अबूझमाड़ की नायिका “दुड़िया” (विश्वास पाटील – हिंदी अनुवाद -रवि बुले ) – मनीषा खटाटे
मराठी साहित्य में विश्वास पाटील एक ऐसा नाम है जो हमेशा साहित्याकाश में ज्ञान और सत्य की किरणों से भी अपनी सृजनधर्मिता को सिद्ध करते है तथा कल्पना और यथार्थ के क्षितिज पर सत्य की खोज में अकेले ही निकल पड़ते है ,कभी वे अबूझमाड़ के पर्वतों में यायावरी करते है ।इस सत्य के खोजी यायावरी की यही विशेषता नव साहित्यकारों के लिए एक आदर्श बन जाती हैं।अपने उपन्यासों से मराठी साहित्य को समृद्ध करनेवाले मराठी भाषा के महान उपन्यासकार विश्वास पाटील ऐतिहासिक उपन्यास के साथ समसामायिक तथा सामाज़िक समस्याओं पर भी अपना साहित्य संसार खड़ा करते है कि जिससे साहित्य की दूनिया में सत्य का ऐसा विराट दर्शन कराते है कि पाठक की अंतरात्मा को पहले तो झकझोर देते है तथा कहानी के पढ़ने के साथ सहज ही आत्मरुपांतरण के लिए मज़बूर कर देते है।यह मेरे भाव उनके प्रति पानिपत,महानायक,संभाजी,महासम्राट,झाडाझडती से लेकर अभी वर्तमान समय में प्रकाशित हुआ उपन्यास “दुड़िया” पढ़ने के बाद भी वैसा ही रहा है जैसे कि आरंभ में था।उन्होंने मेरी हाथों में “दुड़िया” और “महासम्राट” के हिंदी अनुवाद सौप दिये और उसके उपर लिखने की जिम्मेवारी भी सौप दी,जैसे ही यह दोनो किताबों का पार्सल घर पर पहूँचा तो मैं बहुत आल्हादित हो गयी ।परंतु दोनो कृतियों को छूकर सकारात्मक मूल्यों का और सृजनात्मक शैली का अहसास मुझे हो गया।ये दोनो कृतियां लेखक श्री.विश्वास पाटील जी के अथक परिश्रम का यथार्थ भी समझा रही थी जो कल्पना और वास्तव की सीमा रेखा पर सुमधुर शैली के रूप में अपना प्रभाव छोड़ती है।
“दुड़िया” (तेरे जलते हुए मुल्क में ) विश्वास पाटील के इस मराठी उपन्यास को रवि बुले ने हिंदी में अनुवाद किया है जिसको राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।अनुवाद में भी लेखक विश्वास पाटील के शैली का आभास होता है जो अपने आप में किसी नदी की धारा का अनुस्वर के रूप में सुनाई देता हो।परतु और एक बात का रहस्योद्घाटन करना चाहती हूँ कि दुड़िया की कहानी ही इतनी जबरदस्त,शक्तिशाली,बलवान और प्रभावशाली है कि वह भाषा,साहित्यिक मूल्य तथा समीक्षात्मक टिप्पणीयों की सीमा रेखा तथा जीवन – संघर्ष के पार चली जाती है और पाठकों के लिए एक निराला,अद्वितिय जीवन का दर्शन खड़ा कर देती है,उस जगत से बाहर निकल पाना मुश्किल हो जाता है।उपन्यास को पढ़ने के साथ पाठक लेखक के साथ ही दुड़िया की कहानी को फिर से अपने अवचेतन मन में जी लेता है और जीवन के एक नये आयाम को स्पर्श करने का प्रयास करती है ,उन स्थितियों में जहाँ पर मानवता और प्रेम बंदूक की गोली से अपना खून बहता हुआ देखती है।बंदूक की साये में पनपती मानवता को देखकर किसी भी मनुष्य का हृदय दहल सकता है।परंतु आख़िरकार यह भी सत्य ही है कि नियति के हाथों में अगर स्वतंत्रता पड़ती है तो वह संघर्ष की कहानी के रूप में जन्म लेती है।
दुड़िया की कहानी जैसे कितने जंगल अबोध मौन में जी रहें होंगे।मैं भी कवि तथा लेखक होने की नाते मेरा हृदय भी कई बार दुड़िया को पढ़ते समय रूक – रूककर अरण्य रुदन कर रहा था जो अपने आप में मानवी मूल्यों पर पुनर्चिंतन करने के लिए मज़बूर कर देता है।छत्तीसगढ़ के नक्सलवाद का चित्रण इस तरह लेखक करते है उपन्यास का सोंदर्य खिलता भी है और वे प्रतीक कहानी के रस को भी प्रस्फूटित करते है ,उदाहरण के तौर पर इस वाक्य को पढ़िये ,” आसमान में बादल थे।वातावरण में हल्की धुंद थी।पुरे इलाके में दहशत का ऐसा माहौल था कि लगता था,सूरज भी निकलने से पहले जरा ताक-झाँक करता होगा।”
दुड़िया की कहानी के द्वारा हम नक्सलवाद,माओवाद के जन्म की कारण मीमांसा को समझ सकते है तथा लोकतंत्र की विजयगाथा को भी समझ सकते है,इस आत्मचरित्रात्मक उपन्यास में दुड़िया के माध्यम से हम विद्रोह,क्रांति और इस बीच अपनों के खोने का दर्द ,फिर मिलने का आनंद ये सारी भावनाएं एक होकर कहानी को जिवित रखती है।जब लेखक की नियुक्ति छत्तीसगढ़ के नक्सली क्षेत्र में ‘इलेक्शन अॉब्जर्वर’के रूप में ७६ दिनों के लिए हुई तो उनकी मुलाकात दुड़िया से हो गयी,फिर दुड़िया ने अपने नक्सली होने की कहानी तथा समर्पन और फिर से शादी कराके घर बसाने की यात्रा या इस कहानी के द्वारा सामाजिक रुपांतरण तथा पूँजीपतियों के विरोध में या राजतंत्र के अन्याय के विरोध में ,आदिवासीयों के मूल हकों के शोषण के विरोध में आदिवासी अपने गुस्से को जब नक्सलवाद के रूप में भी आदर्श मानने लगते है तो दुड़िया का जन्म होता है।ऐसी स्थिति के कौन जिम्मेवार है इसका उत्तर भी यह उपन्यास देता है कि नक्सल तो हमारा अपना बनाया हुआ जख्म है……..।
दुड़िया की कहानी क्रांति की मशाल भी जलाती है और नक्सलवाद के आड़ंबरो को भी समाज के सामने लाने का प्रयास करती हैं,जिसकी विफलता में खुद नक्सलवाद या माओवाद जो स्वयं ही वासना में लिप्त है तथा उसके नेता वासना से उभर ही नहीं पाये है।यही कारण दुड़िया को क्रांति से विफल बनाकर फिर से जीवन के सामान्य प्रवाह की ओर कदम बढ़ाने पर मज़बूर कर देता है।
यह उपन्यास विश्वास पाटील जी का एक असाधारण उपन्यास है जो हमे नक्सलि दुनिया की सारी सच्चाई बयान करता हैं।हम एक ऐसी व्यवस्था को समझने में सक्षम होते है जो हमारे आदर्शों के साथ – साथ अबूझमाड़ की जंगलों में जन्म लेती है और खून की नदियां बहने के बाद ही हमे समझ में आती हैं। उपन्यास के अंत में लेखक बड़े साहस के साथ एक सत्य कहने से कतराते नहीं है कि इस आँधी से गुजरते हुए मैंने विचित्र नज़ारे देखे थे।राजनीतिक परिवर्तन और उतार -चढ़ावों की पृष्ठभूमि में आज देश के कई राज्यों के लिए नक्सलवाद मानो एक जरूरत बन गया है।नक्सलियों को अपने स्वार्थों के लिए जंगल चाहिए,जबकि राज्य सरकारों को नक्सलिओं के विरूद्ध लड़ाई की मदद में केंद्र सरकार से मदद या ग्रांट के रूप में करोड़ो रूपया हर साल चाहिए।नक्सली अगर अचानक खत्म हो गए तो राज्य सरकारे अपने खाली कटोरे लेकर कहाँ खड़ी रहेंगी और किस मुँह से माँगेंगी ? दुर्भाग्य से यह एक अजीब चक्रव्यूह बन गया है।
यह उपन्सास मराठी,अंग्रेजी,हिन्दी,कन्नड भाषा में पाठको के लिए उपलब्ध हैं।इसे हर एक व्यक्ति ने पढ़ना जरूरी है…….।
मेरा यह विश्वास है की कालजयी उपन्यासों की उनकी परंपरा में यह उपन्यास एक मील का पत्थर साबित होगा ………।
” दुड़िया ” इस उपन्यास को क्यों पढ़ना चाहिए ……? इस प्रश्न के साथ कुछ गंभीर चिंतन यहाँ पर मैंने किया हैं,समीक्षा की दृष्टि या साहित्यिक मूल्य के पार जाकर इस उपन्यास को समझने तथा आंकलन करने की आवश्यकता हैं।यहाँ पर इस उपन्यास की विशेषता कहना चाहूँगी की दुड़िया को पढ़ने के साथ सहज़ ही हमारा मानस अचानक यथार्थ तथा वास्तव के ऐसे जंगल से गुज़रता है जहाँ से सत्य चिख़ ,चिख़कर हमें डराता है कि हमें अपने मनुष्य होने पर शर्मिंदगी पैदा होती है ।ऐसे अनगिणत रहस्य छुपे पड़े इन गहरी जंगलो में ।जितने छत्तीसगढ़ के जंगल,अबूझमाड़ के पर्वत “दुड़िया” के संघर्ष के,शोषण के और मुक्ति के साक्षी है उतना स्वयं लेखक भी साक्षी है।किसी लेखक के लिए सबसे कठिण कार्य यह होता है कि किसी कहानी का हिस्सा भी बन जाए और फिर वह कहानी फिर से अपने मनःपटल पर जीकर उसे शब्दों द्वारा दोहराई जाए और यह जिम्मेवारी उपन्यासकार श्री.पाटील जी ने बख़ुबी निभायी है जो उनके लेखन शैली को सर्वश्रेष्ठ बनाता है ।हम मनुष्य सभ्यता की वह कड़ी है जिसके द्वारा मानवता तो प्रकट होती है परंतु और एक जिम्मेवारी के कारण भी बन जाते है नकारात्मक धारणाएं की जो मानवता को नष्ट करती है …..।इस उपन्यास से हम यह समझने में सक्षम हो जाते है कि भारत में राजनीतिक व्यवस्था के साथ और एक व्यवस्था विकसित हो रही थी जिसके परिणाम हमें लबे अर्से तक भुगतने पड़े है,वह व्यवस्था है नक्सलवाद ,माओवाद। हाल ही में मणिपूर की जो दर्दभरी घटना हुई वह किसी भी सभ्यता के अपराध भाव ,द्वेष या वेदना निर्माण कर सकता है और हमने कौनसी सभ्यता विकसित की जिसका फल हमें स्रीयों पर बलात्कार,उत्पिड़न या उनके वस्र उतारकर उनको नग्न अवस्था में घुमाना तथा रशीया और युक्रेन जैसे युद्ध फिर उसके बाद शांति ।यह कैसे विरोधाभास हैं मानव सभ्यता के। और हर स्थिति में परिणाम स्री को ही भुगतने है क्योंकि युद्ध में भी बच्चे,पति के मत्यु का दुःख आख़िर स्री को भुगतना पड़ता है।इस पृष्ठभूमि में जब मैंने मराठी भाषा के महान उपन्यासकार श्री.विश्वास पाटील का उपन्यास पढ़ा तो मेरे अवचेतन में एक वेदना कौंध उठी तथा सारी रात मैं सो नही पायी क्योंकि इस उपन्यास के द्वारा साहित्य का एक आयाम उभरकर सामने आता गया कि किसी लेखक का कर्तव्य सिर्फ मनोरंजन करना नहीं है अपितु सामाज़िक या समसामायिक समस्याओं को भी यथार्थ की परिभाषा में रचना करना हैं।
उपरोक्त समस्या के उत्तर में उपन्यासकार विश्वास पाटील लिखते है कि हम ही या हमारी राजनीतिक व्यवस्था ही इसके लिए जिम्मेवार है।राजनीतिक व्यवस्थाओं ने मनुष्य का अस्तित्व इतना सस्ता और बाज़ारु बना दिया हैं कि उसकी बोली कोई भी पुंज़ीपति या सत्ता में बैठे नेता लगा सकते है।दुड़िया एक साधारण बच्ची थी और उसने भी सामान्य मनुष्य जैसे ही सपने देखे थे,परंतु वह यौवनावस्था में धार्मिक,सामाज़िक तौर तरिकों की शिकार बन जाती है ज़ब उसे आदिवासी समाज तथा माँ-बाप के द्वारा कहा जाता हैं कि उसे ‘ पोलक ‘ (स्तन ढ़ाकने का कपड़ा)उतारकर रहना होगा क्योंकि यह रिवाज़ शादी के लिए आदिवासीयों में ज़रुरी है तो वह इसका विरोध करती है और कहती है कि मैं बिना शादी की रह लूँगी।उसके मन में क्रांति की चिंग़ारी सुलग जाती है और एक नक्सली बनने की मानसिक प्रक्रिया शुरु हो जाती है।फिर मन में प्रश्न उपस्थित होता है कि कौन है दुड़िया बनने के लिए ज़िम्मेवार …….? इसका अप्रतिम विश्लेषण और चित्रण उपन्यासकार ने “दुड़िया” में किया है………दुड़िया नक्सली बन जाती है परंतु नक्सलवादी नेताओं के व्यवहार और भाषा को जब राजनेताओं जैसा ही अनुभव करती है तो उसका मोहभंग हो जाता है और वह समाज की मुख्य धारा वापस लौटने की कोशीश करती है तथा वह समर्पण करती है परंतु यहां पर भी नियति अपना खेल दिखाने से चूकती नहीं हैं ,इलेक्शन के बाद एक हादसे में उसका पति मर जाता है तो दूसरी ओर उसका बिछड़ा हुआ भाई फिर से उसको मिल जाता है……
“दुड़िया”उपन्यासकार के जीवनी का एक हिस्सा है जो उन्होंने सशक्त कहानी के द्वारा उसकी रचना की है जो एक घटना के बाद दूसरी …..इस तरह कथा प्रवाह जैसे हमारी आँखों के सामने से गुज़रता है और हमारा चेतन मन में अस्वस्थता और वेदना निर्माण करता है और सभ्यता के प्रति या मानवता के प्रति कई सवाल उत्पन्न करता है।सामान्य जीवनी से नक्सलवादी बनना और फिर सामान्य जीवन वापस लौटना यह कोई साधारण यात्रा नहीं थी ? इस यात्रा में दुड़िया को अपनों को खोना पड़ा था।
यह उपन्यास चेतना की धारा या प्रवाह जैसा अनेक घटनाओं में पिरोया हुआ असाधारण क्रमबद्ध चित्रण है जो अपने आप में अद्भूत है।छत्तीसगढ़ के निबिड़ जंगलो में एक नकारात्मक व्यवस्था से,उनकी धारणाओं से रूबरु हो जाते है और बाद में उनकी विफलताओं में एक स्री की अपने अस्तित्व को बचाने की कोशीश पढ़ते समय रौंगटे खड़ी कर देती है।फिर यह उपन्यास पढ़ना हमारी सामाज़िक,नैतिक ज़िम्मेवारी बन जाता है।क्योंकि हम स्वयं को कीतनी भी विकसित सभ्यता मान लेते है परंतु दुड़िया की कहानी फिर कहीं न कही अगर दोहराति है तो यह वेदना जीवन के प्रति जो संवेदना है उसको व्यथित कर देती है।
दुड़िया की कहानी फिर से ना जन्मे इसलिए दुड़िया जैसा उपन्यास हमें आवश्य पढ़ना चाहिए……….।



