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नेपाल की ओलीपथगामी कम्यूनिस्ट सरकार : प्रेमचन्द्र सिंह

 
प्रेमचन्द्र सिंह, लखनऊ । नेपाल में भले ही माओवादी कम्यूनिस्ट दल के नेता पुष्पकमल दहल ‘प्रचण्ड’ के नेतृत्ववाली साम्यवादी गठबंधन सरकार की हाथों में सत्ता की बागडोर है, लेकिन सरकार की नीति और एजेंडों का निर्धारण तो एमाले कम्यूनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष के.पी.शर्मा ‘ओली’ की अध्यक्षता में गठित कमिटी ही करेगी जो सरकर की ‘न्यूनतम साझा कार्यक्रम’ निर्धारित करने के लिए अधिकृत है। ढाई साल की प्रथम पाली वाली प्रचंडजी की प्रधानमंत्रित्व वाली सरकार ‘प्रचंड पथ‘ पर नहीं, बल्कि ‘ओली पथ‘ पर ही चलती दिख रही है। नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री के.पी.शर्मा ओली जी की सबसे बड़ी राजनीतिक कमज़ोरी के संबन्ध में नेपाली सत्ता के गलियारे के लोग बस एक ही तरफ़ इशारा करते हैं – राष्ट्रपति माननीया विद्या देवी भंडारी जी। माननीया विद्या देवी भंडारी जी की राष्ट्रपति पद की मियाद इसी साल 2023 तक ही है। माननीया के तीसरे टर्म के लिए नेपाली संविधान में संशोधन से ही उनका राष्ट्रपति भवन (शीतल निवास) में बने रहना संभव है। नेपाल की राजनीतिक नब्ज टटोलने बालों का मानना हैं कि राष्ट्रपति को यदि साध लिया जाए, तो फिर प्रधानमंत्री नहीं भी बनते हैं तो कोई खास फर्क पड़ने वाला नही है। प्रचंड जी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाने के पीछे शायद यही रणनीति रही होगी – प्रचण्ड जी तीसरी बार प्रधानमंत्री बनें तो कोई बात नही, लेकिन राष्ट्रपति का शपथ तो वही लेगा जिसे ओलीजी चाहेंगे।
पूरी दुनिया में जहां दक्षिणपंथी राजनीतिक पार्टियों की सत्तासीन होने का सिलसिला लगातार चल रहा है वही नेपाल में करीब सवा साल से बिखरे हुए वामपंथी दलों की साझा सरकार का सत्ता में पुनः आना नेपाली राजनीति में कोई इत्तेफाक नहीं है। ठीक इसी समय नेपाल में चार वर्षों से तैनात चीनी राजदूत हाओ यांगकी को आसियान का राजदूत बनाकर इंडोनेशिया भेजना और उनकी जगह चीनी विदेश मंत्रालय में नेपाल मामलों के डिप्टी डायरेक्टर रहे चेन सोंग को चीन के नये राजदूत के रूप में नेपाल भेजा जाना पर्याप्त कूटनीतिक इशारा है जिसे नेपाल की पूरी राजनीतिक घटनाक्रम से जोड़कर देखा जाना चाहिए। ऐसा माना जाता रहा है कि चेन सोंग के साथ मिलकर ही हाओ यांगकी नेपाली कूटनीतिक रणनीति को अमली जामा पहनाने में जुटी रही। शायद इसका असर ही है कि के.पी.शर्मा ‘ओली’ जी की अध्यक्षता में गठित कमिटी द्वारा निर्मित ‘न्यूनतम साझा कार्यक्रम’ में चीन द्वारा अधिकृत नेपाली भूभाग की चर्चा ही नही है और उस भूभाग को पुनः नेपाली कब्जे में लाने की बात तो दूर-दूर तक नहीं दिख रहा है। इस घटना से एक संदेश तो स्पष्ट दिखने लगा है कि कही कम्यूनिस्ट सत्ता के साझेदार दोनो नेताओं प्रचण्डजी और ओलीजी के बीच बीजिंग की बफादार बनने की स्पर्धा तो शुरू नही हो गई है।
नेपाल में चीनी परस्त स्पर्धा का परीक्षण वर्ष-2008 में हो चुका है। प्रचंडजी वर्ष-2008 में पहली बार नेपाल के प्रधानमंत्री बने थे, उस कालखंड में नेपाल में रह रहे तिब्बती शरणार्थियों को नेपाली शासन का सबसे अधिक कहर का सामना करना पड़ा। अध्यादेश जारी हुआ कि नेपाल अधिराज्य में तिब्बती बौद्ध किसी प्रकार का प्रदर्शन नहीं करेंगे। उस साल 500 से अधिक तिब्बती नेपाल भर में गिरफ्तार किये गये थे। एक अनुमान के मुताबिक नेपाल मेें 20 हज़ार के आसपास तिब्बती शरणार्थी रहते हैं। प्रचंडजी के बाद जो भी प्रधानमंत्री हुए किसी ने भी तिब्बतियों के प्रति नरमी नहीं बरती और यह सिलसिला बदस्तूर चल रहा है। नेपाल में तिब्बती बौद्धों के मानवाधिकार बाधित करने की हर कोशिशें विगत 14 वर्षों से लगातार चल रही हैं। इन बौद्ध शरणार्थियों की नाकेबंदी की छोटी सी बानगी वर्ष-1984 में श्रीलंका में आयोजित ‘वर्ल्ड बुद्धिस्ट फ्रेंडशिप कांफ्रेंस’ में दिखा, जिसमे प्रस्ताव दिया गया कि एक चीनी बौद्ध मंदिर नेपाल में निर्मित किया जाना चाहिए। इसके बाद वर्ष-1986 में ‘वर्ल्ड फेलोशिप ऑफ बुुद्धिस्ट कांफ्रेंस‘ काठमांडू में हुआ, जिसमें 10वें पणछेन लामा ने इस प्रस्ताव का अनुमोदन किया कि लुम्बिनी में चोंगहुआ टेंपल (चीनी मठ) निर्मित की जाए। दसवें पणछेन लामा उन दिनों ‘चीनी पीपुल्स पार्टी स्टैंडिंग कमेटी’ के ‘वाइस चेयरमैन’ थे और ‘बुद्धिस्ट एसोसिएशन ऑफ चाइना’ के मानद अघ्यक्ष भी थे। तत्समय झाओ पुछू ‘बुद्धिस्ट एसोसिएशन ऑफ चाइना’ के पूर्णकालिक अध्यक्ष थे और उन्होंने लुम्बिनी में चोंगहुआ टेंपल (चीनी मठ) बनाने के प्रस्ताव को तत्कालीन नेपाल नरेश से स्वीकृत करा लिया था। अप्रैल,1996 में जब नेपाली प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा जी चीन की राजकीय यात्रा पर गये,, तो यात्रा के दौरान लुंबिनी में चीनी मंदिर निर्माण वाले मुद्दे पर तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री ली फंग की तरफ़ से इनपर दबाव बनाया गया। देउबाजी नेपाल लौटे और 1 दिसंबर,1996 को लुंबिनी में चोंगहुआ टेंपल (चीनी मंदिर) की आधारशिला रख दी गई। करीब 33 मिलीयन यूआन की लागत से चीनी मंदिर कुछ ही महीने में बनकर तैयार हो गया। तत्कालीन चीनी राजदूत झांग चिउ हुआन ने इस मठ के निर्माण में सबसे अधिक समय दिया। बुद्ध की जन्मस्थली लुंबिनी एक ऐसे सामरिक लोकेशन पर है, जहां से नेपाल के पश्चिमी हिस्से में चीनी गतिविधियों को चलाना आसान हो गया। इस इलाक़े से दलाईलामा के समर्थकों को घीरे-धीरे हाशिये पर डाल दिया गया। नेपाल में चीन की प्रत्यक्ष हस्तक्षेप ने नेपाल जैसे बफर स्टेट को इस तरीक़े से साधा ताकि सीमा पार तिब्बत में उसकी तपिश न पहुंचे और इसमें नेपाली सत्ता प्रतिष्ठान की सक्रिय भागीदारी जगजाहिर है।
फाइनेशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की एशिया पैसिफिक ग्रुप (एपीजी) की नेपाल में हालिया गतिविधि और उनके निष्कर्ष कि नेपाल की लचर कानूनों के कारण वहां आतंकी फंडिंग और मनी लांड्रिंग सरीखा क्रियाकलापों की संभावना बनी हुई है। पाकिस्तानी कुख्यात आतंकियों को संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद द्वारा वैश्विक आतंकवादी सूची में सम्मिलित करने के अनेकों मामलों में चीन द्वारा जिसप्रकार वीटो का इस्तेमाल कर विरोध किया जाता रहा है, उससे उत्पन्न वैश्विक स्थितियां चीन का ऑलवेदर फ्रेंड पाकिस्तान को अंततः एफएटीएफ की ग्रेलिस्ट में जाने का रास्ता साफ कर दिया। परिणामतः पाकिस्तान को अपनी वित्तीय जरूरतों के लिए चीन की गोपनीय तथा मनमानी शर्तों का गुलाम होना पड़ा जिसका प्रतिफल सबके सामने है। हाल में नेपाल की पोखरा एयरपोर्ट का उद्घाटन हुआ है जो चीन की वित्तीय एवं तकनीकी मदद से तैयार हुआ है, इस परियोजना के संबंध में नेपाली आवाम में आमधारणा थी कि यह परियोजना नेपाल-चीन मैत्री के अंतर्गत चीन द्वारा प्रदत्त अनुदान की राशि से निर्मित हुआ है, लेकिन नेपाली अपेक्षाओं के विपरीत चीन ने खुलासा किया कि प्रश्नगत एयरपोर्ट चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशियटिव (बीआरआई) के तहत नेपाल को दी गई ऋण की राशि से निर्मित हुई है। नेपाल में चीनी परियोजनाओं के लिए संपादित द्विपक्षीय अनुबंधों की शर्ते आज भी पाकिस्तान की तरह नेपाली आवाम से गोपनीय रखी गई है।
नेपाल की वर्तमान सरकार और नीति-निर्धारकों के समक्ष गंभीर आर्थिक चुनौतियां हैं जिसमे नेपाल के लिए सस्ता और  विकासोन्मुखी विदेशी निवेश की तलाश उत्साहवर्धक नहीं है। इसके साथ ही नेपाल की बढ़ती व्यापार घाटा, तेजी से घटते विदेशी मुद्रा भंडार और आसमान छूती महंगाई ने आम लोगों के जीवन को प्रभावित किया है। इनका समुचित समाधान से ही नेपाल का विकास और बेरोजगार युवाओं को रोजगार या स्वरोजगार का अवसर मिल पाएगा। आशा है नेपाल की वर्तमान सरकार नेपाली आवाम के प्रति अधिक संवेदनशील और जवाबदेह होगी। लोकतांत्रिक मिजाज वाले लोगों के समक्ष अभी भी बड़ा सवाल यही है कि नेपाल की कम्यूनिस्ट सरकार नेपाल की लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति किस सीमा तक सहज और सदाशय रह पाता है।
प्रेमचन्द्र सिंह

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