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बालश्रम अन्त के लिए परिवारिक परिस्थिति में बदलाव जरुरीः सामाजिक अभियान्ता

 

नेपाल में आज भी १५ प्रतिशत से अधिक बाल श्रमिक

लिलानाथ गौतम/काठमांडू
जून ८ । बाल श्रमिक न्यूनीकरण और बाल अधिकार के लिए क्रियाशील सामाजिक संस्था और व्यक्तियों का मानना है कि आज भी नेपाल में बाल श्रमिकों की संख्या उल्लेख्य है और श्रमिक बालबालिकाओं में से कई बालबालिका अपने कार्य क्षेत्र में अमानवीय हिंसा से पीडि़त हैं । महिला और बालबालिका संबंधी विषय को लेकर सामाजिक क्षेत्र में क्रियाशील संस्था ‘समाजसेवा तथा मानवअधिकार में महिला और बालबालिका’ (सिविस) के साथ अन्य सामाजिक संस्थाओं की ओर से काठमांडू में बुधबार आयोजित विचार–विमर्श कार्यक्रम में सहभागी वक्ताओं ने श्रमिक बालबालिका और उनकी परिस्थितियों के सम्बन्ध में बहस करते हुए उल्लेखित तथ्य को सामने लाया है ।
बालश्रम विरुद्ध विश्व दिवस (१२ जून) के अवसर पर आयोजित ‘बालश्रम निवारण के संबंध में नेपाल की लक्ष्य, प्रगति और चुनौति’ विषयक विचार–विमर्श कार्यक्रम में श्रम मन्त्रालय अन्तर्गत श्रम तथा व्यवसायजन्य स्वास्थ्य विभाग, राष्ट्रीय बाल अधिकार परिषद्, राष्ट्रिय योजना आयोग, गांवपालिका राष्ट्रीय महासंघ, नागरिक समाज सञ्जाल, बाल अधिकार के क्षेत्र में क्रियाशील विभिन्न सामाजिक संघ–संस्थाओं के प्रतिनिधियों की सहभागिता रही ।
विचार–विमर्श कार्यक्रम में सहभागी होते हुए हुए राष्ट्रीय बाल अधिकार परिषद् के उपाध्यक्ष बम बहादुर बानिया ने कहा कि बाल श्रमिकों की अधिक संख्या ग्रामिण क्षेत्र के स्थायी निवासी हैं, जो सामाजिक तथा परिवारिक विभेद और आर्थिक अभाव के कारण बाल श्रमिक बनने के लिए बाध्य हैं, ऐसे ही बालबालिका शहर प्रवेश करते हैं और घर, होटल तथा विभिन्न कारखाना, मनोरंजनजन्यि क्षेत्र आदि में बाल श्रमिक बनने के लिए बाध्य हैं । उपाध्यक्ष बानिया ने कहा– ‘इस तरह की बाल श्रमिक न्यूनीकरण के लिए स्थानीय सरकार की ओर से पहल होना चाहिए । संघीय सरकार, प्रदेश सरकार और राष्ट्रीय बाल अधिकार परिषद् के बीच आपसी सहकार्य और समन्वय से ही बाल श्रमिकों की परिस्थिति में सुधार लाया जा सकता है ।’ उन्होंने यह भी कहा कि परिषद् कि ओर से बाल श्रमिकों की डिजिटल तथ्यांक तैयार हो रही है । बालबालिकाओं के लिए परिषद् को रिसर्च सेन्टर के रुप में विकसित करने का प्रतिबद्धता भी उन्होंने व्यक्त किया ।
राष्ट्रीय योजना आयोग के सह–सचिव शिव रञ्जन पौडेल ने कहा कि जब तक परिवार की आधारभूत आवश्यकता परिपूर्ति नहीं होती, तब तक ऐसे परिवार के भीतर बाल श्रमिक होने की सम्भावना अधिक रहती है । सह–सचिव पौडेल ने कहा– ‘बाल श्रमिकों का सम्बन्ध परिवारिक की आर्थिक परिस्थिति, शिक्षा और स्वास्थ्य के साथ जुड़ा हुआ है । अगर अभिभावक परिवारिक की आधारभूत आवश्यकता से बंचित रहते हैं तो उनके बच्चे बाल श्रमिक होने की संभावना अधिक रहता है । इसीलिए बाल श्रम अन्त के लिए परिवार के भीतर आर्थिक उपार्जन, शिक्षा और स्वास्थ्य आधारभूत आवश्यकता है ।’ उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय योजना आयोग नीतिगत रुप में बालश्रम अन्त के लिए प्रतिबद्ध है । पौडेल ने कहा कि बाल श्रम अन्त से ही दीर्घकालिन और स्थायी विकास सम्भव है ।
श्रम तथा व्यवसाय जन्य स्वास्थ्य विभाग (श्रम, रोजगार तथा सामाजिक सुरक्षा मन्त्रालय अन्तर्गत) के डाइरेक्टर कल्पना मास्के का कहना है कि बाल श्रम और अधिकार के सम्बन्ध में जो नियम है, वह पुराना है, चालू आर्थिक वर्ष में ही उसमें परिवर्तन कर बाल श्रम अन्त के लिए पहल किया जाएगा । उन्होंने कहा कि नयां नियमावली में वडा तह को भी जिम्मेदार बनाया जाएगा, जहां बाल श्रमिकों की पहचान और उनके लिए आवश्यक सहयोग की प्रत्याभूति होगी । मास्के का यह भी मानना है कि जो बाल श्रमिक हैं, वह अपनी परिस्थितियों को छिपाने में लग जाते हैं, जिसके चलते बालश्रमिकों की यकिन तथ्यांक प्राप्त करने में समस्या हो जाती है ।
गांवपालिका महासंघ नेपाल के अध्यक्ष लक्ष्मीदेवी पाण्डे, नेपाल में महिला और बच्चों की तस्करी के खिलाफ गठबंधन (एएटीडब्लूआईएन) के कार्यकारी निर्देशक बेनुमाया गुरुङ जैसे वक्ताओं ने भी कहा कि आर्थिक रुप में कमजोर परिवार अपने बच्चों को बाल श्रमिक बनाने के लिए बाध्य हैं, इसीलिए बाल श्रम अन्त के लिए पारिवारिक परिस्थितियों में सकारात्मक परिवर्तन परिहार्य है ।
बहस कार्यक्रम के सहजकर्ता तिलोतम पौडेल का कहना है कि आज बाल श्रमिक के रुप में जितने भी बच्चे पहचान में आए हैं, इसके पिछे परिवार की स्वास्थ्य समस्या और आर्थिक समस्या प्रमुख कारण है । इसीतरह बालबालिका के प्रति पारिवारिक उपेक्षा और गलत दोस्तों के कारण भी कई बालबालिका बाल श्रम के क्षेत्र में दिखाई दिए हैं । पौडेल ने कहा कि ग्रामिण क्षेत्र से शहर प्रवेश करनेवाले अधिकांश बच्चे मिडियटर की माध्यम से घर, होटल, क्याफे, डान्सबार, दोहरी (मनोरंजन क्षेत्र), कविन रेष्टुरेष्ट जैसे क्षेत्र में बाल श्रमिक के रुप में काम करने के लिए बाध्य हैं ।
कार्यक्रम में सामाजिक क्षेत्र में क्रियाशील नरेन्द्र डंगोल, मीना शर्मा, प्रकाश शर्मा, गणेश विक, कृष्ण सुवेदी, कमला तामाङ, सरिता महर्जन जैसे व्यक्तित्व ने भी बाल श्रम और अधिकार के सम्बन्ध में अपना–अपना विचार व्यक्त किया । बाल श्रमिक प्रतिनिधि अम्बिका कार्की, विपना बस्नेत, सुधा पौडेल, सन्तोष मल्ल जैसे वक्ताओं ने अपना–अपना अनुभव व्यक्त किया और नेपाल सरकार एवं सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों के साथ बालश्रम और अधिकार के संबंध में प्रश्न किया । बाल श्रमिक प्रतिनिधि लक्ष्मी शेर्पा ने कहा कि कई बालबालिकाओं की अवस्था ऐसी है, जो श्रम किए बिना अपना जीवन को भी आगे नहीं बढ़ा पाते । उन्होंने कहा कि बाल श्रम अन्त के संबंध में बहस करते वक्त ऐसी परिस्थितियों को भी सम्बोधन होना जरुरी है ।
केन्द्रीय तथ्यांक विभाग के अनुसार नेपाल में ५ से १७ साल के बालबालिकाओं की संख्या ७० लाख हैं, इसमें से १५.३ प्रतिशत बालबालिका आज भी बाल श्रमिक के रुप में विभिन्न क्षेत्र में हैं ।

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