माधव नेपाल ने किया ओली से प्रश्न
काठमांडू, ४ माघ–
सरकार गठन हो चुकी है । प्रचंड प्रधानमंत्री बन चुके हैं । मंत्रीमंडल का विस्तार हो चुका है । ओली और प्रचंड एक हो चुके हैं लकिन जहाँ तक बात है एमाले अध्यक्ष केपी ओली और एकीकृत समाजवादी अध्यक्ष माधव नेपाल की तो दोनों के बीच सम्बन्ध अभी भी अच्छे नहीं हंै ।
माओवादी केन्द्र अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल प्रचण्ड के साथ मेलमिलाप करके ओली ने प्रधानमन्त्री ही बना दिया लेकिन विगत एमाले में एक ही समूह में रहे दोनों नेता ओली और नेपाल नहीं मिल सके हैं ।
मंगलवार की ही बात है प्रधानमन्त्री के सरकारी निवास में आयोजित सर्वदलीय बैठक में यही कुछ नजारा देखने को मिला है ।
प्रधानमन्त्री प्रचण्ड ने सर्वदलीय बैठक में उनपर जो विश्वास किया गया है उसके लिए सभी दलों को धन्यवाद दिया । और आगे भी सहयोग की अपेक्षा रखी है । प्रचण्ड ने कहा कि मैं एक गठबन्धन से प्रधानमन्त्री बना हूँ लेकिन और पार्टी के प्रति भी मेरी कहीं न कहीं दायित्व है । आइये सहमति से ही राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, सभामुख इन सभी पदों में साझा दृष्टिकोण बनाए ।
उन्होंने यह भी कहा कि – एमाले के साथ बातचीत आगे बढ़ चुकी है उसके अनुसार ही इन पदों में उम्मीदवार आएंगे ।
एमाले अध्यक्ष केपी ओली ने प्रचण्ड की बातों को और भी छोटा करते हुए कहा कि राष्ट्रपति , सभामुख के बारे में हमने बातचीत कर ली है । अब उसमें कांग्रेस के साथ ही अन्य पार्टी सहमत हो गई तो हो गया न ? ओली के इस कथन के बाद ही बालुवाटार में नेताओं में असन्तुष्टि दिखने लगी ।
इसी बीच जब एकीकृत समाजवादी अध्यक्ष नेपाल की बोलने की बारी आई तो उन्होंने ओली की ही ओर देखकर कहा कि ये तो बड़े आश्चर्य की बात है जो जैसे जैसे आप कहेंगे वैसे वैसे सभी बात मानी जाएगी क्या यही सहमति है ? क्या हमारा केवल इतना ही काम है कि आपकी बात को मानते जाए ? इसपर ओली ने कोई जबाब नहीं दिया । यहाँ तक की कितनों की बात उन्होंने सुनी भी नहीं और उठकर चले गए ।
बैठक में सहभागी पूर्वप्रधानमन्त्री बाबुराम भट्टराई के अनुसार प्रचण्ड ने देउवा के साथ अन्य नेताओं से भी पुछा था कि सभी यदि मुझे विश्वास का मत देते हैं तो बाद में प्रतिपक्ष होगा या नहीं ?देउवा ने प्रचण्ड को समर्थन देने के बाद भी कांग्रेस ही प्रमुख प्रतिपक्ष रहेगी का जिक्र किया था ।उन्होंने बार बार एक ही बात पर जोर दिया कि कि कम से कम यह गठबन्धन पाँच वर्ष चले । साथ ही उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि शान्ति प्रक्रिया के साथ और भी बहसत सारे काम बांकी हैं । संघीयता कार्यान्वयन में चुनौती है । सीमा विवाद भी है । लिपुलेक और लिम्पियाधुरा के विषय बांकी है । इसलिए सहमति में ही जाना चाहिए । उन्होंने कांग्रेस के साथ ही अन्य दलों के नेताओं को भी सोचने के लिए कहा ।

