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हिंदी की राष्ट्रभाषा के रूप में संवैधानिक प्रतिष्ठा देश के सम्मान के लिए आवश्यक है: डॉ. विमलेश कांति वर्मा

 

भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रदत्त ‘महापंडित राहुल संकृत्यायन सम्मान’से सम्मानित डॉ. विमलेश कान्ति वर्मा की गणना हिंदी के उन विशिष्ट विद्वानों में होती है जिन्होंने भाषा और साहित्य दोनों ही अनुशासनों में उल्लेखनीय कार्य किया है । हिंदी भाषा के अनुप्रयुक्त भाषिक पक्ष यथा पाठालोचन, कोश विज्ञान, भाषाशिक्षण और अनुवाद पर जहाँ उन्होंने गंभीरता से लिखा वहीँ गिरमिटिया भारतीय हिंदी साहित्य का विशद विवेचन भी किया । डॉ. वर्मा ने लगभग पांच दशकों तक जहाँ दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्रों का मार्गदर्शन किया वहीं टोरंटो विश्वविद्यालय (कनाडा), सोफिया विश्वविद्यालय (बल्गारिया) तथा यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ पसिफिक (फीजी) में हिंदी शिक्षण का सूत्रपात किया । डॉ. विमलेश कान्ति वर्मा की ख्याति एक कर्तव्यनिष्ठ प्राध्यापक, श्रेष्ठ भाषाशास्त्री, प्रतिष्ठित अनुवादक और प्रवासी भारतीय साहित्य विशेषज्ञ के रूप में हैं ।
० विमलेश जी, भाषा और साहित्य दोनों ही क्षेत्रों में एक विद्वान के रूप में आपने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है । आपका प्रिय क्षेत्र साहित्य है या भाषा ?
– चेतना जी आपने बहुत अच्छा प्रश्न किया । भाषा और साहित्य तो अन्योन्याश्रित हैं । आपको तो पता ही है कि मैं व्यवसाय से अध्यापक हूँ । जो कुछ भी मैं करता हूँ, मेरी दृष्टि में बराबर मेरे विद्यार्थी रहते हैं । जो छात्रों के लिए मुझे आवश्यक लगता है उसे पूरा करना मैं अपना दायित्व समझता हूँ । विश्वविद्यालय में मैं बराबर भाषाशास्त्र पढाता रहा । भाषाशास्त्र के ही अनुप्रयुक्त पक्ष भाषा शिक्षण, कोशविज्ञान, अनुवाद विज्ञान, पाठालोचन आदि है । ये सारे विषय मैंने स्नातक तथा स्नातकोत्तर स्तर पर छात्रों को पढाये और चूंकि इन विषयों पर पाठ्य सामग्री अधिक उपलब्ध नहीं थी, इसलिए इन विषयों पर पुस्तक लिखने की मैंने योजना बनाई और इन सभी विषयों पर मेरे ग्रन्थ प्रकाशित हुए और बहुत चर्चित भी रहे । फीजी, मारीशस, सूरीनाम, त्रिनिदाद और दक्षिण अफ्रीका के प्रवास ने मुझे प्रवासी साहित्य की ओर आकृष्ट किया और इन देशों की साहित्यिक समृद्धि पर कई शोध परक पुस्तकों के प्रकाशन ने मुझे प्रवासी हिंदी साहित्य का अध्येता बना दिया । मेरी रुचि वस्तुतः भाषा और साहित्य दोनों ही अनुशासनों में है और दोनों ही मुझे एक दूसरे के बिना अधूरे लगते हैं ।
० भारत की आजादी के ७५ साल हो गए हैं । देशभर में अमृत महोत्सव मनाया गया । इन ७५ सालों में हिन्दी ने क्या खोया क्या पाया ? मेरा तात्पर्य है कि आपकी दृष्टि में इन ७५ वर्षों में हिन्दी कहाँ पहुंची है ?
– देखिए, आजादी से पहले और आजादी के बाद के कुछ वर्षों तक भी हिन्दी स्वाभिमान की भाषा थी । महात्मा गांधी ने भी यह अनुभव किया था कि स्वतंत्रता के संघर्ष के लिए संपूर्ण भारतवर्ष को एक सूत्र में पिरोने के लिए यदि कोई भाषा समर्थ है तो वह हिन्दी ही हो सकती है इसलिए हिन्दी को स्वतंत्रता आन्दोलन की भाषा के रूप में चुना भी गया था । हिंदी आन्दोलन के शंखनाद की भाषा बनीं परन्तु इन ७५ वर्षों में मैंने अनुभव किया है कि हिन्दीं धीरे–धीरे स्वाभिमान की भाषा न होकर विवशता की भाषा बनती जा रही है । छात्रों को जब किसी अन्यं पाठ्यक्रम में प्रवेश नहीं मिल पाता तब विवश होकर वे हिन्दी को चुनते हैं न कि स्वेच्छार से । आज का विद्यार्थी गर्व से नहीं कहता कि मैं हिंदी का छात्र हूँ ।
पर हां, दूसरी ओर हिन्दी का प्रयोग जनवर्ग में तो बढा है पर आभिजात्य समाज में हिंदी का प्रयोग घटा है । हमें जन सामान्य की हिंदी में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग आज अधिक दिखता है पर इसका अर्थ यह नहीं है कि अंग्रेजी बढी है, बढी अंग्रेजियत है । सच तो यह है कि हम आज न तो अच्छी अंग्रेजी बोल पाते हैं और न ही शुद्ध अपनी भाषा । हमें अपनी भाषा के सही शब्द याद नहीं आते और हम अंग्रेजी के शब्द का प्रयोग कर अपना काम चलाते हैं ।
मुझे याद है कि आज से लगभग दो दशक पहले तक देश में अंग्रेजी के समाचार चैनलों की भरमार हुआ करती थीं और हिन्दी के मात्र एक या दो चैनल ही होते थे पर आप देखिए आज हिन्दी के चैनलों की भरमार है और अंग्रेजी मात्र एक–दो चैनलों में सिमट कर रह गई है । यही स्थिति अखबारों की है । हिंदी क्षेत्र के अंग्रेजी में टाइम्सम आफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स जैसे एक दो प्रमुख अखबार रह गये हैं परन्तु आज हिन्दी के अखबारों की भरमार है, जैसे हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, नवभारत टाइम्स, राजस्थान पत्रिका आदि । भारत में प्रकाशित अंग्रेजी और हिंदी पत्रिकाओं की संख्या भी आप देखें तो हिंदी पत्रिकाओं की संख्या अंग्रेजी पत्रिकाओं की तुलना में बहुत अधिक है ।
विडम्बना यह है कि रोजगार के लिए विज्ञापन अंग्रेजी अखबारों में छपते हैं । विज्ञापन अंग्रेजी अखबारों के लिए संजीवनी हैं । मुझे लगता है कि यदि अंग्रेजी अखबारों को विज्ञापन मिलने बंद हो जाएँ तो अंगरेजी अखबार भी बंद हो जाएँगे । भारत में जो हिंदी अखबार छप रहे और बिक रहे हैं वे इसलिए क्योंकि जनता समाचार जानने के लिए हिंदी अखबार ही पढती है । विज्ञापन न मिलने से हिंदी अखबारों में पृष्ठ कम होते हैं और अधिक महंगे भी है । मेरे यहाँ अंग्रेजी अखबार और हिंदी अखबार दोनों आते हैं पर मैं पहले हिंदी अखबार पढता हूँ और उसके बाद अंग्रेजी अखबार पढता हूँ । एक और उदाहरण आप को दूँ । कौन बनेगा करोडपति यदि अंग्रेजी में होता तो क्या वह इतना लोकप्रिय हो पाता जितना आज है । आशा है आपको अपने प्रश्न का उत्तर अब मिल गया होगा ।
० हिन्दी के विश्व–भाषा बनने की आपको क्या संभावना लगती है ?
– हिंदी विश्वभाषा तो है ही, अगर आप हिंदी भाषा बोलने वालों की संख्या के हिसाब से देखें । विश्व में अंग्रेजी और चीनी के बाद हिंदी बोलने वालों की संख्या सबसे अधिक है । विश्व के अनेक देशों में बसे हुए दो करोड से अधिक प्रवासी भारतीय हिंदी को अपनी राष्ट्रीय अस्मिता की प्रतीक मानते हैं । फीजी, मारीशस, सूरीनाम, त्रिनिदाद, गुयाना, और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में रह रहे भारतवंशी अपने अपने देशों में हिंदी को प्रतिष्ठित करने में प्रयासरत है । इस संबंध में मैं यह भी रेखांकित करना चाहता हूँ कि वर्तमान सरकार के द्वारा हिन्दीे के वैश्विक प्रचार–प्रसार के लिए जो कदम उठाए जा रहे हैं उससे कहीं न कहीं इस दिशा में एक रजत रेखा (क्ष्खिभच ीष्लभ)दिखने लगी है । इस वर्ष हिंदीतर क्षेत्र सूरत में हिंदी दिवस का आयोजन और लगभग नौ हजार हिंदी प्रेमियों की वहां उपस्थिति यह संकेत तो दे ही रही है कि सारा देश स्वदेश और स्वभाषा के महत्व को समझ रहा है । माननीय प्रधानमंत्री, श्री नरेन्द्र मोदी जी विदेश में कहीं भी हों भारतीयों के मध्य अंग्रेजी का प्रयोग न कर ‘मन की बात’ हिंदी में ही करते हैं । जब देश के राष्ट्र नायक श्री नरेंद्र मोदी स्वदेश और विदेश में भारतीयों के मध्य विदेशी भाषा का मोह छोड कर अपनी भाषा का प्रयोग करते हैं तो जनता भी स्वदेश और स्वभाषा के महत्व को समझ रही है । जब स्वदेश में हिंदी का सम्मान होगा तो विश्व भी हिंदी का सम्मान करेगा । पर विश्वभाषा के रूप में हिंदी की स्वीकृति हिंदी का दायित्व भी बढाती है । हिंदी को हमें अधिक संपन्न बनाना होगा । अपने देश में हिंदी को रोजगार की भाषा बनना होगा, हिंदी में यांत्रिक सुविधाओं का विकास करना होगा, हिंदी को ज्ञान, विज्ञान, व्यापार, व्यवसाय, विधि और न्याय की भाषा बनाना होगा । इस तरह विश्व स्तर पर हिन्दी, की अपनी एक अलग पहचान बननी आवश्यक है ।
० देश में हिन्दी की प्रतिष्ठा कैसे बढे और हिन्दी को वह स्थान कैसे मिले जिसकी वह अधिकारिणी है ?
– यह आपने बडा कठिन प्रश्न किया है । हम सब यह अनुभव कर रहे हैं कि हिंदी को जो स्थान संविधान, समाज और देश में मिलना चाहिए वह नहीं मिल रहा है, इसके कई कारण हैं । भाषा के प्रश्न को देश ने कभी गंभीरता से नहीं लिया । भारतीय संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा तथा अंग्रेजी को १५ वर्षों के लिए सह राजभाषा के रूप में मान्यता दी थी । १९६५ में १५ वर्ष की अवधि पूरी होने पर सह राजभाषा के रूप में अंग्रेजी की मान्यता समाप्त हो जानी चाहिए थी पर भारत ने अल्पकालिक क्षेत्रीय विरोध से घबराकर अंग्रेजी को अनंतकाल के लिए सहभाषा के रूप में स्वीकार कर लिया । भाषा का प्रश्न राष्ट्रीय प्रश्न है पर हमने उदारता के छद्म में हिंदी की उपेक्षा कर दी । इतना ही नहीं संविधान की अष्टम अनुसूची में हमने हिंदी की उपभाषाओं को भी रखने की छूट दे दी । मैथिली जो हिंदी की उपभाषा थी वह हिंदी से कट गई । इतना ही नहीं संस्कृति मंत्रालय के अधीन कार्यरत साहित्य अकादमी ने मैथिली के साथ राजस्थानी में अलग से पुरस्कार की व्यवस्था कर राजस्थानी ÷मारवाडी को हिंदी से अलग कर दिया । अब मैथिली के कवि विद्यापति और राजस्थानी की मीराबाईं हिंदी की नहीं रही । दिल्ली सरकार के अधीन कार्यरत हिंदी अकादमी जिसका मैं भी उपाध्यक्ष रहा उसने हिंदी अकादमी के समानांतर मैथिली और भोजपुरी अकादमी बना कर मैथिली के साथ भोजपुरी को हिंदी से अलग कर दिया । यदि हम इस प्रकार हिंदी की उपभाषाओं को हिंदी से अलग करते जायेंगे तो अंत में हिंदी खडीबोली मात्र रह जायेगी । हम सब जानते हैं कि हिंदी एक भाषा समष्टि का नाम है और हिन्दी की सत्रह उपभाषाएँ हैं जिसके कारण हिंदी भाषा क्षेत्र उत्तर में नेपाल की तराई से लेकर दक्षिण में रायपुर और खंडवा तक, पश्चिम में बाडमेर, बीकानेर और जैसलमेर से लेकर पूर्व में मिथिला और भागलपुर तक है । मुझे लगता है कि इसका तार्किक समाधान हिंदी को अष्टम सूची से हटाकर ‘राष्ट्रभाषा’ के रूप में संवैधानिक प्रतिष्ठा देना है ।
० आपकी दृष्टि में राजभाषा हिन्दीष के प्रचार–प्रसार में संलग्न सरकारी संस्थाएं किस सीमा तक अपना दायित्व निभाने में सफल हैं ?
– मैं भारत सरकार की केन्द्रीय हिंदी समिति तथा राजभाषा हिन्दीे सलाहकार समिति का सदस्यस भी रहा हूँ । मैं जानता हूँ कि सरकारी संस्थाओं में राजभाषा की और राजभाषा अधिकारी की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है । राजभाषा कार्यान्वयन जिस दृढता से होना चाहिए वह नहीं हो पा रहा है । यह तभी संभव हो सकेगा जब मंत्रालय में राजभाषा अधिकारी का पद निदेशक का नहीं कम से कम संयुक्त सचिव का हो । बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में शायद अब यह संभव हो सके । राजभाषा हिंदी का कार्यान्वयन दृढता से हो सके इसके लिए मुझे यह व्यवस्था आवश्यक लगती है ।
० विमलेश जी, आपकी दृष्टि में हिंदी की विश्व भाषा के रूप में स्वीकृति हो इस सन्दर्भ में ‘ िवश्व हिन्दी सम्मेलन’ की क्या उपयोगिता है ? जिस तरह से इन सम्मेलनों में करोडों रुपए की राशि व्यय होती है, इससे इनकी सार्थकता कहां तक सिद्ध होती है ?
– अब तक भारत ११ विश्व हिंदी सम्मेलनों का आयोजन कर चुका है । इनमे से तीन भारत में, तीन मारीशस में और पांच–अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, सूरीनाम, त्रिनिदाद, और इंग्लैण्ड में । मुझे भी कई विश्व हिंदी सम्मेलनों में प्रतिभागिता का अवसर मिला है । मैंने यह अनुभव किया कि ये सम्मलेन उत्सवपरक अधिक है अकादमिक सम्मलेन कम हैं । जब तक इन सम्मेलनों में विदेशियों की प्रतिभागिता नहीं बढेगी तब तक इनका अपेक्षित लाभ हिंदी को नहीं मिलेगा । अपनों के बीच ही हिन्दी के गुणगान से हिंदी का विकास और विस्तार नहीं होगा । विश्व हिंदी सम्मलेन के स्वरूप को बदलना होगा यदि हम हिंदी को विश्व भाषा के रूप में देखना चाहते हैं ।
० हमारी शिक्षा प्रणाली में हिन्दीं पर अंग्रेजी का प्रभाव स्वतंत्रता के इतने वर्षों के बाद भी बना हुआ है, इसमें कोई दो राय नहीं है । आपका इस बारे में क्या मत है ?
– शिक्षा में हिन्दीय का माध्यम प्राथमिक स्तर से उच्चतर स्तर पर होने का सपना भारत के स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था । पर देश में आज बहुत कम अच्छे प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय हैं जहाँ शिक्षा का माध्यम हिन्दी है । अवधेय है कि विश्व के सभी विकसित देशों में शिक्षा का माध्यम प्राथमिक और उच्च स्तर पर देश की भाषा ही होता है – स्वदेशियों और विदेशियों दोनों के लिए ;और इसमे अपवाद की कोई व्यवस्था नहीं है । उच्च स्तर पर शिक्षा का माध्यम हिन्दी बने इसके लिए भारत सरकार ने वैज्ञानिक तकनीकी शब्दावली आयोग बनाया, केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय बनाया, हिन्दी में तकनीकी साहित्य और वैज्ञानिक साहित्य प्रकाशित रूप में उपलब्ध हो सके इसके लिए केन्द्रीय माध्यम कार्यान्वयन बोर्ड भी बना, सभी संस्थाएं कार्यरत भी हैं पर क्या कहीं हिन्दी क्ष्क्ष्ः, ब्क्ष्क्ष्ःक्, क्ष्क्ष्त् व अन्य शिक्षा संस्थानों में शिक्षा का माध्यमइन ७५ वर्षों में बन सकी ?
० डॉ. वर्मा, जिस हिंदी का बोलचाल में आज प्रयोग हो रहा है उसे बिना अंग्रेजी ज्ञान के समझना संभव ही नहीं है ?
– हाँ, चेतना जी, आप ठीक ही कह रही है । हिंदी को विकृत और दुरूह बनाने में जन संचार की बहुत बडी भूमिका है । विज्ञापनों में अंग्रेजी मिश्रित हिंदी भाषा को दुरूह और अबोध बनाती है । ऐसा लगता है की हिंदी समझने के लिए अंग्रेजी जानना जरूरी है । कथन की स्पष्टता के लिए दो उदाहरण देना चाहता हूँ ।
(क) मोहन और शीला में मिसअंडरस्टैंडिंग इतनी बढ गई है कि अब कोम्प्रोमाईज पॉसिबल नहीं है ।
(ख) स्टेटबैंक ऑफ इंडिया में फिक्स्ड डिपाजिट पर सीनियर सिटीजन्स का मैक्सिमम रेट ऑफ इंटरेस्ट क्या है ?
ऐसी ही हिन्दी आपको पोस्टर में आज दिखेगी, रेडियो और टेलीविजन पर आप सुन और देख भी सकते हैं । शिक्षित समाज के पारस्परिक बोलचाल में भी ऐसी ही हिन्दी आपको सामान्यतः सुनने को मिलेगी । श्री रामचंद्र वर्मा की अच्छी हिन्दी और प्रोफ.हरदेव बाहरी की शुद्ध हिन्दी सुनने को आप तरस जायेंगे । ये है स्वतंत्र भारत की ७५ साल की हिन्दी की उपलब्धियां । भारत की स्वाधीनता के बाद हिन्दी के विकास के स्वरूप का यदि आप विश्लेषण करें तो प्रभुत्व अंग्रेजी का बढता दिखेगा हिन्दी का नहीं । अंग्रेजी सह राजभाषा तो है ही, लगता है कि अंग्रेजी के राष्ट्रभाषा बनने की तैयारी हो रही है ।
० आप कहते हैं कि अनुवाद दो भाषाओं और संस्कृतियों के मध्य सेतु का काम करता है । इस कथन से आपका क्या तात्पर्य है ?
– भारत एक बहु भाषा भाषी देश है । १९६१ के भारतीय जनगणना सर्वेक्षण में भारत में बोली जाने वाली भाषाओं की संख्या १६५२ बताई गई है । २२ तो भारत की अनुसूचित भाषाएँ ही हैं । ये भाषाएँ देश की संपन्न भाषाएँ हैं, इनका अपना साहित्य है । यदि हम इन भाषाओं की भाषिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक समृद्धि का लाभ उठाना चाहें तो वह अनुवाद के माध्यम से ही संभव है । इन सब भाषाओं के साहित्य का यदि हिंदी में अनुवाद उपलब्ध हो सके तो हिंदी के माध्यम से सम्पूर्ण भारत की साहित्यिक समृद्धि से हम परिचित हो सकेंगे जो अनुवाद के बिना संभव ही नहीं है । सारे देश को हम अनुवाद के माध्यम से जोड सकते हैं । हिंदी को यदि हमें देशव्यापी और विश्वव्यापी बनाना है तो अनुवाद बडी भूमिका निभा सकता है । रामचरित मानस के अनुवाद ने सारे विश्व को भारतीय संस्कृति से परिचित कराने का कार्य किया है ।
० विदेश में हिन्दी को लोकप्रिय बनाने में जन–संचार की क्या भूमिका है ?
– विदेश में हिन्दी को लोकप्रिय बनाने में जनसंचार की महत्वपूर्ण भूमिका रही है । भारतीय फिल्में जहाँ विदेशों में दर्शकों का मनोरंजन करती हैं, वहीं वे परोक्षरूप में भाषा भी सिखाती हैं; सांस्कृतिक परिवेश से परिचित कराती हैं और अनजाने में उस देश के प्रति आकर्षण और लगाव भी पैदा करती हैं । राजकपूर की ‘आवारा’ फिल्म ने तथा ‘हाथी मेरे साथी’ ने कितने विदेशियों को हिन्दी की ओर आकृष्ट किया यह हम आज अनुमान भी नहीं लगा सकते ।
प्रवासी भारतीयों के देश में रेडियो के हिन्दी –कार्यक्रम बहुत ही अधिक लोकप्रिय है । अगर फीजी का ही उदाहरण लें उत्सवों और पर्वों पर तो फीजी रेडियो ऐसे विशेष कार्यक्रम प्रसारित करता था, जिसको सुनकर आप व्रत–उद्यापन कर सकें, लक्ष्मीपूजा कर सकें और सत्यनारायण की कथा विधि–विधान से सुन सकें । ऐसे प्रसारण जनसमाज के लिए उपयोगी तो हैं ही, हिन्दीं को विदेश में प्रतिष्ठित करने में सहायक भी ।

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साक्षात्कारकर्ताः चेतना वशिष्ठ

(चेतना वशिष्ठः राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में सहायक निदेशक (रा.भा.) के पद पर कार्यरत हैं । इस पद पर कार्य करते हुए वे राजभाषा हिन्दी के प्रगामी प्रयोग को बढावा देने एवं कार्यालय में इसके अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए समय–समय पर कार्यशालाएं एवं संगोष्ठियां आयोजित करवाती हैं । राजभाषा अनुपालन के साथ–साथ वे लेखन क्षेत्र में भी सक्रिय हैं ।)

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