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हर रिन्द के पीनेका मखसूश है पैनामा,मिश्ररा पर गुल्जारे अदब

 

Photp Guljare 3-14- Sat.नेपालगन्ज,(बाँके)पवन जायसवाल, १४ गते ।
बाँके जिला के गुल्जारे अदब ने नेपालगन्ज की महेन्द्र पुस्तकालय में  अषाढ १४ गते शनिवार को मासिक गजल गोष्ठीे का आयोजन किया है ।
अदब व्दारा नियमित आयोजित होते आ रहे मासिक गजल गोष्ठी में अवधीे साँस्कृतिक विकास परिषद् बाँके जिला के अध्यक्ष सच्चिदानन्द चौवे के प्रमुख आतिथि थे । ऊर्दू साहित्यकार सयद अशफाक रसूल हाशमी के सभापतित्व में यह सम्पन्न हुई ।
मासिक गजल गोष्ठी के ऊर्दू साहित्यकारों में अदब के अध्यक्ष हाजी अब्दुल लतीफ शौक, मोहम्मद अमीन ख्याली, अदब के सचिव मोहम्मद मुस्तफा अहसन कुरैशी, मोहम्मद यूसुफ आरफी कुरैशी, मेराज अहमद ‘मेराज’, सयद अशफाक रसूल हाशमी, नेपाली साहित्यकारों में प्रगतिशील लेखक संघ बाँके जिला के अध्यक्ष इन्द्र बहादुर बस्नेत, भेरी साहित्य समाज बाँके के अध्यक्ष हरि प्रसाद तिमिल्सेना, अवधी सा“स्कृतिक प्रतिष्ठान के अध्यक्ष विष्णुलाल कुमाल, नेपाल हिन्दी प्रतिष्ठान बाँके के अध्यक्ष श्यामानन्द सिंह लगायत लोगों ने “हर रिन्द के पीने का मखसूश है पैनामा” मिश्ररा पर अपना अपना– शैर वाचन किया ।
कार्यक्रम की संचालन अदब के सचिव मोहम्मद मुस्तफा अहसन कुरैशी ने किया ।
(१) सयद अशफाक रसूल हाशमी (सøयद नेपाली) द्वारा प्रस्तुत…..
मिश्ररा– हर रिन्द के पीनेका मखसूश है पैनामा ।
शाकी तेरी नजरों का  गर्दिश में है पैमाना ।
कांप उठे जमीं सारी हिलने लगा मैखाना ।।
क्या भूल हुई हम से बदले हुयें तेवर है ।
होठों पे शिकायत है अन्दाजे शफीकाना ।।
क्या हुस्ने मुजस्सम है क्या नूर वरसाता है ।
पडती है नजर जिसकी हो जाता है दीवाना ।।
गिरता हूँ संमलता हूँ  है विर्दे जुबां तूही ।
हर शख्स यही कहता दीवाना है दीवाना ।।
पीते है सभी जाहिद क्यू“ शिकवऐ वेशो कम ।
हर रिन्द के पीने का मखसूश है पैमाना ।।
अश्कों में नहा करके मायूस शमा भी है ।
बेगोरो कफन सøयद बेचारा है परवाना ।।
(२) अवधी साहित्यकार सच्चिदानन्द चौवे द्वारा प्रस्तुत…..
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शाकी न जहाँ पर हो, बेकार वो मयखाना
हर रिन्द के पीनें का, मकसूश है पैमाना
पैदा जो जहाँ में हुवा, राजा हो, रंक, फकीर
एकदिन इस दुनियाँ से, सवको है पडे जाना
जलते ही शमाँ के कहीं, आ जाते हैं परवाने
उनका एक मकसद है, जलना फिर मरजाना
हर शक्स इस जहाँ का, होता न एक जैसा
कोई जाहिल होता है, कोई ज्ञानी मौलाना
गुलशन ए महकता है, रंग– रंग के फूलों से
कहीं चिडियाँ चहकती है, भौंरोंका कही गाना
नदियों के कल– कल से, संगीत छलकता है
वन– उपवन– गिरि– निझर, कहते जिन अफसना
हर चीज बदलती यहाँ, आनन्द बदलता नहीं
धन, दौलत, सुत, दारा, सब छोडयही जाना
छ सय नेताओं का, जमघट है संसद में
आइना ए वना, इसका नहीं कोइ ठिकाना ।।

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