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मधेशी दलों की मिलन, एकता, गठबन्धन या सहकार्य संभव है ? : कैलाश महतो

 
कैलाश महतो, पराशी । मधेशी दलों के बीच में एकता, सहकार्य, गठबन्धन या मिलन की बात आजकल मधेशी जनों ने पून: व्यापक कर दिया है । यह बात खास करके तबसे व्यापक होने लगा है, जबसे केपी-प्रचण्ड सरकार ने सरकार और जनमत के बीच हुए मौखिक सहमति के विपरीत जनमत को उसके उद्योग, वाणिज्य तथा आपूर्ति मन्त्रालय नहीं दिया है ।
संयोग से इस बात की चर्चा जनमत अध्यक्ष डा.राउत स्वयं ने कैयन अभिव्यक्ति और अन्तरवार्ताओं में किया है । जिन पूर्व (जनमत से पहले का) मधेशी दलों और नेतृत्वों को सिके जी ने जथानाम गालियां दी थी, एक्सपायर्ड मेडिसिन और बेकाम इंजनों की गाड़ियां कही थीं, आज उन्हीं बेकाम, एक्सपायर्ड और निकम्मे दलों और नेताओं से मिलने का प्रस्ताव कर रहे हैं । प्रतिउत्तर में सिके जी से अनाहक गाली और तिरस्कार प्राप्त पूर्व मधेशी नेताओं ने भी बडे चालाकी और सौम्य तरीके से मधेशी दलों के बीच एकता, सहकार्य या गठबन्धन हो सकने की बात कहते सुना जा रहा है ।
मजबूरी में मिलन हो सकता है । मिलन आजसे पहले भी कई बार कई रुपों में हो चुकी हैं । मगर वह आवश्यकता न तो जसपा को है, न लोसपा को । क्योंकि ११ सालों के सघन मधेश आन्दोलन, क्रान्तिकारी नारे और मधेश को टच करने बाले मजबूत मुद्दों के बावजूद सिके जी ने वह रवाफ कायम नहीं रख पाये, जिसकी मधेश को उम्मीद थी । प्रत्यक्ष में एक सीट भी मिली, तो वह सिके जी के प्रति उत्साहितजन की नहीं, उपेन्द्र जी के प्रति व्याप्त जन आक्रोश के कारण ।
मधेश युद्ध में होता, तो या तो इसकी जीत होती, या हार । मगर युद्ध अनिवार्य है । मधेश केवल रक्षात्मक अवस्था में है । यह न तो आक्रमणात्मक अवस्था में है, न प्रतिकारात्मक अवस्था में । डिफेन्स मोड में रहे व्यक्ति, समय, अवस्था, स्थान या देश को योद्धा नहीं कहा जा सकता ।
युक्रेन को हम युद्ध लडता देश नहीं कह सकते । वह केवल रक्षात्मक अवस्था में है, और जो समाज या देश रक्षात्मक अवस्था में हो, वह युद्ध नहीं लड सकता । युक्रेन पर रुस ने आक्रमण किया है । युद्ध रुस लड रहा है ३०-३२ देशों से, जो युक्रेन को सहयोगी के रुप में दिख रहे हैं । युक्रेन भी रुस के अन्दर कोई आक्रमण किया होता, तो उसे युद्ध नाम दिया जा सकता था । वरना रुस – युक्रेन का कथित युद्ध तो बस् – इतना है, जैसे कोई जमिन्दार या शक्तिशाली व्यक्ति किसी गरीब और कमजोर को सता रहा होता है, पीट रहा होता है और उस गरीब को कुछ बटोही या पड़ोसी उस आक्रान्ता के विरुद्ध उकसाकर गरीब को उसके आक्रान्ता से लडा रहा होता है ।
जब किसी अन्य के सहयोग से वह गरीब लडता है, तो उसके दिमाग में भी यही होता है कि उसे भी अपने आक्रान्ता को कमज़ोर करना है, बदला लेना है । उसके दिमाग में कार्ल मार्क्स का यह उक्ति सवार रहता है कि अगर वह जीत गया, तो अपने शक्तिशाली दुश्मन को मटियामेट कर देगा, और हार गया तो उसे गवांना ही क्या और कितना है ! दूसरी ओर सहयोगी पडोसी और लोगों का रणनीति यह होता है कि कुछ सहयोग और लगानी से अगर उसके समान के शक्तिशाली शक्ति की क्षय होती है, तो उससे उन्हें बहुत तरहों से फायदे होंगे । या दो पड़ोसियों के झगड़े में घुसना बाहर बालों के लिए आनन्द और फायदे दोनों होने के कारण बाहर बाले कुछ लगानी कर देते हैं । वही रुस और युक्रेन के झगड़े में दिख रहे हैं । वही चीज नेपाल में पहाड़ी और मधेशी शासकों के बीच में चल रही हैं ।
चुनावी नेताओं ने अपने बीच में मोर्चाबन्दी, राजनीतिक तालमेल, आन्दोलनीय सहकार्य या संघर्ष के लिए एकता या गठबन्धन करने की जो प्रस्ताव लाया है, वह कब और क्यों ? – इन बातों पर ध्यान देना उपयुक्त होगा । वस्तुत: यह प्रस्ताव उनके द्वारा तब लाया गया है, जब जनमत पार्टी को उसके साथ किये गये वायदे के मन्त्रालय सरकार ने नहीं दिया है । अगर वह मिल गया होता, तो जसपा और लोसपा वगैरह से किसी प्रकार की मोर्चाबन्दी या सहकार्य करने की बात नहीं आती ।
सरकार में वादे के अनुसार जाने में जनमत को हो रहे असहज परिस्थितियों के बीच ही संयोग से माघ ५ बाला मधेशी शहीद दिवस पड गया, और मधेश में व्याप्त जनमत नेतृत्व विरुद्ध के आक्रोश को मत्थर करने हेतु संसद में शहीदों के प्रति मौन धारण करने/करवाने का एक विशिष्ट स्टण्ट कर दी गयी । उसका छप्पर फाड नतिजा यह निकला कि उनके प्रति रहे सारा आक्रोश सिके जी के काबिलियत और छक्के पञ्जे साहस पर थम गया । मधेशी लोग भावना और तुरन्त के परिणामों में विश्वास रखने के कारण सिके जी का वह मधेशी शहीद प्रति का एक मिनेट का मौन धारण “वाह वाही” में तब्दील हो गया, जिसे वास्तव में न तो शहीद सम्मान से कोई मतलब है, न मधेश समस्या समाधान के मुद्दों से ।
राजनीति में बेइमानी होता है । झूठ भी बोला जाता है । मगर उससे अगर किसी निर्दिष्ट समाज को लाभ हो, तो वह झूठ और बेइमानी परोपकार और सेवा बन जाता है । सेतो पाटी के अन्तरवार्ता में सिके जी ने अपने को पारदर्शी जब कहा, तो न जाने क्यों…उनके बदले मुझे शर्म से पानी पानी होना पडा ।
गौर करने बाली बात यह है कि जब सिके जी ने यह कहा है कि “अब निर्णायक आन्दोलन हुनुपर्छ”, तो इससे पहले क्या कोई निर्णायक आन्दोलन नहीं हुए थे ? सद्भावना ने कहा था, ” अभी नहीं, तो कभी नहीं “, तत्कालीन फोरम नेपाल ने कहा था, ” आर पार की आन्दोलन है”, तत्कालीन तमलोपा ने “सरकार नहीं – सम्मान चाहिए, सत्ता नहीं, प्रभु सत्ता चाहिए” और महन्थ ठाकुर नेतृत्व के जसपा के आन्दोलन का नारा था, “मरे तो मुक्ति, जीते तो मधेश” । उसके साथ ही २०७२ के संविधान जारी पश्चात तत्कालीन मधेशी मोर्चा द्वारा ६-७ महीने का अद्वितीय मधेश बन्द आन्दोलन चला था । परिणाम क्या हुआ ? वह आन्दोलन सफल सफल क्यों नहीं रहा ? क्योंकि उस आन्दोलन में सहभागिता केवल पार्टियों के नेता, कार्यकर्ता और कुछ शुभ चिन्तकों की थी, समान्यजन की नहीं । जो लगे भी थे, वे रात के समय तस्करी करवाते रहे । बीरगञ्ज ड्राइ पोर्ट को खोलने के लिए सत्रह अरब की लेनेलेन (कमिशन) का समाचार तब ही बाजार में व्याप्त हुआ था ।
यह बात तय है कि मौजूदा सरकारी मधेशी पार्टियाँ मिलकर कोई मोर्चा या गठबन्धन करती हैं, सरकार के विरुद्ध आन्दोलन करती हैं, तो उस आन्दोलन से राज्य को कुछ बिगडने बाला नहीं होगा । हाँ, चुनाव लडकर भी सरकार में जाने से पहले अपने मुद्दों को सरकार के समक्ष रखा जाता, और राज्य द्वारा अस्वीकार करने के बाद केवल जनमत पार्टी ही आन्दोलन में आ जाता – तो किसी पूर्व सरकारी मधेशी पार्टियों से सहकार्य या गठबन्धन करने की आवश्यकता ही नहीं पडती । वह अपने आपमें काफी होता । जनता पूरा साथ देती । मगर अपने ढंग का मन्त्रालय न मिलने पर क्षुब्ध होकर शहीद के नाम पर संसद में स्टण्टबाजी करना, सारे मधेशी दलों के साथ मोर्चाबन्दी करने और निर्णायक आन्दोलन करने की धमकी देना अर्थहीन है ।
यह सत्य सावित है कि सरकारवादी पार्टियाँ मिलकर भी आन्दोलन करेंगी, तो उसका अन्तिम निष्कर्ष सरकार से मोल मोलाई (बार्गेनिङ्ग) करके पार्टीगत और व्यक्तिगत लाभ लेना होता है । प्रमाणित नहीं करना होगा कि जिन पार्टियों और राजनीतिक संगठनों ने नेपाल के संविधान-२०७२ को न मानने, संशोधन और पुनर्लेखन करने की बात कही थी, उनके साथ ही स्वतन्त्रता की बात करने बालेतक ने उसी अस्वीकृत संविधान के तलवे नीचे जी रहे हैं ।
मधेश का वृहत् आन्दोलन किसी राजनीतिक दल, सरकारी पार्टियाँ और अपने वादों को बेचकर पलने बाले नेतृत्व और संगठनों के मोर्चाबन्दी या गठजोड़ से सफल आन्दोलन नहीं हो सकता । उनके भरपर मधेश में होने बाला हर आन्दोलन राज्य के साथ लेनदेन में जाना तय है । क्योंकि आन्दोलन करने की धमकी देना ही लेनदेन पर बात बिगड़ने के कारण है, मधेश या पहाडी जनजातियों के मुक्ति के लिए नहीं ।
मधेश को इस बात से वाकिफ होना बेहद जरुरी है कि स्वच्छ और सत्ता से बञ्चित रहे पार्टी और नेतृत्व भी अब उन्हीं परम्पराओं में सामेल हो चुके हैं, जिन्हें कुछ माह पूर्व किसी महानायक ने भ्रष्ट, कमिने, कमिशनखोर, अनियमित,  प्रेमी/प्रेमिकावाद, भाइ/भौजीवाद, पैसावाद और जातिवाद पर खड हो गया है ।
इसिलिए भी, कथमकदाचित मधेश आन्दोलन हुआ भी, तो वह उसके जात, परिवार, भाइ, पटिदार, पैसे बाले मालदार, आदि के लाभ में ही काम आयेंगे, मधेश और समान्य मधेशियों ले लिए नहीं ।
प्रश्न : मधेशी दलों की मिलन, एकता, गठबन्धन या सहकार्य संभव है ?
उत्तर : संभव है । मगर मधेश को उसका परिणाम मिलना असंभव है ।

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