सर्वोच्च अदालत vs रेशमलाल चौधरी का जन्म कैद (उम्र कैद) का फैसला : कैलाश महतो
कैलाश महतो, परासी । न्याय प्रथा और न्यायालय का प्रथम विकास
ऐतिहासिक रुप से प्राचीन समाज में न्यायिक सम्झौते से पहले बीच-बचाव और मध्यस्थता का काम हुआ करता था । समाज में उब्जे असहमति और द्वन्दों को बिच-बचाव और मध्यस्थता के द्वारा ही प्राचीन भारत और इस्लामिक दुनिया में सुलझाये जाते थे । इसके साथ ही ऐसे प्रथा का चलन आया कि बाद में प्राचीन ग्रीस, चीन के साथ ही अरेबियन जनजाति तथा मध्यकालीन यूरोप तथा पापल अभ्यासों समेत में पाये जाते हैं ।
इतिहास के अनुसार संसार का सबसे पूराना न्यायालय स्पेन के Valencia (भ्यालेन्सिया) के नाम से परिचित होता है, जो जल न्यायालय या न्यायाधिकरण के नाम से प्रख्यात हुआ था । Jose Jordan के गणित अनुसार यह अदालत तकरीबन १,००० साल पहले अभ्यास में आया था । रोमन काल में स्थापित इस अदालत का प्रमुख कार्य लोगों में जल वितरण प्रणाली को जनता में समान पहुँच बनाना था । बाद में इस अदालत का रुप बिस्तार होने के साथ ही जीवन के हर आयाम को अपने शिकंजे में लपेटते चला गया । आज घरायसी झगडों से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय, नमक से लेकर हीरे और आस्तिकता से लेकर नास्तिकता तक का मुद्दा अदालत के कोर्ट में देखे जा रहे हैं ।
अदालत और न्यायालय विकास के क्रम में अदालतों ने न्याय देने के बहाने अधिकांश व्यक्ति, परिवार, समाज, देश, राष्ट्र और अन्तरराष्ट्र को अपने परिधि में कैद कर रखे हैं । समाज में बढते व्यस्तता और समय के अभाव में समाज के सामाजिक न्यायाधीशों ने सामूहिक एक न्यायिक संस्था का निर्माण कर डाले ता कि वहाँ मौजूद न्यायिक पदाधिकारी व्यक्ति और समाज को उसका न्यायिक हक उपलब्ध करा सके । मगर निर्देशित संस्थायें उद्देश्य के विपरीत जब काम और न्याय देने लगे, तो समाज को ठहरकर उसकी जांच करनी चाहिए । क्योंकि वहाँ केवल राज्य और समाज की आर्थिक और भौतिक लगानी ही नहीं, अपितु अपार विश्वास की भी लगानी होती है ।
नेपाल में न्याय सम्पादन के काम में प्रमुख भूमिका निर्वाह खातिर जिन न्यायालयों का निर्माण किया गया है, आज वे न्याय देने के बदले केवल कर्मकाण्डी फैसलायी निर्णय करने में अपनी नीति और नियत प्रयोग कर रहे हैं ।
न्याय सिद्धान्त के अनुसार कहा यह जाता है कि लाख दोषी भले ही छूट जायें, मगर एक भी निर्दोष को अन्याय का शिकार नहीं होना चाहिए । मगर रेशमलाल चौधरी किस धरातल पर अन्याय के शिकार हुए, यह अन्धेरे में सियाही से लिखा गया एक पुस्तक है, जिसे अन्धेरे में तो पढा ही नहीं जा सकता । दुर्भाग्यवश उसे सुरज के कडी धूप में भी पढना असम्भव होगा ।
न्याय के बारे में कहा जाता है कि यह संगठित व्यवस्था का वह उपलब्धि है, जो कानुन से सम्बन्धित रहता है । अदालतों में कानुन, कानुन के व्याख्याता और पालनकर्ता स्वाभाविक रुप में मौजूद रहता है । न्यायालय में कानुन का व्याख्याता कानुन व्यवसायी होता है, तो कानुन का पालनकर्ता न्याय मूर्ति और निबेदक दोनों होते हैं । फिर भी निवेदक चाहते नचाहते केवल पालनकर्ता होता है, वहीं न्याय मुर्ति न्याय का निर्दोष दीपक भी होता है । इसिलिए तो कहा जाता है, “उदि राज्य में न्याय का दीपक बुझ जाए तो अँधेरा कितना घना होगा, उसकी कल्पना नहीं की जा सकती ।” वैसे भी न्याय शब्द का जो अगर तेजी शब्द है “Justice”, वह “Jus” से निर्मित हुआ है, जिसका अर्थ है न्यायधीश खुद को न्याय से अपने को बाँधकर अपने ग्राहकों को न्याय से जोडना” ।”
अधिवक्ता स्वागत नेपाल को मानें तो जो रेशमलाल चौधरी टिकापुर के सुरक्षित रखने के लिए 2072 श्रावण ७ गते के दिन घटना स्थल से कोशों दूर रहकर तत्कालीन प्रधानमन्त्री, गृह मंत्री और सम्बन्धित निकायों को बार बार अनुरोध के हिदायत यह दी थी कि टिकापुर में एमरजेंसी तथा कर्फ्यू लगाया जाय । भयंकर षड्यन्त्र और खतरे का संकेत है । उन्हीं रेशम चौधरी को पूर्वाग्रह के आधार पर जेल में ठूसा जा रहा है । आजीवन जेल में रखने की अदालती आतंक और क्रूरता लादा जा रहा है ।
आश्चर्य तो यह है कि रेशम चौधरी को ठीक उस अवस्था में आजीवन कारावास की सजा सुनाई जाती है, जिस समय देश में आर्थिक घोटाला और मानव तस्करी के खेलाडियों का गरमा गरमी टूर्नामेंट चल रहा है । एक तरफ राज्य द्वारा रेशम चौधरी और लक्ष्मी महतो को समान्य जीवन प्रदान हेतु कानुन में संसोधन करके की हल्ला चलाया जाता है । राज्य द्वारा कहीं नक्कली शरणार्थी काण्ड को कमजोर या मुद्दा का मुँह मोडने की साज़िश तो नहीं है यह ?
रेशम जी ने जिस उद्देश्य से नागरिक उन्मुक्ति पार्टी खोला, मामला राज्य वहीं से टकराव का ले लिया । समान्य सी बात है कि देश के राजनीति को समान्य रुप से भी चलाने के लिए संसद में आपका बहुमत होना अनिवार्य है । उसके लिए पार्टी नहीं, एक स्वतन्त्र राजनीतिक संगठन होने चाहिए । संगठन का मुद्दा सर्व स्वीकार होने चाहिए ।
आयें पहले हम एक होकर पार्टी विहीन बन जायें । साझा मुद्दे पर सडक पर संघर्ष हों, और स्वतन्त्र होने का जुगाड लगायें


