नव निर्वाचित राष्ट्रपति से आम जनता की अपेक्षा : कंचना झा

कंचना झा, हिमालिनी अंक मार्च 023 । मचन्द्र पौडेल अब सामान्य व्यक्ति नहीं रहे । अब वह देश के अभिभावक बन गए है । देश के पहले नागरिक जो अब सबसे पहले अपने देश अपनी जनता को लेकर सोचेंगे । अब वो कांग्रेस या किसी भी दल के नेता नहीं हैं । वो इन सबसे उपर हैं । अर्थात् नेपाल के तीसरे राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने शपथ ले लिया है । २०७९ फागुन २५ गते को संघीय संसद में हुए निर्वाचन में पौडेल ने ३३ हजार ८०२ मत प्राप्त किया । साथ ही २१४ संघीय सांसद और ३५२ प्रदेश सांसदों का मत प्राप्त कर वो देश के नए राष्ट्रपति चुने गए ।
नेपाल को उनसे बहुत सी उम्मीदें हैं । वैसे ऐसी बात नहीं है कि यह नाम या यह चेहरा नया है नेपाल की राजनीति के लिए । उनका एक लम्बा इतिहास है नेपाल की राजनीति में । सच यही है कि वो कभी बहुत ज्यादा चर्चा का विषय नहीं बने, और धीरे–धीरे आम नागरिक की नजर में अपने अच्छे व्यक्तित्व को बनाए रखा ।
राष्ट्रपति पौडेल ७८साल के हैं । उनका जन्म सितंबर १९४४ को नेपाल के तनहुँ के रिस्ती गाविस स्थित बाहुन पोखरा में हुआ । एक लम्बा अरसा बिताया है उन्होंने नेपाल की राजनीति में । २०२२ के आम चुनाव में उन्हें संसद सदस्य के रूप में चुना गया । इससे पहले उन्होंने नेपाल में उप प्रधान मंत्री और प्रतिनिधि सभा के सभामुख के रूप में कार्य किया । उन्होंने अपनी पढ़ाई त्रिभुवन यूनिवर्सिटी से पूरी की है ।
एक अलग ही छवि रही है उनकी । यहाँ तक कि कांग्रेस में भी उनकी सभी तारीफ ही करते हैं । उन्होंने कभी पद को महत्व नहीं दिया । कांग्रेस सभापति देउवा उनके बहुत ही करीबी हैं । दोनों एक दूसरे के अच्छे मित्र भी हैं । और यही एक डर है आम नागरिक को कि कहीं एक बार फिर राष्ट्रपति देश और जनता के अभिभावक नहीं बन पाए तो क्या होगा ? क्या हर बार हम अपने अभिभावक को कटघरे में खड़ा करेंगे ?जैसा पहले भी करते आए हैं । क्योंकि गणतंत्र नेपाल के इससे पहले जो दो राष्ट्रपति निर्वाचित हुए थे, उनसे जनता की जो अपेक्षाएं थी वह पूरी नहीं हो सकी । एक तरह से कहें तो दोनों ही राष्ट्रपति को प्रशंसा कम मिली और आलोचना के शिकार ज्यादा हुए हैं ।
वैसे राजनीति में आलोचना का होना कोई बड़ी बात नहीं है । लेकिन यह एक गरिमामय पद है । और इस पद की अपनी एक अलग ही मर्यादा है । यह पद किसी खास व्यक्ति, किसी खास दल से संबंधित नहीं है कि वह कठपुतली सा काम करें । इस पद पर बैठने वाला कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हो सकता है । उसे सबसे अलग अपनी सोच बनानी होगी । जैसे कहते हैं न पंच परमेश्वर । जो पंच बनता है उसमें परमेश्वर का रूप बसता है तो राष्ट्रपति में भी उसी परमेश्वर का वास चाहिए । परमेश्वर वो जो अपने लिए नहीं वरन सम्पूर्ण जगत के बारे में सोचता है । तो ऐसे पद पर बैठने वाले हमारे देश के राष्ट्रपति भी सबसे अलग हो जिसे केवल अपनी नहीं वरन अपनी मर्यादा, अपना देश, देश का स्वाभिमान, जनता और सिर्फ जनता की समृद्धि, और विकास का ख्याल रहे ।
वैसे तो राष्ट्रपति पद तथा गोपनीयता की शपथ लेने से पहले ही उन्होंने कांग्रेस के सभी पद और सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है । अब देखना यह है कि वो अपने दल और परिवारवाद से कितना अलग होकर देश और अपनी जनता के लिए सोचते हैं । नेपाल की राजनीति में अभी भी बहुत बदलाव आने बाकी हैं । देश एक नए मोड़ पर खड़ा है । जहाँ देश को समृद्धि, और विकास की ओर अग्रसर होना है । यह अपेक्षा है आम नागरिकों की उनसे कि वो इस ओर ज्यादा से ज्यादा ध्यान दें । वैसे सच्चाई यह भी है कि आम जनता को कोई खास उम्मीद नहीं है लेकिन इतना तो बनता है देश की जनता का कि एक अच्छा राष्ट्रपति देश को मिले । जिसकी साफ सुथरी छवि हो, ताकि समय आने पर वह एक जिम्मेदार अभिभावक की भूमिका अदा कर सके ।
कुछ नए सिस्टम हैं जिन्हें समझना जरूरी है । हो सकता है इससे पहले जो राष्ट्रपति बने उन्हें किसी तरह का अनुभव नहीं था कि कैसे क्या करना होगा ? एक नई लहर सी थी देश में । कुछ बदलाव हुए थे जिसकी वजह से शायद वह बहुत कुछ बातों को नहीं समझ पाए । लेकिन अब हम ऐसा नहीं कह सकते । अब तो बहुत कुछ का अनुभव हो गया है तो नई सोच के साथ आगे बढ़ना होगा । रही बात देश के पहले नागरिक को सम्मान देने की तो देश का कौन ऐसा नागरिक होगा जो अपने देश के राष्ट्रपति का सम्मान नहीं करें ।
हम आम नागरिक भी चाहते हैं कि जब राष्ट्रपति निकले तो हमें भी शान का आभास हो कि हाँ देखो हमारा अभिभावक हमसे हमारी बात, हमारी मुश्किलों को, हमारी पीड़ा को सुनने आ रहा है । न कि उसके आने से चारों तरफ यह अफरातरफी मच जाए कि उस की सवारी है इसलिए लोग पैदल भी अपने गंतव्य तक नहीं जा सकेंगे । अगर कोई व्यक्ति बीमार है तो वह इलाज के लिए नहीं जा सके । क्योंकि राष्ट्रपति की सवारी हो रही है । आम जनता को कोई खास उम्मीद नहीं है लेकिन एक चाहत है कि अच्छे राष्ट्रपति हो तो वह अभिभावक की भूमिका अदा करें ।
अब कुछ बातें विगत की तो जब पहली बार राष्ट्रप्रमुख के रूप में महिला को चुना गया तब पूरे नेपाल की छाती गर्व से तन गई थी । चारों ओर से इस कदम की प्रशंसा की गई कि नेपाल की पहली नागरिक बनी हैं विद्या देवी भंडारी । नेपाल में महिलाओं की अवस्था को लेकर बहुत कुछ करना था । ये उस वक्त की बहुत बड़ी मांग थी लेकिन इस मांग को नजरअंदाज कर दिया गया । बहुत कुछ ऐसी बातें आई जिसमें महिला ने ही खुलकर उनका विरोध किया । हमारे देश की महिलाएं बहुत सुलझी हुई हैं । वो सम्मान देना जानती हैं अपने राष्ट्रपति को । लेकिन अपना अपमान वो कभी बर्दाश्त नहीं करती ।
एक उम्मीद जो थी उनको लेकर कि वो अपने दल से बाहर होकर सोचेंगी वो नहीं हो पाया । विश्व मंच की अगर बात करें तो सच में नेपाल की प्रशंसा हुई कि वहाँ महिलाओं को प्राथमिकता में रखा जाता है लेकिन अपने ही देश में भंडारी पर बहुत से आरोप भी लगे जिनमें एक बहुत बड़ा कारण रहा है महिला हक अधिकार को लेकर । महिलाएं चाहती थी कि हमारी राष्ट्रपति महिला की नागरिकता को लेकर बातें करे,ं लेकिन वो अपने दल से उपर नहीं उठ पाई उन्होंने एमाले से अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत की थी । और नेपाल की पहली नागरिक तथा राष्ट्रपति बनने के बाद भी वो एमाले की ही बनी रही अपने दल और अपनी पार्टी जिसका परित्याग तो उन्होंने कर दिया था लेकिन करती वही थीं जो उनसे करवाया जाता रहा । संविधान और सर्वोच्च अदालत के आदेश विपरीत उन्होंने दो बार प्रतिनिधि सभा विघटन करके तत्कालीन प्रधानमन्त्री केपी ओली के कदम को पक्षपोषण करने का काम किया । बहुत कुछ ऐसी बातें हुई जो कहीं होती ही नहीं है । राष्ट्रपति जैसे गरिमामय पद पर होते हुए उन्होंने कुछ ऐसे काम किए जो आम नागरिक या कहें कि देश के विद्वत वर्ग को अच्छा नहीं लगा । बहुत से काम उन्होंने संविधान के विपरीत किए ।
एमाले के आन्तरिक विवाद का व्यवस्थापन नहीं कर पाने के बाद जब तत्कालीन प्रधानमन्त्री ओली ने २०७७ पुस ५ गते प्रतिनिधिसभा विघटन की सिफारिश की । तब राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने फैसला नहीं किया, उन्होंने फैसला किया एमाले पार्टी के लिए । उन्होंने ओली का साथ देते हुए संविधान की व्यवस्था विपरीत प्रतिनिधिसभा विघटन कर २०७८ वैशाख १७ और २७ गते दो चरण में निर्वाचन के तारीख की घोषणा की । वैसे सर्वोच्च अदालत ने इसे रद्द कर दिया था फिर भी ओली ने दुबारा २०७८ जेठ २ गते प्रतिनिधिसभा के विघटन की सिफारिश की तो मध्यरात तक कार्यालय को खुला रखकर उन्होंने स्वीकृति दी थी । उनके इन कदमों को देखकर आम नागरिक की यही भावना रही कि जिस पद की उंmचाई पर उन्हें बिठाया गया । उस उंmचाई का उन्होंने मान नहीं रखा ।
उनके द्वारा किए गए गलतियों का मलाल नेपाल के आम नागरिक को सदैव रहेगा । यही एक डर है नव निर्वाचित राष्ट्रपति से कि क्या वो अपने दल से बाहर निकल कर आम नागरिक की इच्छाओं का सम्मान कर पाएंगे ? ये तो हुई महिला राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी की बातें । अब कुछ बातें करें नेपाल के इतिहास में दर्ज पहले राष्ट्रपति राम वारण यादव के बारे में ।
नेपाल के इतिहास में उनका नाम दर्ज हुआ पहले राष्ट्रपति के रूप में । नया नेपाल, नई सोच । पूरे नेपाल के लिए यह भी बहुत बड़ी बात कि एक मधेशी को नेपाल के पहले राष्ट्रपति के रूप में चुना गया । मधेशियों की खुशी का ठिकाना नहीं था । उन्हें जैसे बिन मांगे ही सबकुछ मिल गया ऐसा लग रहा था । लेकिन कहते हैं ना कि आप सोचते कुछ हैं और राजनीति कुछ और ही रास्ता अख्तियार कर लेती है तो पूर्व राष्ट्रपति राम वरण यादव भी इससे बाहर नहीं निकल पाएं । उन्होंने अपना कार्यकाल अपने आप को पहाड़ी बनाने में लगा दिया । ऐसा नहीं है कि मधेश के लोगों ने उनसे बहुत उम्मीदें की हों या फिर उनका इरादा ये रहा हो कि हमें भी कुछ मिले । लेकिन हाँ ये सच है कि नेपाल के इतिहास में जो योगदान मधेशियों का रहा है उसका सही आकलन नहीं किया गया था । जो हक अधिकार मिलना चाहिए था उसकी एक पहल भी उनकी ओर से नहीं किया गया । जिस तरीके से उन्होंने संविधान को सर माथे पर रखकर स्वीकार किया । वह नजारा लोगों को अब भी याद है । अब आकर वो भी कह रहे हैं कि संविधान में कुछ कमियां हैं जिनका सुधार करना जरूरी है । समझ में यह नहीं आ रहा है कि अगर ये बात उन्हें आज समझ में आई तो पहले क्यों नहीं ? ये सवाल तो सबके मन में उठेगा । ये तो हुई कुछ मधेश और मधेशियों को लेकर बातें । उसके बाद भी वो बहुत से विवादों में रहे । बहुत बार उन्हें आलोचना का शिकार बनना पड़ा । खासकर प्रधान सेनापति के मामले में उनकी काफी आलोचना हुई । पूर्व राष्ट्रपति राम वरण यादव की आलोचना कई मुद्दों से जुड़ी थी, जिनमें से कुछ उनके द्वारा किए गए विवादित फैसलों के कारण भी हुए ।
एक मुद्दा था कि राम वरण यादव ने अपने राष्ट्रपति पद पर होकर भी नेपाल के विभिन्न संवैधानिक अधिकारों को घटाया था । इसके अलावा, उन्होंने नेपाली संविधान में कुछ ऐसे संशोधन किए जिन्हें लोगों के बीच बहुत विवादित माना गया था । इन संशोधनों में प्रदेश प्रमुख के अधिकारों को बढ़ाया गया था जिसे लोगों ने नेपाल की लोकतंत्र में एक गंभीर खतरा माना ।
ये मानव स्वभाव है कि नहीं चाहते हुए भी हम कुछ न कुछ अपेक्षाएं करते ही है तो ऐसे में नव निर्वाचित राष्ट्रपति से भी कुछ आशाएं हैं । आम नागरिक को अपने लिए नहीं कुछ चाहिए । लेकिन हाँ देश और देश के भविष्य, उसकी समृद्धि, उसके विकास की बात आती है तो वह सोचने के लिए मजबूर हो जाती है । वो चाहती है कि आने वाली समय में नव निर्वाचित राष्ट्रपति देश के विकास के बारे में सभी दल को खबरदार करते रहें । राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा दें । देश में शांति एवं स्थिरता लाने पर जोर दें । संविधान और लोकतंत्र की रक्षा करें । सरकार और दल को जनता के प्रति उत्तरदायी होने के लिए समय समय पर जानकारी लें ।
एक खास बात का जरूर ध्यान रखें कि इससे पहले के राष्ट्रपतियों ने अपने शानो शौकत का जिस तरह का प्रदर्शन किया है उसका अनुसरण नव निर्वाचित राष्ट्रपति कदापि नहीं करें ।

