कांग्रेस की अदूरदर्शिता : अजय कुमार झा
है, सदं ेह नहीं है । सशं य का अर्थ इनडिसीजन है । अनिश्चय आत्मा, जिसका कोई भी निश्चय नहीं है; सकं ल्पहीन, जिसका कोई सकं ल्प नहीं है; निणर्य रहित, जिसका कोई निणर्य नहीं है; विललेस, जिसके पास कोई विल नहीं है । सशं य चित्तकीउसदशाकानामहै,जबमनइर्द र– आर, यह या वह, इस भांि त सोचता है ।”
अज्ञः च अश्रदृधानः च संशय–आत्मा विनश्यति । न अयं लोकः अस्ति न परः न सुखं संशयात्मनः ।।
ओ ४–४० ।।

अजयकुमार झा, हिमालिनी अंक दिसम्बर ।
सशंय अथार्त निणर्य न कर पाने की अवस्था, व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के पतन का सबसे बडाÞ कारण है । स्वयं पर सशं य हमें हमारी पणर््ू ा क्षमता से परिचित ही नहीं होने देता । हरेक के भीतर परमात्मा समान रूप से विराजमान है, अब यह उस पर निभर्र करता है कि वह अपने मन को एक चम्मच जितना बनाए या एक विशाल सागर जितना । हम अपनी सजगता और विश्वास के द्वारा ही मन की अज्ञात शक्तियों का पता पा सकते हैं जो भीतर हैं । अपने आस–पास के व्यक्तियों पर सशं य और भी हानिकारक है, यह मन पर एक ऐसा आवरण डाल देता है कि हमेंउनकीसच्चीऔरअच्छीबातेंभीनजरÞ नहीं आतीं । हम वास्तव में उन व्यक्तियों से परिचित ही नहीं हो पाते, बल्कि अपने चारों ओर बने एक दायरे में ही कैÞद रह जाते हैं और जीवन प्िर तपल बीतता जाता है ।
एक बहुत अदभुत विचारक डेनमार्क में हुआ, सोरेन कीर्कगार्ड, उसने एक किताब लिखी है, नाम है, ईदर–आर–यह या वह । किताब ही लिखी हो, ऐसा नहीं; खुद भी इतने ही संशय से भरा था । एक युवती से प्रेम था, लेकिन तय न कर पाया वर्षों तक, विवाह करूं या न करूं! तय न कर पाया यह कि पे्रम विवाह बने या न
बने! इतना समय बीत गया कि वह युवती थक गई।उसनेविवाहभीकरलिया।तबएक दिन उसके घर खबर करने गया कि मैं अभी तक तय नहीं कर पाया हूं, पर पता चला कि अब वह युवती वहां नहीं है । उसका विवाह हुए काफी समय हो गया है ।
इस सोरेन कीर्कगार्ड ने किताब लिखी, ईदर–आर–यह या वह ? उसे अनेक बार लोगों ने चौरस्तों पर खडेÞ देखा, दो कदम इस रास्ते पर बढ़ते, फिर लौट आते; फिर दो कदम दूसरे रास्ते पर बढ़ते, फिर लौट आते । गांव के बच्चे उसके पीछे दौड़ते और चिल्लाते, ईदर–आर–यह या वह! उसकी पूरी जिंदगी ऐसी ही इनडिसीजन में–टु बी आर नाट टु बी, होऊं या न होऊं, करूं या न करूं, में गुजर गई ।
जबचित्तऐसेसशं यसेबहतु गहनरूपसे भर जाता है, तो विनाश को उपलब्ध होता है । क्यों ? क्योंिक जो यही तय नहीं कर पाता कि करूंयानकरू,ं वहकभीनहींकछु करपाता। जो यही तय नहीं कर पाता कि यह हो जाऊं या वह हो जाऊ,ं वह कभी भी कछु नहीं हो पाता ।
सजृ न और विकास के लिए निणर्य चाहिए, असशं य निणर्य चाहिए । विनाश के लिए अनिणर्य काफी है । विनाश के लिए निणर्य नहीं करना पडतÞ ा । किसी भी व्यक्ति को स्वयं को नष्ट करना हो, तो इसके लिए किसी निणर्य की जरूरत नहीं होती । सिर्फ बिना निणर्य के बैठे रहे,ं विनाश अपने से घटित हो जाता है । किसी को पवर्त शिखर पर चढनÞ ा हो, तो श्रम करना पडतÞ ा है, निणर्य लेना पडतÞ ा है । लेकिन पत्थर की भांित पवर्त शिखर से लढु कÞ ना हो घाटियों की तरफ, तब किसी निणर्य की कोई जरूरत नहीं होती और श्रम की भी कोई जरूरत नहीं होती । इस जगत में पतन सहज घट जाता है, बिना निणर्य के । इस जगत में विनाश स्वयं आ जाता है, बिना हमारे सहारे के । लेकिन इस जगत में
सजृ न हमारे सकं ल्प के बिना नहीं होता है । इस जगत में कछु भी निमिर्त हमारी परू ी की परू ी श्रम, शक्ति, चित्त, शरीर, सबके समाहित लग जाए बिना, इस जगत में कछु निमिर्त नहीं होता है । विनाश अपने से हो जाता है ।
नेपाली कागं े्रस, जो लगभग आठ दशकों से लोकतत्रं की स्थापना, सस्ं थागत विकास और स्थिरता के लिए काम कर रही है, न केवल नेपाल में वरन सक्रिय पाटिर्य ों में सबसे परु ानी और परिपक्व पार्टी है, बल्कि यह एक ऐसी पार्टी के रूप में भी जानी जाती है जो लगातार इसके लिए खडीÞ होती है । इस पार्टी के राजनीतिक सिद्धातं और दशर्न का पभ्र ाव न केवल दक्षिण एशिया में बल्कि विश्व की वतर्म ान राजनीतिक व्यवस्था में भी पाया जाता है । अपनी स्थापना के बाद से नेपाली कागं े्रस लोकतांि त्रक समाजवाद को अपना मलू सिद्धातं और वैचारिक आधार को समकालीन द्विध्रव‘ ीय राजनीतिक दशर्न और विचार के सश्ं लेषण के रूप में मानती रही है । इसी के आधार पर उनके तौर–तरीके, नीतियां और कायत्र्र mम तय किए जाते हैं । २०३६ के आदं ोलन मे,ं २०३७ में हएु जनमत सगं ह्र और २०४२ के सत्यागह्र मे,ं नेपाली वामपथं ी आदं ोलन के बहदु लीय और लोकतत्रं समथर्क –मनमोहन अधिकारी और साहना का सीपीएन–माक्सर्व ादियों के साथ राजनीतिक सहयोग था । इसी समय, २०४६ के अतं में पहले और लोकपिय्र जन आदं ोलन मे,ं नेपाली कागं े्रस के प्िरसद्ध नेता गणेशमानसिहं केनेतत्ृवमेंअधिकाशं कम्युिनस्टों ने एकदलीय पचं ायत पण््र ााली को समाप्त करने के लिए भाग लिया । नेपाल में बहदु लीय लोकतत्रं की बहाली के बाद, नेपाली कागं े्रस के तत्कालीन अध्यक्ष कष्ृ ण पस्र ाद भट्टराई के नेतत्ृ व में एक राजनीतिक गठबधं न, यानी एक सयं त्तु m सरकार का गठन किया गया था; जिसे स्वणिर्म काल माना जाता है ।
नेपाल में चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों के बीच चुनावी गठबंधन या तालमेल होता आया है, न केवल इस बार, बल्कि २०४८ में आम चुनाव और २०४९ में स्थानीय चुनाव में, विभिन्न वामपंथियों के बीच चुनावी तालमेल और गठबंधन हुआ था–नेपाल के राजनीतिक दलों ने ।।।एक वाम, एक ठाम’ के नारे के साथ प्रदर्शन किया । छोटे राजनीतिक दलों के बड़े राजनीतिक दलों के साथ समझौते करके
चुनाव के दौरान राजनीतिक गठजोड़ में प्रवेश करने के भी कई मामले हैं । जिसे नेपाली कांग्रेस अब तक गंभीरता से नहीं ले सकी । ऐसा भी कह सकते हैं कि काँग्रेस के शीर्षस्थ नेता बामपंथियों के कूटनीति को समझने मे शुरू से ही भूलें करता आ रहा हैं । आज फिर कांग्रेस उसी मोड पर खड़ा पश्चाताप की अग्नि में झुलस रहा है । आंतरिक कलह और सत्ता मोह इसका एक प्रमुख कारण जरूर है; लेकिन इसके साथ ही पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व और शक्ति केंद्र के रूप मे विगत के ७५ वर्षों से जो स्वरूप दिखाई देता आ रहा है, वह लोकतंत्र के संरक्षक के रूप मे नहीं वल्कि मुठ्ठी भर लोगों के परिबार के पोषण और संरक्षण मे समर्पित पार्टी के रूप में हम देखते हैं ।
इन पद लोलपु नेताओं के कारण स्थापना के बाद से अब तक पार्टी में दो पम्र खु विभाजन हो चकु े हैं । विभाजन के समय दोनों बार सरकार का नेतत्ृ व कागं े्रस के हाथ में था । २०० ९ में जब पार्टी पहली बार विभाजित हइु र्, तब
मातकृ ापस्र ाद कोइराला पध्र ानमत्रं ी थे । बीपी कोइराला पार्टी अध्यक्ष थे । २०५९ में दसू री बार सरकार का नेतत्ृ व शेर बहादरु देउबा ने किया था । अध्यक्ष गिरिजा पस्र ाद कोइराला थे । सरकार का नेतत्ृ व करने वाले देउबा को पार्टी ने निदेर्श दिया था कि वह २०५९ में माओवादी जनयद्धु को दबाने के लिए सकं ट की अवधि को आगे न बढाÞ ए । माओवादी सघं र्ष अपने चरम पर था । देउबा ने पार्टी के निदेर्श ों की अवहेलना की और सकं ट की अवधि बढाÞ दी । कोइराला केदं ी्र य समिति में बहमु त में थे । उन्होनं े पार्टी की बैठक की और देउबा के खिलाफ कारर्व ाई की । देउबा ने ४ जनू २०५९ को बानेश्वर में अपनी पार्टी के पदाधिकारियों से मलु ाकात कर एक नई पार्टी नेपाली कागं े्रस (डेमोक्रेटिक) के गठन की घोषणा की । ध्यातव्य हो ! उस समय देउबा को गोपालन श्रेष्ठ, पक्र ाशमन सिहं , विजयकमु ार गच्छदार, विमलेदं ्र निधि, बालकष्ृ ण खान, पणर््ू ा बहादरु खडकÞ ा जैसे नेताओं का समथर्न पा्र प्त था । पार्टी के विभाजन के पाचं साल बाद, दोनों कागं े्रस फिर से एकजटु हो गर्इं और कोइराला अध्यक्षबनेरहे।इसतरहकेदं ी्रयमढू तÞ ाकेबीच कायर्क तार्अ ों ने अपनी इर्म ानदारी और सक्रिय भागीदारी से पार्टी के अस्तित्व को सुिनश्चित बनाए रखने में अहम भूि मका निभाई । आज भी नेतत्ृ व असक्षम पम्र ाणित हो चकु ा है, लेकिन कायर्क तार्अ ों के भीतर आशा का दीप पज््र ज्वलित ही दिख रहा है । इसका मलू कारण कागं े्रस के वैश्विक लोक कल्याणकारी सिद्धातं और विचारधारा जो कागं े्रसी कायर्क तार्अ ों तथा आम नागरिकोंकेअतंधार्रामेंसततपव्राहमानहै। वही अदश्ृ य ऊर्जा कागं े्रस को पनु जीर्व न पद्र ान करती रहती है ।
कागं े्रस की स्थापना के समय से पार्टी में मातकृ ा और बीपी गटु ों का जन्म हअु ा । दोनों की महत्वाकाक्ष्ं ााओं के चलते दोनों गटु ों में तनातनी चलरहीथी।जिसकानतीजायहहअु ाकिखलु ी राजनीति की बात आने पर कागं े्रस बटं गई । डिल्लीरमन रेग्मी के साथ सघं र्ष के कारण वीपी ने पहली बार पार्टी को विभाजित किया । साल २००९ में जब कागं े्रस में सबसे बडाÞ विभाजन हअु ा था तब पार्टी के अध्यक्ष बीपी कोइराला थे और पध्र ानमत्रं ी मात्रिकापस्र ाद कोइराला थे । बीपी गटु द्वारा मातकृ ा पर मकु दमा चलाने के बाद, जो पार्टी के निवतर्म ान अध्यक्ष भी थे,
कागं े्रस में विभाजन हो गया । उस वक्त कागं े्रस एक साथ चार धडाÞें में बटं गई थी, जिसके अपत््र यक्ष आभाष और दस्तक का गजंू आज भी यदा कदा सनु ाई देता रहता है ।
मातृकाकेगांधीवादीसिद्धांतकासमर्थन महावीर शमशेर, महेंद्र विक्रम शाह, सीबी सिंह, डीएन प्रधान आदि ने किया । बीपी के गुट में सुवर्ण शमशेर, गणेशमन सिंह, कृष्ण प्रसाद भट्टाराई, पूर्ण सिंह खवास, दिमान सिंह और अन्य शामिल थे । हालांकि पार्टी अध्यक्ष मातृकाप्रसाद थे, लेकिन बागडोर बीपी के हाथ में थी । इसीलिए २००७ की क्रांति के घोषित सेनापति मातृका थे । हालांकि, बीपी के फैसले और आदेश लागू किए गए । यहां समझने की बात यह है कि कांगे्रस को कोइराला परिवार ने अपनी निजी संस्था के रूप में देखने का गंभीर अपराध करता रहा है । आम कार्यकर्ता इस बात को लेकर अनिर्णय के अवस्था में है । उन्हें भारत के कांगे्रस आई में जिस प्रकार गांधी परिवार अर्थात नेहरू परिवार का निजीपन दिखाई देता है वैसे ही नेपाली कांगे्रस में कोइराला परिवार को देखते हैं । शेर बहादुर देउवा जी ने कोइराला परिवार इतर के नेताओं के सहयोग से उस गुलामी मानसिकता और जमींदारी प्रवृति को जड़ से उखाड़ फेंकने का काम किया । सर्वमान्य नेता गणेश मान सिंह जी तथा कृष्णप्रसाद भट्टराई जी के साथ कोइराला प्रवृति ने जो दुव्र्यवहार किया था, वह पार्टी और प्रजातंत्र दोनो के लिए शर्मनाक खेल था । आज कांग्रेसी उसी का कड़वा फल खाने को मजबूर
है । गगन और शेखर प्रवृति उपरोक्त संदर्भ का संवाहक बनकर सामने आया है । इसका विश्लेषण होना जरूरी है ।
ध्यान रहे ! कोइराला पव्र ृि त ने राजनीति में विकृितयोंकापरिचयदेतेहएु ससंदकोतब भगं किया था जब सरकार अपने ही दल के बहमु तमेंथी।२०५१से२०५६तकससं दीय राजनीति के बारे में ज्यादा कछु कहने की जरूरत नहीं है । इसी घटना से कागं े्रस पार्टी में खलबली मची । कागं े्रस के भीतर पत््र यक्ष रूप में दो गटु ों की स्थिति पैदा हो गइर्ः गिरिजा पस्र ाद कोइराला और शेर बहादरु देउबा । इस तरह कमजोर होती जा रही कागं े्रस पार्टी के सभी नेताओं की अदरू दशिर्त ा के कारण विदेशी शक्तियों ने इन्हें यजू एडं था्र े करना पा्र रभं कर दिया । सभी केदं ी्र य नेताओं के पक्ष लेने लगे । कौन कहां है ? किसके साथ कौन सी विदेशी शक्तियों का हाथ है ? यह जानना मुि श्कल होता गया । आज भी वह स्थिति विद्यमान है । ऐसी हालात में किसी पार्टी को सही वक्त पर सही निणर्य लेना असभं व है । मतलब, कागं े्रस को अब अपनी ही दलदल से निकलना मुि श्कल होता जा रहा है । पार्टी के चौदहो महाधिवेशन में देखा गया गटु उपगटु और प्िरतगटु पार्टी के सौदं र्य को नहीं विनाश की ओर सकं ेत करता है ।
आज कांग्रेस पार्टी के नेताओं के दिमाग में विकृति और असंगति के कीटाणु घुसकर इस कदर हावी हो गया है की बीपी कोइराला, कृष्ण प्रसाद भट्टराई और गणेश मान सिंह जैसे नेताओं के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी
की सबसे अच्छी और बेहतरीन विचारधारा और दर्शन बाजार में सस्ते दामों पर बिक रहे हैं । बीते चुनावों में नेताओं और कार्यकर्ताओं को पैसा के आगे नतमस्तक होते किसने नहींदेखाहोगा?अर्थातकांग्रेसनेसत्ताके झूठे प्रलोभन में अपना सिद्धांत बेच दिया, आदर्श बेच दिया, संस्कार बेच दिया, अपनी आधार भूमि को भी बेच दिया । दूसरों के गति को रोकने के लिए अपनी ही अस्तित्व से समझौता कर लिया, सिद्धांत को तोड़ा–मरोड़ा! आखिर पाया क्या ? यह सब आंतरिक कलह और वैमनश्य का फल है ।
पार्टी के भीतर शेर बहादुर गुट, गिरिजा गुट और अन्य नेताओं ने भी एक छोटा और मोटा गुट खोल दुकान सजाए बैठे नजर आते हैं । और हाली मुहाली का राजनीतिक खेल रचने के लिए एक गुट के रूप में पार्टी का इस्तेमाल करना सुरु कर दिया है । गगन को देउबा को पटकने में सफलता दिखाई देता है । कोइराला प्रवृति को अन्य सभी नेताओ को कमजोर कर सत्ता हथियाना ही अंतिम लक्ष्य है । युवा के नाम पर एक झुण्ड है, जिसे सिर्फ पद चाहिए । मधेशी, जनजाति और पिछड़े वर्गों के लिए कोई स्थान नहीं है । और बात करते हैं लोकतंत्र की !
मैं यह कहना चाहता हंू कि बीपी के निधन के बाद नेपाली कागं े्रस ने वामपथं ी ताकतों के साथ सहयोग, गठबधं न और चनु ावी समरसता का चलन शरूु किया और वहीं से कागं े्रस में बीपी की विचारधारा और अखडं ता में विचलन दिखाई देने लगा, और कायर्क तार्अ ों के मन में अत्यधिक अवसाद, परित्याग और उदासीनता ब ढ Þ ग र्इ ज ा े य ह ए क स कं ट क े रू प म े ं िव क िस त होने लगा है । आम तौर पर, चनु ाव में जाने के उद्देश्य से किए गए चनु ावी गठबधं न राष्टी« य राजनीति में राजनीतिक सस्ं कृित का विकास नहीं हैं । यह विभिन्न विकृि तयों का कारण बनता है।चनु ावकेबादजबकिसीभीदलकोस्पष्ट बहमु त नहीं मिल पाता है तो विश्व राजनीति में अन्य दलों के साथ मिलकर सरकार बनाने की पथ्र ाऔरपव्र ृित्तदेखीगईहै।जोउचितभीहै।
लेकिन देश की लोकतांत्रिक पार्टी की पहचान बनाने वाली पार्टी के लिए क्या यह लोकतंत्र का उपहास नहीं है कि वह कम्युनिस्ट पार्टियों के साथ गठबंधन कर सरकार चलाए और सर्वोच्च के आदेश पर स्वेच्छा से प्रधान मंत्री का पद स्वीकार करते हुए गठबंधन की सरकार का नेतृत्व करे ? क्या यह लोकतंत्र का उपहास नहीं है ? कांग्रेस को सामूहिक आत्म आलोचना तथा गहन विश्लेषण से गुजरने की आवश्यकता है ।

