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कानूनी शासन के खिलाफ माओवादी की हुँकार : लिलानाथ गौतम

 

लिलानाथ गौतम, हिमालिनी अंक मार्च 023। तत्कालीन नेकपा माओवादी के नेतृत्व में वि.सं. २०५२ साल में सशस्त्र युद्ध की घोषणा की गई थी । ‘जनयुद्ध’ नाम देकर शुरु उक्त युद्ध १० साल तक जारी रहा, लगभग १७ हजार नागरिकों की जान चली गई । युद्ध के कारण प्रभावित कई नागरिक आज भी कष्टपूर्ण जीवन जी रहे हैं । वि.सं. २०६३ साल में ‘ शान्ति प्रक्रिया’ के नाम में युद्ध को स्थगित किया गया और माओवादी हिंसापूर्ण राजनीति परित्याग कर शान्तिपूर्ण राजनीति में अवतरण हो गए । लेकिन युद्ध के साथ जुड़ी हुई कई घटनाएं ऐसी हैं, जो आज भी लोगों को रुला देती है । स्मरणीय बात यह है कि तत्कालीन सशस्त्र युद्ध के लिए जिम्मेदार प्रमुख पात्र पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ और डा. बाबुराम भट्टराई देश के प्रधानमन्त्री बन चुके हैं, प्रचण्ड तो तीसरी बार प्रधानमन्त्री बने हैं । लगभग दो दशक की अवधि में तत्कालीन माओवादी समूह ने चौथी बार सरकार का नेतृत्व किया है । लेकिन युद्ध के साथ जुड़ा हुआ मुद्दा और पीडि़तों की पीड़ा खत्म नहीं हुई है, जो इस वक्त चर्चा में है ।

घटना यही है कि तत्कालीन सशस्त्र युद्ध के पीडि़तोें के पक्षधर होकर कुछ अधिवक्ताओं ने प्रधानमन्त्री प्रचण्ड के विरुद्ध सर्वोच्च अदालत में एक रिट निवेदन पंजीकृत किया, रिट निवेदन के ऊपर जब सर्वोच्च अदालत ने सुनवाई शुरु की तो विभिन्न समूह में विभाजित माओवादी नेतागण के होश उड़ गए । फौजदारी अभियोग सम्बन्धी उक्त रिट निवेदन में प्रधानमन्त्री प्रचण्ड को गिरफ्तार कर अनुसन्धान करने के लिए मांग की गयी है । ज्ञानेन्द्रराज आरण, कल्याण बुढाथोकी जैसे दर्जन से अधिक अधिवक्ताओं की ओर से दायर रिट को शुरु में अदालत प्रशासन ने अस्वीकृत कर दिया था । कहा था कि यह राजनीतिक प्रकृति का मुद्दा है, दर्ता के लिए अयोग्य है । लेकिन अधिवक्ताओं का समूह दरपीठ (पंजीकरण के लिए अयोग्य) विरुद्ध फिर दूसरा निवेदन लेकर सर्वोच्च पहुँच गए । इसबार न्यायाधीश ईश्वरीप्रसाद खतिवडा और हरि फुयाल की संयुक्त इजलास ने निवेदन पंजीकृत करने के लिए आदेश दिया ।

जब निवेदन पंजीकृत हो गया तो तत्कालीन विद्रोही समूह (माओवादी नेता गण) के भीतर भूचाल पैदा हो गया । एक–दूसरे के विरुद्ध ऊंची स्वर में गाली देनेवाले और आधा दर्जन से अधिक समूह में विभाजित माओवादी नेतागण रातोरात एक ही मञ्च में दिखाई देने लगे । एकीकृत माओवादी नेतागण सर्वोच्च अदालत और विधि के शासन विरुद्ध इसतरह हुँकार भरने लगे कि पुराने मुद्दे को लेकर माओवादी विरुद्ध अदालत जाना एक अपराध है । माओवादी नेताओं ने कहा कि यह एक षडयन्त्र है और अदालती निर्णय स्वीकार्य नहीं है । कुछ नेताओं ने यहां तक कहा कि अगर माओवादी को इसतरह परेशान किया जाता है तो देश में फिर सशस्त्र युद्ध हो सकता है । माओवादी की ओर से व्यक्त इसतरह की धमकीपूर्ण अभिव्यक्ति से स्पष्ट होता है कि माओवादी आज भी शान्तिपूर्ण राजनीति और विधि के शासन प्रति प्रतिबद्ध नहीं है । इस प्रसंग ने यह भी सन्देश दिया है कि शान्ति प्रक्रिया संबंधी बाकी काम जल्द ही सम्पन्न होना चाहिए, नहीं तो माओवादी नेतागण को किसी भी वक्त जेल जाना पड़ेगा ।

हां, सशस्त्र युद्ध के नाम में कई मानवता विरोधी अपराध हुआ है और पीडि़तजन आज तक न्याय प्राप्ति से वंचित हैं । ऐसे मुद्दे को सत्य निरूपण कर न्याय सम्पादन के लिए तत्कालीन विद्रोही माओवादी और अन्य राजनीतिक पार्टियों के बीच सहमति हुई थी । सहमतिपत्र में तत्कालीन प्रधानमन्त्री गिरिजाप्रसाद कोइराला और माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड ने हस्ताक्षर किया है । सहमति अनुसार सत्य निरूपण तथा मेलमिलाप आयोग और लापता व्यक्तियों की खोजबीन और छानबीन आयोग भी बनाया गया । लेकिन इमानदारीपूर्वक कार्य सम्पादन के लिए दोनों पक्ष तैयार नहीं रहे, अपने–अपने स्वार्थ के अनुसार आयोग का प्रयोग किया गया । परिणामतः वे लोग निर्धारित समय में शान्ति प्रक्रिया संबंधी कार्य को अंजाम नहीं दे पाए । इस असफलता को लेकर तत्कालीन दो समूह के बीच आरोप–प्रत्यारोप होता रहा है । शान्ति सम्झौता ने १८ साल पूरे कर लिए हैं, लेकिन युद्ध से पीडि़त नागरिक, न्याय प्राप्ति की अनुभूति से वंचित हैं ।

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माओवादी संबंद्ध नेताओं की माने तो सशस्त्र युद्धकालीन मुद्दा संबंधी न्याय सम्पादन नियमित अदालत में नहीं होना चाहिए, यह उसका क्षेत्राधिकार नहीं है । वे लोग कहते हैं कि शान्ति सम्झौता के मर्म के अनुसार इस मुद्दा में फैसला होना चाहिए, जिसके लिए एक विशेष प्रकृति की न्यायिक संरचना का निर्माण करना होगा । गौर करने की बात यह है कि विशेष न्यायिक संरचना मांग करनेवाले माओवादी नेतागण शान्ति सम्झौता के बाद अधिक समय सरकार में ही हैं, चार बार सरकार का नेतृत्व कर चुके हैं । आज के दिन भी प्रचण्ड (जो माओवादी के मूलधार भी हैं), प्रधानमन्त्री हैं, जो तीन बार प्रधानमन्त्री हो चुके हैं । दूसरे नेता डा. बाबुराम भट्टराई भी प्रधानमन्त्री बन चुके हैं, जो माओवादी पार्टी परित्याग कर कई जगहों में भटक रहे थे, आज वह भी वापस होकर प्रचण्ड के साथ समाहित हो रहे हैं । तब भी शान्ति प्रक्रिया को पूर्णता प्रदान करने में वे लोग असफल हैं । और पुनः हिंसात्मक युद्ध की धमकी दे रहे हैं । क्या ऐसी गतिविधि कानूनी शासन विरुद्ध नहीं है ? कब तक पीडि़तों को खून का आंसू बहाने के लिए मजबूर रहना होगा ?
हां, माओवादी नेताओं के विरुद्ध भी एक निश्चित समूह है, जो नियोजित रूप में माओवादी नेतागण को फसाना चाहती है । माओवादी के शब्दों में कहे तों वे लोग ‘डॉलरवादी’ हैं, जो विदेशो से प्राप्त होनेवाले डॉलर के लिए कुछ भी करते हैं । लेकिन सत्ता में रहनेवालों को ऐसी परिस्थितियों को अन्त कर पीडि़त नागरिकों को न्याय की अनुभूति दिलाने की जिम्मेदारी नहीं है ? है तो आज पीडि़त नागरिक क्यों न्याय प्राप्ति के नाम में भटक रहे हैं ? शान्ति प्रक्रिया संबंधी काम को पूर्णता प्रदान करने के बजाए पुनः सशस्त्र युद्ध की हुँकार कर समाज को आतंकित करना माओवादी को शोभा देता है ।

युद्ध के दौरान दोनों समूह (तत्कालीन माओवादी और सरकार) की ओर से कई मानवता विरोधी जघन्य अपराध हुए हंै । अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय अक्सर इस मुद्दा में रुचि रखता है । अन्तर्राष्ट्रीय समूह की इसी रुचि के कारण देश के भीतर रहे माओवादी विरोधी समूह उत्साहित हो जाता है, जो माओवादी के लिए सरदर्द का विषय बन जाता है । और तत्कालीन युद्ध में प्रत्यक्ष÷अप्रत्यक्ष संलग्न माओवादी नेता तथा कार्यकर्ता मानसिक रूप में असन्तुलित बन जाते हैं । माओवादी नेताओं की हिंसात्मक अभिव्यक्ति वही असन्तुलित मानसिकता का परिणाम है ।

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अदालत में मुद्दा प्रक्रिया शुरु होने के बाद एकीकृत माओवादी नेतागण कहते हैं कि प्रधानमन्त्री प्रचण्ड विरुद्ध रिट निवेदन पंजीकृत होना ‘माओवादी विरुद्ध का षडयन्त्र है, अदालती निर्णय माओवादी को स्वीकार्य नहीं है । इसके विरुद्ध चरणबद्ध आन्दोलन करने का निर्णय भी माओवादी ने किया है । संयुक्त मञ्च को सम्बोधन करते हुए प्रचण्ड ने कहा है– ‘शान्ति सम्झौता के एक हस्ताक्षरकर्ता विरुद्ध क्यों (अदालत की आदेश) ऐसा आदेश आया ? यह तो रहस्यमय है, षड्यन्त्रकारियों की ओर से ही ऐसा हुआ है । इसके प्लेयर साम्राज्यवादी शक्ति हैं, आन्तरिक रूप में भी यह प्रतिगमनकारी प्रक्रिया है ।’ माओवादी नेतृत्व का ऐसा कथन हताश मानसिकता की उपज है । अगर, सूझबूझ के साथ माओवादी नेतागण ऐसे निष्कर्ष पर पहुँच गए हैं तो स्पष्ट है कि माओवादी आज भी विधि के शासन प्रति प्रतिबद्ध नहीं है । क्योंकि प्रचलित राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय कानून का पालन करना हर नागरिकों का कर्तव्य है । अगर कानूनी मान्यता अनुसार किसी व्यक्ति तथा समूह के विरुद्ध मुद्दा पंजीकृत हो जाता है तो उसका प्रतिरोध भी कानूनी विधि से ही होना चाहिए, न कि हिंसात्मक अभिव्यक्ति देकर ।

क्यों डरते हैं माओवादी ?
लगभग १८ साल से माओवादी नेता शान्तिपूर्ण राजनीतिक यात्रा में हैं । लेकिन वि.सं. २०५२ साल से ०६२ तक जारी हिंसात्मक युद्ध संबंधी घटना के कारण आज भी वे लोग निश्चिन्त होकर सार्वजनिक स्थलों में नहीं जा पाते । देश के भीतर पीडि़तों के आक्रमण में पड़ने की संभावना है या नहीं ? बहस के लिए अलग विषय है, लेकिन इस प्रश्न को लेकर कुछ माओवादी नेता डर जाते हैं । इतना ही नहीं, माओवादी नेताओं का अन्तर्राष्ट्रीय भ्रमण भी सहज नहीं है । विशेषतः अमेरिका तथा युरोपियन देशों की यात्रा माओवादी के लिए सहज नहीं है, विशेष सतर्कता अपनाने के लिए वे लोग बाध्य हैं, क्योंकि कई देशों में उन लोगों का नाम ‘आतंककारी’ की सूची में है । उदाहरण के लिए चार साल पहले की एक घटना को स्मरण कर सकते हैं । माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड की धर्मपत्नी पार्किन्सन रोग से पीडि़त हैं, डाक्टरों ने उपचार के लिए अमेरिका ले जाने का कहा । लेकिन प्रचण्ड डर गए । उनको लगा कि द्वन्द्वकालीन मुद्दा को लेकर अमेरिका में मुझे गिरफ्तार तो नहीं किया जाएगा ? यह बात माओवादी नेतागण स्वीकार करते हैं । लेकिन जब अमेरिकी अधिकारियों की ओर से आश्वस्त किया गया कि उनके ऊपर ऐसा कुछ भी होने वाला नहीं है, तब जाकर अध्यक्ष प्रचण्ड अमेरिका जाने के लिए तैयार हो गए थे ।
वर्तमान मुद्दा क्या है ?

इसके लिए वि.सं. २०७६ साल माघ १ गते को स्मरण करना होगा । थारु समुदाय की ओर से काठमांडू स्थित खुलामञ्च में माघी महोत्सव आयोजित था । महोत्सव के प्रमुख वक्ता थे– माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड । जहां उन्होंने तत्कालीन सशस्त्र युद्ध संबन्धी प्रसंग में भाषण दिया । कहा कि जनयुद्ध के दौरान १७ हजार मारे गए हैं, उसमें से तत्कालीन विद्रोही समूह की ओर से सिर्फ ५ हजार नागरिकों की जान गई थी । उन्होंने कहा– ‘मुझे देखकर कुछ लोग कहते हैं कि यह १७ हजार मार कर आया है । मित्रगण ! यह सत्य नहीं है । सत्य क्या है, यह मैं कहता हूँ । तत्कालीन सामन्तवादी राजा ने १२ हजार को मारा है । ५ हजार की जिम्मेदारी दी जाती है तो उसकी जिम्मेदारी मैं ले लेता हूँ ।’

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तत्कालीन समय में प्रचण्ड द्वारा व्यक्त इसी अभिव्यक्ति को आधार बनाकर कुछ कानून व्यवसायियों ने आज आकर प्रचण्ड विरुद्ध सर्वोच्च में रिट निवेदन पंजीकृत किया । उक्त अभिव्यक्ति का वीडियो प्रमाण आज भी मिल जाता है । कानून व्यवसायियों का कहना है कि प्रचण्ड ने सार्वजनिक रूप में ही मानवहत्या को स्वीकार किया है, इसीलिए उनको गिरफ्तार कर कारवाही प्रक्रिया आगे बढ़ाना चाहिए । इसी मांग के साथ दायर रिट निवेदन के ऊपर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा है कि पीडि़तों को न्याय प्राप्ति का अधिकार है, इसको कुण्ठित नहीं करना चाहिए । आदेश में कहा है– ‘पीडि़तों को सत्य–तथ्य जानने की और न्याय प्राप्त करने का अधिकार है, विभिन्न कारण दिखाकर मुद्दा को अनन्तकाल तक जारी रखना ठीक नहीं है ।’

अब क्या हो सकता है ?
अदालत में मुद्दा पंजीकृत हो चुका है । जिसको लेकर कुछ लोग कहते हैं कि अब प्रचण्ड गिरफ्तार हो जाएंगे । लेकिन ऐसा होने की सम्भावना न्यून है । क्योंकि हमारे यहां न्यायालय में राजनीतिक प्रभाव पड़ जाता है । प्रधानमन्त्री पद में विराजमान प्रचण्ड विरुद्ध गिरफ्तारी के लिए राजनीतिक वातावरण नहीं है, न तो यह शुद्ध फौजदारी मुद्दा ही है । सामान्य नागरिकों के विरुद्ध पंजीकृत मुद्दा में पुलिस का एक्सन तत्काल हो सकता है, लेकिन प्रचण्ड के सवाल में ऐसा होने की संभावना नहीं है । कानूनी रूप में भी अगर किसी के विरुद्ध फौजदारी मुद्दा पंजीकृत हो जाता है तो गिरफ्तार के लिए उनके विरुद्ध प्रमाण इकठ्ठा करना होगा । जरूरी परिस्थिति के अलावा अदालत की अनुमति बिना किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता । कानून में विद्यमान इसी व्यवस्था के कारण भी प्रचण्ड के तत्काल गिरफ्तार होने की संभावना नहीं है ।
इतना ही नहीं, इस मुद्दा को लेकर सभी माओवादी समूह इकठ्ठा हो रहे हैं और आन्दोलन का उद्घोष कर चुके हैं । ऐसी पृष्ठभूमि में उल्लेखित मुद्दा में अदालत की ओर से भी तत्काल सम्बोधन होने की संभावना कम दिखती है । अदालती प्रक्रिया में भी विपक्षी को लिखित जबाव पेश करने का अधिकार है । ऐसी कई प्रक्रिया पूरा करते–करते मुद्दा को एक अलग ही तरीके से मोड़ दिया जाएगा, ऐसी संभावना अधिक है । क्योंकि यह प्रसंग सिर्फ फौजदारी मुद्दों से जुड़ा हुआ नहीं है । यह तो एक राजनीतिक मुद्दा भी है । अगर इसी मुद्दा को आधार बनाकर प्रचण्ड तथा माओवादीगण के जेल जाने की परिस्थिति बन जाती है तो माओवादी पक्षधर समूह भी चुप रहनेवाले नहीं हैं । तत्कालीन सशस्त्र युद्ध के साथ सरोकार रखनेवाले सरकार पक्षधर अन्य समूह के व्यक्तियों के विरुद्ध भी इसी प्रकृति का मुद्दा लग सकता है । स्मरणीय है, प्रचण्ड विरुद्ध मुद्दा पंजीकृत होने के बाद युद्धकालीन प्रसंग को लेकर ही सैनिक अधिकारी विरुद्ध मुद्दा पंजीकृत हो चुका है ।

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