Wed. Apr 22nd, 2026
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(पुपरी अनुमंडल का इतिहास) पूर्वकथन, रामबाबू नीरव
इतिहास लिखना बहुत ही कठिन और श्रमसाध्य कार्य है. एक तरह से अंगारों पर चलने जैसा कार्य. यह सर्व विदित है कि सच लिखने पर अपने मित्रों के साथ साथ परिजन भी शत्रु बन जाया करते हैं. फिर भी मेरे जैसे निर्भीक साहित्यकार इस तरह का जोखिम उठाया ही करते हैं. पूर्व में मैं अपने इस महत्वकांक्षी पुस्तक को अपनी आत्मकथा के रूप में लिख रहा था. परन्तु मुझे लगा कि मेरे जीवन की व्यक्तिगत कहानी को आज की युवा पीढ़ी क्यों पढ़ेगी.? अतः मैंने विचार किया कि क्यों न इस पुस्तक को आत्मकथात्मक इतिहास के रूप में लिखा जाए. मेरे मन में ऐसा विचार आते ही कोरोना काल में मैंने इसे लिखना आरंभ किया. मैं जो भी लिखता उसे फेसबुक पर पोस्ट कर देता. उस समय मेरे दिमाग में सिर्फ अपना छोटा सा शहर पुपरी ही था. मेरे कुछ मित्रों ने सुझाव दिया कि आप इसे पुपरी अनुमंडल का इतिहास बना दीजिये. कुछ अति उत्साही मित्रों ने तो यहाँ तक कह दिया कि इसे पूरे सीतामढ़ी जिले का इतिहास बना दिया जाए तो अति उत्तम होगा. परंतु यह मेरे सामर्थ्य से बाहर की बात थी, अतः मैंने सिर्फ पुपरी अनुमंडल तक ही अपने इस इतिहास को सीमित रखा. वैसे सीतामढ़ी जगत जननी माँ जानकी की जन्म स्थली होने के कारण पूरे अन्तर्राष्ट्रीय फलक पर फैला हुआ है. अपने इस इतिहास में मैंने सीतामढ़ी की कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं, महत्वपूर्ण व्यक्तियों, महत्वपूर्ण साहित्यकारों की चर्चा करके अपने मित्रों की भावनाओं को समोचित सम्मान देने का प्रयत्न किया है.
पुपरी अनुमंडल में छ: प्रखण्ड हैं- पुपरी, सुरसंड, बाजपट्टी, चोरौत, नानपुर और बोखड़ा. इन सभी प्रखंडों का अपना अपना गौरवशाली इतिहास रहा है. जहाँ पुपरी के बारे में मान्यता है कि यहाँ की पावन धरती पर जगत जननी माँ जानकी के पावन पांव पड़े थे, इसलिए इस धरती का नाम पांवपड़ी पड़ा जो बाद में पुपड़ी या पुपरी हो गया. इसी तरह सुरसंड का नाम पौराणिक काल के किसी राजा सूरसेन के नाम पर पहले सुरसर फिर सुरसंड पड़ा. मैं समझता हूँ कि मेरी पीढ़ी से कई पीढ़ी पूर्व के लोगों को भी यह जानकारी नहीं रही होगी कि विश्वविख्यात गणितज्ञ भगवान् बोधायन का जन्म बाजपट्टी प्रखण्ड के वनगांव ग्राम में हुआ था. भगवान् बोधायन ने पूरी दुनिया को गणित के ऐसे ऐसे सूत्र दिये थे, जिसे आधार मानकर आज वैज्ञानिक चाँद और सूरज तक पहुँच रहे हैं. भगवान् बोधायन के सूत्रों पर ही पाटलिपुत्र के महान ज्योतिषाचार्य आर्यभट ने यह खोज की थी कि पृथ्वी अपनी धूरी पर घूमती है. यह कितने दुर्भाग्य की बात है कि हम सिर्फ ढ़ोंग और पाखंड में ही उलझे रह गये और अपनी धरती पर उत्पन्न हुए बोधायन जैसे महान गणितज्ञ को भूल गये, जिनके प्रमेय से प्रेरणा लेकर यूनान के महान गणितज्ञ पाईथोगोरस विश्वप्रसिद्ध हो गये.
हमारी पीढ़ी को यह भी पता न होगा कि महाराज जनक के मिथिला राज्य को कर्नाटक से आकर कर्नाट क्षत्रिय कुल के एक महाप्रतापी योद्धा ने पुन: मिथिला राज्य की स्थापना की थी. उनका नाम था महाराज नान्यदेव. उन्होंने अपने नवनिर्मित मिथिला राज्य की राजधानी पुपरी से दक्षिण लगभग 10 किलोमीटर पर अवस्थित नानपुर गाँव में बनाई थी. उन्हीं के नाम पर इस गाँव का नाम नान्यपुर पड़ा, जो बाद में नानपुर नाम से विख्यात हुआ. इसी तरह सुरसंड प्रखण्ड मुख्यालय में एक अति प्राचीन मंदिर है जिसे रानी सती स्वर्ण मंदिर के नाम से जाता है. इस मंदिर का निर्माण सुरसंड स्टेट की एक रानी राजवंशी कुंवर ने करवाया था. लोगों का कहना है कि इस मंदिर के निर्माण के बाद रानी राजवंशी कुंवर ने चार मुख्य कारिगरों के हाथ इसलिए कटवा लिए थे ताकि वे इस तरह का दूसरा मंदिर न बना सकें. बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि इस मंदिर से आज भी आधी रात को पायल की झंकार सुनाई देती है. माना जाता है कि रानी राजवंशी कुंवर की आत्मा इस मंदिर में भटक रही है. इसी तरह चोरौत के नीम बाड़ी में स्थित राम जानकी मंदिर के किसी अत्याचारी महंत के बारे में यह विख्यात है कि वह इतना अत्याचारी और कुकर्मी और ऐय्याश था कि महिलाओं को निर्वस्त्र करके धान की दौनी करवाया करता था. इसी तरह से पुपरी स्थित जैतपुर स्टेट के एक गुमास्ता के व्यभिचार तथा अत्याचार की कहानियाँ भी विख्यात है.
आजादी की लड़ाई में यहाँ के उत्साही नौजवानों एवं बुजुर्गों के साथ साथ माताओं तथा बहनों ने भी बढ़चढ़ कर भाग लिया था. कांग्रेसी स्वतंत्रता सेनानियों के साथ साथ क्रांतिकारियों ने भी अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला दी थी. पुपरी के जांबाज क्रांतिकारी लक्ष्मीनारायण गुप्ता शहीद भगत सिंह और शहीद चन्द्रशेखर आजाद द्वारा स्थापित क्रांतिकारी पार्टी “हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन” के सक्रिय सदस्य थे तथा राष्ट्रीय स्तर पर क्रांतिकारियों द्वारा किये जाने वाले सरकार विरोधी क्रिया कलापों में सम्मिलित हुआ करते थे. बाजपट्टी, मधुरापुर के शहीद रामफल मंडल ने अंग्रेजी हुकूमत के तलवे चाटने वाले कुत्तों को मौत के घाट उतार दिया था. पुपरी की वीरांगना श्रीमती पद्मावती बुबना ने अंग्रेजी हुकूमत के कुत्ते क्रूर दारोगा अर्जुन सिंह को अपने कटार से घायल कर अपनी तथा अपने घर की बहुओं की अस्मत बचाई थी. इस तरह की अनेकों आश्चर्यजनक शौर्य से भरी हुई घटनाएं तथा गरीबों पर ढाए जाने वाले जुल्मों सितम की कहानियाँ इस क्षेत्र के अतीत के गर्भ समाए हुए हैं, जिन्हें मैं उजागर करने का श्रमसाध्य कार्य कर रहा हूँ. इस इतिहास में वर्णित घटनाएँ, कहानियाँ, स्थानों तथा ऐतिहासिक पात्रों के नाम आदि पौराणिक तथा दंत कथाओं से लिए गये हैं. कुछ प्रसंग बड़े बुजुर्गों से सुने गये संस्मरणों एवं समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं में प्रकाशित आलेखों एवं समाचारों पर आधारित हैं. हो सकता है इसमें कुछ अतिशयोक्ति हो या कुछ मनगढंत बातें हो. इसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ. अपने शहर के आधुनिक काल यानि आजादी के बाद के इतिहास में मैंने उन्हीं व्यक्तियों अथवा परिवारों का चित्रण किया है जिनका सामाजिक क्रियाकलापों, स्वतंत्रता संग्राम, साहित्यिक गतिविधियों, कला और रंगमंच में योगदान रहा है. सामाजिक तथा साहित्यिक संगठनों के साथ साथ राजनीतिक दलों की गतिविधियों को भी प्रमुखता से स्थान देने का मैने भरसक प्रयत्न किया है. वाबजूद इसके हो सकता है कुछ घटनाएं, संस्थानों तथा महत्वपूर्ण व्यक्तियों के नाम मेरी जानकारी में न आए हों, तो आपसे करबद्ध प्रार्थना है कि उन घटनाओं तथा व्यक्तियों के नामों से मुझे अवगत अवश्य कराएं ताकि मैं अपनी भूल सुधार सकूँ.
चूंकि‌ इतिहास के साथ साथ यह मेरी आत्मकथा भी है इसलिए इसकी शुरुआत मैं अपनी रामकहानी से ही कर रहा हूँ. प्रथम अध्याय में मैं अपने बचपन के गर्दिश के दिनों का जिक्र करूँगा. जैसे जैसे इतिहास बढ़ता जाएगा वैसे वैसे मेरी आत्मकथा भी आकार लेती जाएगी.
धन्यवाद.
आपका ही स्नेहाकांक्षी –
रामबाबू नीरव

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