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उपराष्ट्रपति की बाहरी जीत और आन्तरिक पराजय की वास्तविक खामियाजा : कैलाश महतो

 


कैलाश महतो, परासी । चैत्र ३ की समाप्ति के साथ ही सम्मानित उपराष्ट्रपति महामहिम श्री राम सहाय प्रसाद यादव की जीत ने मधेश में गर्मी और ठण्डी दोनों बढा दी । गर्मी इस मायने में कि जिस जोश खरोश के साथ ०७९ के चुनाव में मधेश ने भाग लिया था, उसका परिणाम यह रहा कि निवर्तमान ०७४-०७९ के संघीय संसद में रहे मधेशी अधिकारों के लिए बात करने बाले ३६ सांसदों से ०७९ के सम्पन्न संघीय आम निर्वाचन ने २२ सांसद संख्या पर ला दिया । मधेशी जनता बहुत हदतक ठण्ड पड चुकेे थे । मगर चैत्र ३ के उपराष्ट्रपतीय निर्वाचन ने श्री राम सहाय यादव जी जैसे सच्चा और ईमानदार मधेशी नेता को जीताकर एक भरोसे की मीठी गर्मी प्रदान की है । वहीं मधेशी नेताओं के अकर्मण्यता, जालझेल और आन्तरिक वैमनस्यता ने मधेश में आक्रोश की गर्मी बढ चुकी थी, जिसे कमोबेश उपराष्ट्रपति की जीत ने ठण्डक दी है । लोग खुशियाँ बांटते दिख रहे हैं ।

मगर आज एक ओशो सन्त ने जो बात फोन पर हमें सुनायी है, वह उनका विश्लेषनात्मक सोचनीय तर्क नजर खोलने बाला है । उन्होंने दो मुर्ख बिल्लियों और एक शातिर बन्दर का “रोटी झगडा सुलझाने की झगड लगौन नीति” का उदाहरण दिया है, जिसमें एक रोटी के भाग बण्डे के लिए दो बिल्ली आपस में लडते हुए एक बन्दर के पास बराबर हिस्सा पाने के लिए जाती हैं – और बन्दर उस रोटी को दो हिस्सों में बांटने के बहाने कभी एक टुकड़े को बडा, तो कभी दूसरे को बडा कर सारी रोटी खा जाता है । बिल्लियों की आपसी बेवकूफी ने राटी भी गवां दी और आपसी वैमनस्यता भी बढा दी ।

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उन्होंने मधेशी नेताओं को भी साइज में रखने के लिए शासक पैसे तक देकर मधेश में नयी नयी पार्टियाँ खोलवाते हैं । फिर एक दूसरे के खिलाफ भरकाते हैं । एक के विरिद्ध दूसरों से चुनाव लडवाकर आपस में वैमनस्यता उत्पन्न करवाते हैं । पार्टियों और नेताओं के बीच राजनीतिक और साम्प्रदायिक टकराव करवाते हैं । संसद में लाकर एक दूसरे प्रति विष वमन और कुकृत्य करवाते हैं, प्रतिस्पर्धा करवाते हैं और मधेशियों के बीच मचने बाले घमासान युद्ध घर्षण से उत्पादित राजनीतिक अमृत को बडे आराम से किसी आराम कक्ष में बैठकर रसा-स्वादन करते हैं ।

ओशो सन्यासी की बात को मानें, तो चैत्र ३ का उपराष्ट्रपतीय निर्वाचन से बाहरी जीत भले ही मधेशी को मिली हों, लेकिन वह आन्तरिक पराजय है, जिसका गंभीर खामियाजा मधेश को भुगतना तय है । उनके ही तर्क को स्वीकार करें, तो यह सत्य सही है कि नेपाल के राष्ट्रपति के सामने संवैधानिक और राजनीतिक कारणों से भी उपराष्ट्रपति का कोई अहमियत नहीं है । दूसरा यह कि उससे मधेश केन्द्रित दल और नेताओं के बीच एक स्थायी अन्तरद्वन्द कायम करा दी गयी है ।

गंभीर बात तो यह है कि मधेश केन्द्रित दल और नेतृत्व आपस के लडाई और कहासुनी में इतने मस्त हैं कि जिन मधेशियों को वे शहीद और राष्ट्रपति बनाते हैं, उनकी सम्मान उसी राज्य, सत्ता और सरकार में, उसके दीवारों पर और नीतियों में कहाँ कितना है, उसपर कभी कोई ध्यान ही नहीं रही है । जिन शहीदों पर वे माला चढाते हैं, जिनके नाम पर वे गला फाड़कर कसम खाते हैं, उन शहीदों की तस्वीर उन्हीं मन्त्रालयों, दफ्तरों, विभागों, न्यायालयों और कार्यालयों में नहीं सजा पाते हैं, या उन्हें सजाने नहीं दिया जाता है, जहाँ पर वे सांसद, मन्त्री और मुख्यमन्त्री होते हैं, और उसके विरोध में वे “चूं” तक नहीं बोल पाते । देश के प्रथम निष्कलंक राष्ट्रपति डा. रामबरण यादव की तस्वीर एक भी मन्त्रालय, या दफ्तर/न्यायालय में देखा नहीं जा सकता । सवाल यह उठना स्वाभाविक है कि जो अपने शहीद और उच्च उत्पादन का रक्षा और सम्मान नहीं कर सकता, उसे शहीद और उच्च पद पर जाने/भेजने से मर्यादित ऐतिहासिक लाभ क्या ?

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यह गंभीर विभेद है कि दूसरे विवादित राष्ट्रपति की कार्यकाल के बाद उनके सेवानिवृत्त जीवन के लिए सुविधा सम्पन्न सराकरी मकान बनाये जाय, और देश के प्रथम सफल राष्ट्रपति के घर भाडे के लिए भी विवाद हो ? इससे बड़ी चिन्ता और विडम्बना की बात क्या हो सकती है । इसके लिए मधेशी न तो कोई राजनीतिक पार्टी, नेता, सांसद, मन्त्री, नागरिक समाज, चिन्तक, विश्लेषक, लेखक या बौद्धिक समाज ने आवाज उठाने की हिमाकत की है, न किसी युवा संघ संगठन ने ।

ओशो सन्यासी की तर्क विचारणीय है कि मौजूदा मधेश केन्द्रित दल और नेताओं के दोनों पैर सत्ता राजनीति के दल दल में इस कदर फंस चुके है, जिसे निकालना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन प्रायः है । क्योंकि जब वे एक पैर के सहारे दूसरे पैर को निकालेंगे, तो पहला पैर को स्वाभाविक रूप से फंसना होगा । हालात यह है, और दल दल इतने परिधि में फैल चुकी है कि कोई दूसरा तीसरा भी अगर निकालने जायें, तो उसका भी फंसना सत् प्रतिशत निश्चित है ।

हां, कुछ तरकीबें यह निकालने की कोशिश जरुर हुई हैं कि दल दल में फंस चुके नेताओं को दूर से ही लाठी, रस्सी, रड या कपडे के छोडों को उनतक पहुँचाकर उन्हें निकालने की कोशिश की गयी हैं/की जा रही हैं, मगर नशे में मरने बालों को मौत का नशा भी प्यारा और लुभावन होते हैं । दूसरी तरफ यह मनोविज्ञान देखा जा रहा है कि “हम तो गये गये सनम-तुमको भी लेकर जायेंगे” की कहावत को सत्य सावित करने के लिए दल दल में रहे मधेशी लोग वस्तुत: चाहते हैं कि वे सारे समाज को ही लेकर डूबें ।

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यह बेमौत की खेल निराली है । दुनिया के कुछ जगहों में स्व-मौत की खेल भी खेले जाते हैं । वहाँ वैसे मौतें भी एक अनकही आनन्द है । वस्तुतः वैसा मौत मनोवैज्ञानिक ढंग से चार समाज के लोग अपना सकते हैं । वे हैं : बूढापे से तंग लोग, गरीबी के पराकाष्ठा में पहुँचे लोग, प्रेम में धोखे के शिकार लोग और सुख व आनन्द के अन्तिम छोड को प्राप्त लोग । मगर नेपाल में पाँचवें तप्के के होशियार हुण्ड मधेशियों की भी कुछ समूह हैं, जो खुद से राजनीतिक नशे में अपरिचित और अपरिपक्व मौत से राजनीतिक दोस्ती में चूर हैं । राज्य अपने पायमाने से उसमें मलजल करता रहता है ।

मधेश स्वराज नामक पोथी में एक बात की सन्दर्भ है, “नेपाली राज्य बडी चालाकी से एक मधेशी को बढाकर दूसरे को नियन्त्रित करता है । जब पहला बढने लगता है, तो उसे नियन्त्रित करने हेतु दूसरे को इस ढंग से बढाता है कि यह पता ही नहीं चल पाता कि मधेशियों का सही शत्रु आखिर कौन है । भाष्य ऐसा निर्माण किया जाता है कि राज्य मधेश का शत्रु होने ज्यादा दोस्त, और मधेशी ही मधेशी का शत्रु सावित दिखने लगता है ।”

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