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भावना की चादर : अंशु झा

 

भावना की चादर

आज सुन लिया था मैंने,
वाे तेरी अनकही बाताें काे,
अवाक् हाे खड़ी हाे गई थी
एक काेने में ।

समेटने लग गई थी,
अपनी भावनाओं की
चादर काे
जिसे बुना था,
वर्षाें लगाकर
तेरी यादाें के धागे से ।

तेरे तथाकथित प्रेम से
बनाया था उसका किनारा,
और तेरी मिठी-मिठी बाताें से
उस पर की थी कढ़ाई ।

ओढ़ लिया था इस प्रकार
कि तेरे अन्तर्मन काे
देख नहीं पाई,
बस, ओढ़ी जा रही थी,
ओढ़ी जा रही थी ।

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अंशु झा,
बल्खु, काठमांडू नेपाल |

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