अध्यादेश और काला सच : लिलानाथ गौतम
लीलानाथ गौतम, हिनालिनी अंक जनवरी । प्रतिनिधिसभा सदस्य और प्रदेशसभा सदस्य पद के लिए सम्पन्न चुनाव का अंतिम परिणाम सार्वजनिक हो चुका है । चुनावी परिणाम के अनुसार अब नई सरकार बनने वाली है । अर्थात् वर्तमान सरकार ‘टेक ओभर’ सरकार है । ऐसी सरकार को कोई भी महत्वपूर्ण निर्णय करने का अधिकार नहीं है । जितना जल्द हो सके जनादेश अनुसार नयी सरकार निर्माण के लिए भूमिका निर्माण करना ही वर्तमान सरकार की जिम्मेदारी है । लेकिन ऐसी ही पृष्ठभूमि में सरकार मुलुकी फौजदारी कार्यविधि संहिता– २०७४ संशोधन के लिए एक अध्यादेश लेकर आयी है । उक्त कानून के दफा ११६ में एक उपदफा जोड़ कर संशोधन के लिए प्रस्तुत अध्यादेश को लेकर चारो ओर सरकार की आलोचना हो रही है । अध्यादेश राष्ट्रपति के टेबल पर है ।
उक्त अध्यादेश पास होगा या नहीं ? यह राष्ट्रपति के विवेक पर निर्भर है । कई लोगों का कहना है कि नागरिकता विधेयक की तरह ही यह अध्यादेश भी राष्ट्रपति असफल बनाने की कोशिश में हैं । पूर्व प्रधानन्यायाधीश और पुलिस प्रमुखों से उन्होंने इसके संबंध में विचार–विमर्श भी किया है । दूसरी ओर अध्यादेश वापस करने के लिए स्वयम् सत्ताधारी दल नेपाली कांग्रेस से आबद्ध कई नेताओं ने भी आवाज उठाया है । विशेषतः कांग्रेस महामन्त्री गगन थापा ने खुलकर इसका विरोध किया है । अधिकांश पूर्व पुलिस प्रमुख और पूर्व प्रधानन्यायाधीशों ने भी सरकार की नीयत पर प्रश्न किया है और अध्यादेश वापसी के लिए आग्रह किया है ।
मुलुकी फौजदारी कार्यविधि संहिता २०७४ की दफा ११६ में पहले ८ उपदफा थे, उसमें एक उपदफा (उपदफा–९) जोड़ कर सरकार अध्यादेश लायी है, जहां गम्भीर अपराध में संलग्न व्यक्तियों को भी आममाफी का प्रावधान है । उपदफा– ९ में लिखा है– ‘इस दफा में जहां जो कुछ भी लिखा हो, अगर कोई राजनीतिक दल तथा समूह ने देश की विद्यमान राजनीतिक प्रणाली के प्रति असहमत होकर हिंसात्मक क्रियाकलाप संचालन कर ली है और उस तरह की राजनीतिक दल तथा समूह शान्तिपूर्ण राजनीति की मूल धार में आने के लिए नेपाल के संविधान और प्रचलित कानून के अधीन में रह कर शान्तिपूर्ण राजनीतिक क्रियाकलाप संचालन करने की प्रतिबद्धता व्यक्त कर नेपाल सरकार और ऐसी राजनीतिक दल तथा समूह के बीच राजनीतिक प्रकृति के मुद्दों को लेकर सम्झौता हुई है और नेपाल सरकार वादी होकर दायर मुद्दा वापस के लिए सहमति हुई है तो ऐसी सहमति के अनुसार वैसी राजनीतिक दल तथा कार्यकर्ता विरुद्ध नेपाल सरकार वादी होकर दायर मुद्दा वापसी के लिए कुछ बाधा अड़चन नहीं होगी, ऐसी मुद्दा किसी भी तह की अदालत में पंजीकृत क्यों न हो । ’
उपदफा–९ में उल्लेखित प्रावधान अगर राष्ट्रपति के द्वारा पास होकर कानून बन जाता है देश के विभिन्न जेलों में रहे बहुत सारे कैदियों को जेल मुक्त किया जा सकता है । विशेषतः राजनीतिक दलों से जुड़े हुए व्यक्तियों को जेल से मुक्त कराने के उद्देश्य से यह अध्यादेश लाया गया है । स्मरणीय बात यह है कि राजनीति के नाम से जघन्य अपराध संलग्न कई व्यक्ति आज देश के विभिन्न जेलों में कैद हैं । उन लोगों को जेल से मुक्त कराने के लिए ही सरकार ने अध्यादेश का सहारा लिया है । हो सकता है कि जेल में रहे कैदियों में कुछ निर्दोष भी हों । लेकिन यह बहस और छानबीन का अलग विषय है ! अगर कोई निर्दोष हैं तो उनको अवश्य ही जेल से मुक्त करना होगा ।
खैर ! पुराने प्रावधान के अनुसार जिला अदालत में विचाराधीन मुद्दे को ही सरकार विशेष अध्यादेश लाकर वापस कर सकती है । इसके लिए संविधान की धारा ११४ की दफा–१ में एक प्रावधान है । जहां लिखा है कि संघीय संसद् की दोनों सदन की अधिवेशन संचालन नहीं है और सरकार को तत्काल कुछ करने की आवश्यकता पड़ती है तो मन्त्रिपरिषद् की सिफारिस में राष्ट्रपति द्वारा अध्यादेश जारी किया जाता है । संविधान में विद्यमान इसी प्रावधान के अनुसार सरकार मुलुकी फौजदारी कार्यविधि संहिता– २०७४ संशोधन के लिए अध्यादेश लायी है, जो संवैधानिक और राजनीतिक दोनों दृष्टिकोण से गलत है । स्मरणीय बात यह भी है कि अध्यादेश की तत्कालीन आवश्यकता कुछ भी नहीं है । इस का एक ही उद्देश्य भावी सरकार निर्माण को सहज बनाना है ।
हां, चुनावी परिणाम के अनुसार किसी भी पार्टी की एकल सरकार बननेवाली नहीं है । भावी सरकार निर्माण के लिए दो और दो से अधिक राजनीति दलों के बीच गठबंधन अनिवार्य है । संवैधानिक प्रावधान के अनुसार सरकार निर्माण के लिए संसद् में कम से कम १३८ सांसदों का समर्थन अनिवार्य है । पाँच दलीय वर्तमान सत्ता गठबंधन इसके करीब है । अगर गठबन्धन में एकता कायम रहेगी तो इसके पास आज के दिन १३४ सांसद् हैं । सरकार निर्माण के लिए न्यूनतम और ४ सांसदों का समर्थन आवश्यक है । अगर उल्लेखित संख्या में समर्थन मिल जाता है तो वर्तमान प्रधानमन्त्री शेरबहादुर देउवा के ही पुनः प्रधानमन्त्री बनने की सम्भावना है । इसके लिए देउवा भरपूर प्रयास कर रहे हैं ।
हां, फिर प्रधानमन्त्री बनने के लिए ही देउवा ने उक्त अध्यादेश लाया है । अध्यादेश का काला सच यही है कि पुनः सत्ता प्राप्ति के लिए देउवा कुछ भी करने के लिए तैयार हैं । अध्यादेश का तत्कालीन और मुख्य उद्देश्य संसद् में नवप्रवेशी नागरिक उन्मुक्ति पार्टी और जनमत पार्टी से जुड़ा हुआ है । देउवा की अपेक्षा है कि उल्लेखित दो पार्टी से आबद्ध कुछ बन्दियों को जेल से मुक्त कर दिया जाता है तो उनका समर्थन उनके लिए रहेगा । विशेषतः वि.सं. २०७२ साल भाद्र ७ गते की टीकापुर हत्याकाण्ड के अरोपी और फौजदारी कसूर में जेल में रहे रेशम चौधरी की रिहाई के लिए यह अध्यादेश लाया गया है । साथ में जनमत पार्टी और नेकपा माओवादी (विप्लव समूह) से आबद्ध अन्य कार्यकर्ताओं की रिहाई भी तत्कालीन उद्देश्य है ।
आज कई राजनीतिक पार्टी से आबद्ध नेता तथा कार्यकर्ता, जो जघन्य अपराध के आरोप में जेल में हैं, इसी अध्यादेश के बल पर उन लोगों की रिहाई हो रही है । एक दशक पूर्व माओवादी द्वारा सञ्चालित सशस्त्र युद्ध, नेत्रविक्रम चन्द (विप्लव समूह) द्वारा संचालित हिंसात्मक गतिविधि में संलग्न व्यक्ति, मधेश आन्दोलन के नाम में हुए मानवता विरोधी आन्दोलन में संलग्न व्यक्ति आदि को भी इसी नये अध्यादेश के बल पर जेल से मुक्त करने की कोशिश है । अध्यादेश के विरुद्ध बोलनेवाले लोगों का यह भी कहना है कि इसी अध्यादेश के आधार पर जेल में रहे कांग्रेस नेता आफताब आलम को भी जेल मुक्त करने की साजिश है । आलम वही व्यक्ति हैं, जिन्होंने वि.सं. २०६४ साल में सम्पन्न संविधानसभा चुनाव से पूर्व कई व्यक्तियों को जिन्दा पकड़कर सामूहिक रूप में आग में डाल दिया था । उक्त घटना के मुख्य दोषी आलम प्रधानमन्त्री देउवा से निकट व्यक्ति माने जाते हैं, आलम इसी आरोप में आज जेल में हैं ।
इसीतरह प्रधानमन्त्री, सभामुख और मन्त्री भी बन चुके माओवादी नेताओं के विरुद्ध भी मानवता विरोधी अपराध करने का आरोप है । मानवता विरोधी अपराध के आरोप में माओवादी के कई नेताओं के विरुद्ध देश के विभिन्न तह के अदालत में दायर मुद्दा आज भी विचाराधीन है । इसी मुद्दा को लेकर कुछ लोग कहते हैं कि माओवादी से पीडि़त व्यक्ति को न्याय दिलाने के लिए इस मुद्दा को अन्तर्राष्ट्रीयकरण करना चाहिए, माओवादी नेताओं को हेग (अन्तर्राष्ट्रीय अदालत) ले जाना चाहिए । बारबार उठनेवाले ऐसे ही मुद्दों के कारण आज भी शान्ति सम्झौता में उल्लेखित प्रक्रिया पूरी नहीं हो पा रही है । जिसके चलते माओवादी के कई नेता डर रहे हैं कि कहीं उन लोगों को भी जेल जाना ना पड़े । अध्यादेश के भीतर अन्तरनिहित दूसरा काला सच यह भी है ।
इसीलिए अध्यादेश के पक्ष में माओवादी सम्बद्ध दो पूर्व प्रधानमन्त्री पुष्पकमल दाहाल ‘ प्रचण्ड’ और डॉ. बाबुराम भट्टराई भी दिखाई देते हैं । प्रतिनिधिसभा में कुल ३ सीटों में जीत हासिल करनेवाली नागरिक उन्मुक्ति पार्टी के नेतृत्वकर्ता रेशम चौधरी से जेल में जाकर मिलना इसका संकेत है । स्मरणीय है– प्रचण्ड और बाबुराम अपराध को राजनीतिकरण करनेवाले प्रमुख पात्रों में से हैं । अपनी सत्ता बचाने के लिए हो या अपराध को राजनीतिक रंग देकर कानूनी राज्य का उपहास करने लिए, आज तक कोई भी पीछे नहीं हटे हैं । वर्तमान प्रधानमन्त्री देउवा द्वारा प्रस्तुत वर्तमान अध्यादेश का काला सच भी यही है ।


