्वाचन खत्म हो और वो प्रधानमंत्री बने हो । बीच में विकसित राजनीतिक घटनाक्रम के कारण ही उनके सत्तारोहण करने का इतिहास है । देउवा २०५२, २०५८, २०६१ २०७४ और ०७८ में प्रधानमन्त्री बने हैं । इससे पिछली बार भी जब वें प्रधानमन्त्री हुए तब भी जनादेश कांग्रेस के पक्ष में नहीं थी ।
और इसबार तो गजब हो गया । सबकुछ हाथ में होते हुए सिर्फ और सिर्फ देउवा ने अपने बारे में सोचा । उनके एक गलत अड़ान से कांग्रेस सत्ता राजनीति के किनारे पर पहुँच गई है । इस घटना ने सभापति देउवा के प्रधानमन्त्री होने की महत्वाकांक्षा को ही नहीं तोड़ा है वरन लाखों कार्यकर्ताओं के मनोबल और आत्मविश्वास को तोड़ा है । पार्टी के बहुत से नेताओं का सपना और सम्भावनाएं टूटी हंै । जिन मतदाताओं ने कांग्रेस को मत दिया उन मतदाताओं का मन टूटा है । पाँच बार  प्रधानमंत्री बन चुके को छठीं बार प्रधानमंत्री ही क्यों बनना है ? अब यह सवाल भी उठाया जा रहा है पार्टी भीतर ।
कुछ आम नागरिक और कुछ नेता तो यहाँ तक कह रहे हैं कि देउवा तो मान गए थे आरजू नहीं मान रही थी । कांग्रेस के कुछ ऐसे नेता जो केवल और केवल देउवा के आगे पीछे डोलते हैं इस खेल में वो सब उनका साथ दे रहे थे । देउवा को दबाब में रखने में सबसे अहम भूमिका थी उनकी पत्नी आरजू । अभी देउवा समूह के भीतर भी इस घटना के लिए सभी एक दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं ।
देउवा का विरोध करना इस आलेख लिखने का उद्देश्य कतई नहीं है ।

एकबार स्मरण करें भारतीय प्रधानमंत्री की लुम्बिनी यात्रा कोउस समय जब हवन हो रहा था तब देउवा के मुँह से लार टपक रहा था । उठने की कोशिश करते समय वो बाल बाल बचें । धन्यवाद देनी होगी भारतीय प्रधानमंत्री मोदी जी को जिन्होंने उन्हें थाम लिया । इससे यह पता चलता है कि वो बीमार है । शपथ ग्रहण के समय में जो उनकी गतिविधि और व्यहार थे उससे साफ पता चल रहा है कि वो शारिरिक और मानसिक रुप से बहुत ज्यादा परेशान थे । उन्हें आराम की सख्त जरुरत है । शरीर से ज्यादा कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है प्रधानमंत्री की कुर्सी भी नहीं । यह बात उन्हें भी समझनी चाहिए ।



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