अज्ञात सी कठिनाइयों में अज्ञात से घाव अज्ञात मरहम से आते अज्ञात से भाव : प्रियांशी
“अज्ञात”
————
अज्ञात सी दुनिया में
अज्ञात से सहारे
जैसे अज्ञात से इक वन
में अज्ञात सी बहारें
अज्ञात सी हालातों में
अज्ञात ही संवारे
अज्ञात सी आवाज
अज्ञात मुझे पुकारे
जैसे अज्ञात से समुंदर में
अज्ञात सी है नाव
जैसे अज्ञात सी धूप में
अज्ञात सी छांव
अज्ञात सी कठिनाइयों में
अज्ञात से घाव
अज्ञात मरहम से
आते अज्ञात से भाव
अज्ञात से साधु से,
मिला अज्ञात सा संग
अज्ञात सी शांति
होती अज्ञात से भंग
अज्ञात से कारणों से
अज्ञात से जंग
अज्ञात सी बीमारी
और अज्ञात हैं दंग
अज्ञात सी रात्रि में
अज्ञात से “सपने”
है सपने को अज्ञात सा भय,
कौन पराये, कौन अपने
अज्ञात सी खुश हाली में
अज्ञात होते “अपने”
अज्ञात सी दुख हाली में
वही “अपने” तोड़ें सपने
अज्ञात से वे आंसू
अज्ञात सपने की भूल सुधारे
फिर वे वास्तविक अपने,
हमारे टूटे सपने संवारे
वही अज्ञात सहारे
जो कहलाते थे पराये,
वे अब अपने कहलाये
बिगड़ी वही संवारे
फिर वो नहीं रहते अज्ञात,
परिचय वही दे
अनजाने, जाने हो जाते
दुख के hero बन जाते
अज्ञात से अंधियारे में
दीया बन, खुद को जलाते
उजाला वही कराते,
राह वही दर्शाते,
हमे वही जगाते
— प्रियांशी, मुंबई, एकादशम् वर्ग


