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राम सहाय यादव की उपराष्ट्रपति तक की यात्रा- एक नजर

 


काठमांडू, ३ चैत – देश को मिला नया उपराष्ट्रपति रामसहाय यादव के रुप में । राजनीति में अच्छी पैठ के साथ साथ राम सहाय यादव एक अच्छे शिक्षक के रुप में भी पहचाने जाते हैं । ५२ वर्षीय राम सहाय यादव उपराष्ट्रपति पद के चौथे कार्यकाल के लिए निर्वाचित हुए हैं ।
रामसहाय प्रसाद यादव को कुल ३० हजार ३२८ मत मिला । उनके साथ एमाले की अष्टलक्ष्मी शाक्य और जनमत पार्टी की ममता झा भी प्रतिष्पर्धा में थी ।
जनता समाजवादी पार्टी (जसपा) के संसदीय दल के नेता रहे यादव को सत्ता गठबन्धन में रहे दल नेपाली कांग्रेस, नेकपा माओवादी केन्द्र, नेकपा एकीकृत समाजवादी पार्टी का साथ भी मिला है ।
देश के उपराष्ट्रपति के पद पर पहुँचने से पहले वो क्या थे ? कहाँ उनका जन्म हुआ ?इन सबके बारे में भी चर्चा होनी चाहिए । नवनिर्वाचित उपराष्ट्रपति यादव का जन्म २०२७ साल में (साविक) बारा के कर्चोवा गाविस में हुआ । भारत के सीतामढ़ी कॉलेज से विज्ञान विषय में स्नातक (बी.एस.सी) और ठाकुरराम बहुमुखी कैम्पस वीरगंज से शिक्षा संकाय में स्नातक तक का अध्ययन किया है ।अपनी पढ़ाई खत्म होने के बाद उन्हें यह लगने लगा कि लोगों में राजनीतिक चेतना की कमी है । इसलिए उन्होंने शिक्षण पेशा के साथ ही मधेश में राजनीतिक चेतना फैलाने का भी काम शुरु किया । उसके बाद २०४७ साल में नेपाल सद्भावना पार्टी में आवद्ध हुए और यहाँ से अपनी राजनीतिक यात्रा का आरम्भ किया । यादव ने १६ वर्ष अर्थात् २०६४ साल तक शिक्षण पेश में संलग्न रहे । उन्होंने बारा के कलैया में स्थित श्री पन्ना देवी कन्या माध्यमिक विद्यालय में विज्ञान और गणित बिषय के शिक्षक के रुप में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । शिक्षण पेशा के साथ ही राजनीतिक यात्रा भी चलती रही और इसी बीच राजनीति के ही दौरान काठमांडू के भद्रकाली में २०४७ को संविधान जलाने के क्रम में गजेन्द्र नारायण सिंह, हृदेयश त्रिपाठी, रामेश्वर राय के साथ रामसहाय यादव भी गिरफ्तार हुए । ये सफर यहीं नहीं खत्म हुआ । मधेस आन्दोलन के समय में उन्हें बार– बार जेल जाना पड़ा । गजेन्द्रनारायण सिंह के देहांत के बाद नेपाल सदभावना पार्टी विभाजन की ओर बढ़ चली । यादव नहीं चाहते थे कि पार्टी का विभाजन हो । इसलिए २०५९ में राजविराज में सद्भावना पार्टी के पाँचवें महाधिवेशन में उन्होंने पार्टी विभाजन के विरोध में आमरण अनशन किया । उस समय बद्री मण्डल अध्यक्ष बनना चाहते थे लेकिन यादव इस बात के पक्षधर नहीं थे । वो चाहते थे कि आनन्ददेवी के नेतृत्व में पार्टी एक हो । जब आनंदी देवी के नेतृत्व में नेपाल सद्भावना पार्टी (आनन्ददेवी) गठन हुई यसके बाद ही उन्होंने अनशन तोड़ा था । कहते हैं इसी महाधिवेशन में उपेन्द्र यादव और राम सहाय यादव की मुलाकात हुई । ये मुलाकात केवल एक मुलाकात बनकर नहीं रही वरन दोनों हमेशा एक दूसरे के साथ बने रहें । दोनों के विचार मधेश के लिए मिलते जुलते थे । दोनों ने एक साथ मधेश के अधिकार और पहचान के लिए एक बैकल्पिक राजनीतिक शक्ति निर्माण के विषय में सोचना शुरु किया । जनयुद्धकाल में जब उपेन्द्र यादव दिल्ली में गिरफ्तार हुए तब वो वही भूमिगत होकर नेपाल में संगठन बिस्तार का काम करते रहे । इधर नेपाल में रामसहाय के साथ और भी भूमिगत रुप में मधेशी जनअधिकार फोरम के संगठन विस्तार में लगे रहे । २०६० फागुन ७ गते रामसहाय ने बारा में ९ सदस्यीय जिला कमिटी की गठन की और बारा के संस्थापक जिला अध्यक्ष बने । काम के बीच उपेन्द्र यादव और राम सहाय यादव दोनों एक दूसरे पर ज्यादा विश्वास भी करने लगे ।

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२०६२–६३ के जनआन्दोलन में भी सक्रियतापूर्वक सहभागी हुए । वो काठमांडू से गिरफ्तार हुए । जनआन्दोलन सफल होने के बाद भी फोरम मधेश आन्दोलन की तैयारी में थी । इसी समय साल २०६३ माघ १ गते जब सरकार द्वारा अन्तरिम संविधान जारी किया गया तब संविधान प्रति असन्तुष्टि जताते हुए उन्होंने माघ २ गते संविधान जलाने का निर्णय किया । प्राय ः सभी मधेशी नेताओं ने संविधान जलाया । बहुत से नेताओं के साथ राम सहाय भी पकड़े गए । जन दबाब पड़ने पर उन्हें छोड़ दिया गया ।
राजनीतिक रुप से वो सदैव ही सक्रिय बने रहे । उनकी सक्रियता को देखते हुए उन्हें बार बार महासचिव का पद मिला । २०६५ साल में पार्टी (मधेशी जनअधिकार फोरम)के वें महासचिव चुने गए । साल २०७२ में मधेशी जनअधिकार फोरम और अशोक राई नेतृत्व के संघीय समाजवादी के साथ पार्टी एकता हुआ । पार्टी एकता के पश्चात संघीय समाजवादी फोरम, नेपाल के फिर महासचिव बने । २०७५ साल में डा. बाबुराम भट्टराई नेतृत्व के नया शक्ति पार्टी एकीकरण होकर समाजवादी पार्टी बनी तब भी वो समाजवादी पार्टी के महासचिव बने ।
२०६४ साल के पहले संविधानसभा के सदस्य हुए । वो मधेशी जनअधिकार फोरम से समानुपातिक सांसद चुने गए थे । दूसरी बार वो फिर २०७४ में संसद में आए । २०७४ के निर्वाचन में एक बार फिर बारा क्षेत्र नम्बर २ से संघीय समाजवादी फोरम, नेपाल से निर्वाचित हुए थे । इतना ही नहीं इसके बाद यादव ने शेरबहादुर देउवा नेतृत्व के सरकार में नौ महीने के लिए मन्त्री बनने का अवसर भी मिला । उसके बाद बहुत बार उन्हें मंत्री बनने के लिए कहा गया लेकिन उन्होंने अस्विकर कर दिया था । लेकिन फिर एक बार देउवा नेतृत्व के ही सरकार में २०७८ असोज २२ गते वन तथा वातावरणमन्त्री नियुक्त हुए थे । २०७९ मंसिर ४ गते हुए निर्वाचन में वो बारा क्षेत्र २ से पुनः निर्वाचित हुए । वो हमेशा उपेन्द्र यादव के सबसे ज्यादा विश्वासपात्र बने रहें । इसलिए उन्होंने राम सहाय यादव का नाम उपराष्ट्रपति के उम्मीदवार के रुप नाम दिया । वैसे कहीं न कहीं उपेन्द्र यादव का इसमें अपना एक स्वार्थ जरुर है । यदि रामसहाय उपराष्ट्रपति पद में निर्वाचित हुए तो बारा क्षेत्र नम्बर २ में सांसद पद रिक्त होगा । तब उपेन्द्र यादव उसी पद में उपनिर्वाचन में लड़कर संसद में पहुँचने के दावं में हैं । वैसे ये तो भविष्य की बातें है । किसी को नहीं मालूम कि क्या होने वाला है । उपेन्द्र यादव की भविष्य की क्या योजनाएं हैं ? वो कितने सफल होंगे ? ये तो भविष्य के गत्र्त में है । लेकिन अभी उपेन्द्र यादव जो चाहते थे उन्हें मिल गया है । उनकी सोच कामयाब हुई है । वो चाहते थे कि राम सहाय को उपराष्ट्रपति का पद मिले और वो मिला है ।

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