कैलाश महतो, पराशी । रुस-युक्रेन युद्ध को पूरा साल होने में चन्द दिन बांकी है । युद्ध के साल गिरह पर भारतीय मीडिया अथाह और भयानक अडकलें लगा रही हैं । भारतीय सारे मीडिया रुस के मुख पत्र ही होकर वकालत और प्रचारबाजी करते नहीं थक रहे हैं । दूसरी तरफ युक्रेन है कि जाम्वाज की तरह रुस के हर कार्रवाई का मुकाबला और जवाबी कार्रवाई में तनिक भी पीछे नहीं दिख रहा है । महाशक्ति के लाइन में खडे रुस को युक्रेन ने भलीभांति एहसास करा दिया है कि युद्ध केवल शस्त्रास्त्रीय विज्ञान से नहीं, अपितु साहस और रणनीति के वैज्ञानिकता पर भी लडी जाती है ।
वैश्विक शक्ति के होड में यूरोप, नाटो और अमेरिका की कूटनीतिक चाल जो भी हों, मगर युक्रेन के साहस और जाम्बाजी को सलाम करना ही पडेगा, जिसने दूसरों के दयाभावी सहयोगभर से रुस जैसे महारथी को पानी पानी कर रखा है । सोचने बाली बात यह है कि दूसरों के सहयोग, समर्थन और इसारे पर जो युक्रेन रुसी, चीनिया, इरानी, बेलारुसी, चेचेन्यायी और उत्तर कोरियाई हथियारों और सैन्य दस्ताओं से इतने काबियतपूर्ण ढंग से लड रहा है, अगर उसके पास अपना हथियार और साजो सामान होते, और उसके पास रहे परमाणु बम सन् २००८ में रुस को दे नहीं दिये होते, तो आज वो युक्रेन रुस को न जाने किस मोड पर खडा कर दिया होता । Defensive मोड में लड रहे युक्रेन को अपना साजो सामना होता, तो उसका Offensive मोड क्या और कैसा होता, यह बस् कल्पना किया जा सकता है ।
NATO Chief स्टोल्टन बर्ग ने रुस-युक्रेन युद्ध का जो हिसाब किताब निकालने की बात कही है, वह हैरत अंगेज बाली बात है । स्टोल्टन के हिसाब किताब से इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि अब रुस-युक्रेन युद्ध केवल युद्ध नहीं, अब वह चौतर्फी प्रतिष्ठा का विषय बन गया है और उसका खामियाजा पूरे विश्व को भुगतना तय है । स्टोल्टन बर्ग के अनुसार रुस का युद्ध जीतना विश्व के लिए खतरा एक तरफ है, वहीं सत्य यह भी है कि रुस के लिए युद्ध हारना भी विश्व के लिए गम्भीर खतरा से कम नहीं है । युद्ध मनोविज्ञान के अनुसार रुस का युद्ध जीतना सारे युरोप, नाटो और अमेरिका की हार है, जो अमेरिका और नाटो बर्दाश्त नहीं कर सकता, और रुस का हारना इस मायने में भी वैश्विक खतरा तय है कि उस अवस्था में पुतिन बदले के भाव में आकर एटम और न्यूक्लियर दोनों बटन को एक साथ दवा सकते हैं ।
युद्ध में अपने पूरे ताकत के साथ भीडा हुआ युक्रेन समेत जब चाहे, तब युद्ध न तो रोक सकता है, न छोड सकता है । उसके पीछे और सहयोग में रहे पूरे NATO, Europe, America और Israel जबतक नहीं चाहेगा, तबतक उसके हाथ में कोई निर्णय नजर नहीं आ रहा है । वह या तो युद्ध जीतेगा या मिटेगा । तीसरा कोई रास्ता नहीं है जबतक रुस और युक्रेन अपने आप में आपसी रणनीति तय नहीं कर लेते,जो कालान्तर में युक्रेन के लिए मृत्यु के समान होगा ।
रुस-युक्रेन बीच संचालित वर्तमान युद्ध में घी डालने का काम न केवल चीन, बेलारूस, सिरिया, उत्तर कोरिया और इरान कर रहा है, बल्कि इसमें मसाले मिलाने के लिए अमेरिका, यूरोप और मिड्ल इष्ट के शक्तिशाली देश इजरायल भी कुदने के ट्रेलर दिख रहा है । रुस के सहयोगी देश इरान और सिरिया पर इजरायल द्वारा मिसाइल आक्रमण होना इसी बात का संकेत करता है । इधर कुछ ज्योतिषी बाबा लोगों ने यह दावा कर रखा है कि मौजूदा रुस-युक्रेन युद्ध के कारण रुस, अमेरिका और चीन की सारी सामरिक शक्ति समाप्त होकर भारत विश्व में सामरिक और बौद्धिक स्तर पर भी विश्व गुरु बनने बाला है ।
एक दूसरे का बर्बादी के प्रतिक्षा में रहे विश्व के कुछ देश, सरकार और उनके नेताओं को यह तनिक भी आभाष नहीं हो रहा है कि उनके ताकत, जिद्द, बडप्पन, हठ और चालाकी के कारण संसार को कितना क्षतिग्रस्त होना पडेगा । मानवता का कितना बडा विनाश होगा ।
मगर सत्य यह भी है कि एक के विनाश के बगैर दूसरे की गिनती मजबूत नहीं होती है । रात के विनाश बिना सूरज दिखना संभव नहीं होता । मगर समझना यह उपयुक्त है कि रात भी जरुरी है । नहीं तो लोग पागल हो जायेंगे । संसार के कुछ भागों में ऐसा है कि सारे छ: महीने तक सूरज नहीं उगता और बांकी के छ: महीने तक सूरज नहीं डूबता । और वहाँ लोग बेचैन व बीमार रहते हैं । युद्ध और शान्ति दोनों अनिवार्य है । युद्ध के बिना शान्ति का कोई पहचान नहीं । शान्ति के लिए ही युद्ध की अनिवार्यता अपरिहार्य है ।
हम जब मधेश आन्दोलन की बात करें, तो अधिकांश लोग इस बात से चीढ से जाते हैं कि अब वे आन्दोलन कितना करें । दर असल बात यह है कि मधेश आन्दोलन करें या ना करें, आन्दोलन चल रहा है । उसका रुप कुछ अलग है, पर मधेश के विरोध में राज्य युद्ध कर रहा है । जब मधेश करता है, तो राज्य उसका प्रतिकार करता है, और जब राज्य मधेश को लूटता है, तो वह भी एक आन्दोलन ही है ।समझना यह पडेगा कि राज्य जब हर महीने मधेश के साथ शीतयुद्धीय आन्दोलन कर रहा है, तो उसके प्रतिकार में मधेश को उठना होगा, जिसे हम या तो आन्दोलन कहें या विरोध/विद्रोह ।
बिना विद्रोह या आन्दोलन न तो राज्य चलता है, न समाज । बिना युद्ध न तो कोई शान्ति आता है, न विकास । दूसरे विश्व युद्ध के बाद भी विश्व ने तकरीबन सैंतिस हजार युद्ध झेले हैं । उन्हीं युद्ध और शित युद्धों के सहारे अमेरिका और यूरोप बने हैं । कोरिया, जापान और चीन ने अकल्पनीय विकास की है । अमेरिका और रुस ने महाशक्ति बनने का ख़िताब जीता है । कृत्रिम सूर्य और चांद बने हैं । चन्द्रमा, मंगल और अन्य ग्रहों पर मानव बस्ती की योजनाएँ बनी हैं । और सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह कि युद्धों के जरिये ही सन् १९४५ के बाद विश्व से औपनिवेशिक शासन खत्म होकर विश्व के सैकड़ों मुल्कों ने स्वतन्त्रता पायी है । युद्ध, लडाई और निरन्तर संघर्ष के धरातल पर ही यूरोप, अमेरिका, चीन और जापान जैसे मुल्कों से जातिवाद, धर्मवाद और नश्लवाद का अतिरञ्जित लफडे खत्म हुए हैं । विश्व में व्याप्त दास प्रथा और मानव बिक्री की कानुनी बाजार नष्ट हुए हैं । हमने भी जो पाया है, वे घर में बैठकर चुटकी लेने बालों के वजह से नहीं, बल्कि युद्ध, लडाई और संघर्ष करने बाले चन्द मसीहों के बल पर । गौर तलब की बात तो यह है कि वे कभी संघर्ष से बहाना नहीं बनाते, जो राजनीतिक जीवन को समझ लिये हैं ।
समझना यह पडेगा कि जिस रुस, अमेरिका, चीन, जापान और यूरोप के पास हर चीज है, वो युद्ध से नहीं भागते, तो हमारी क्या हैसियत है । वे मुल्क जिनके पास सारा आयाम है, सारा विज्ञान और शक्ति है, वे कभी शित युद्ध, कभी वाक युद्ध तो कभी खुल्ला सामरिक युद्ध लडते रहे हैं, तो मधेश किस आधार पर मौन रह सकता है । सोचना होगा कि जब हम युद्ध के बावजूद पूरा पा नहीं रहे हैं, तो चुपचाप होकर क्या हासिल करेंगे !?
युद्ध और संघर्ष पल पल का दैनिक जीवन विज्ञान है । इसे जो और जिस समाज ने स्वीकार नहीं किया, उसका सर्वनाश अनिवार्य है ।
संघर्ष अस्तित्व के लिए होता है, अस्तित्व के बचाव और विकास के लिए होता है । राजनीतिक उपलब्धि और सहभागिता के लिए होता है । देश की सीमा रक्षा और विकास के लिए अनिवार्य है । इसे नाकारने बालों का अस्तित्व और इतिहास दोनों मिट जाता है ।
युद्ध हमारा बांकी है, मुक्ति की चाभी पूर्ण समानुपातिक निर्वाचन प्रणाली है । तब भी युद्ध समाप्त नहीं होगा, अगले चरण के लिए तैयार रहना होगा ।


