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काठमांडू, १७ जेठ




हिन्दू धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है । ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहा गया है । निर्जला एकादशी के व्रत में पानी पीना वर्जित होता है अर्थात् पूरे व्रत में एक बूंद पानी भी नहीं पीया जाता है । इसलिए इस एकादशी को निर्जला एकादशी कहा जाता है । वर्ष भर की चौबीस एकादशियों में से ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी सर्वोत्तम मानी गई है । इसका व्रत करने से सारी एकादशियों के व्रतों का फल मिल जाता है।
वैदिक सनातन धर्मावलम्बी आज अपने अपने घरों में तुलसी का बीज डालेंगे । आज के ही दिन मंदिरों और मठो में भी तुलसी के बीज रखें जाते हैं । आज के ही दिन रखें गए बिज एक महिना के बाद आषाढ शुक्ल एकादशी अर्थात् हरिशयनी एकादशी के दिन को रोपा जाता है । आषाढ शुक्ल एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन तक तुलसी की विशेष पूजा की जाती है । यह व्रत बहुत ही कठिन व्रत माना जाता है । बहुत से लोग श्रद्धा पूर्वक इस व्रत का पालन करते हैं । वैसे कहा गया है कि जो लोग बीमार हैं, और स्वस्थ नहीं है उनके लिए कोई पाबंदी नही है वो चाहे तो फलफूल ग्रहण कर सकते हैं ।

 



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