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राजर्षी जनक के प्रांगण में एकबार फिर से भारत वर्ष के कवि – ऋषियों के महा सम्मेलन

 

अजयकुमार झा, जलेश्वर ।  राजा जनक और उनके परम ज्ञानी गुरु अष्टावक्र तथा सभ्यता के जननी माता जानकी के पावन भूमि पर आज सितंबर 2023 – 22 को भारत के लगभग 20 राज्य से पचासी ऋषि कवियों का एक वृहद सम्मेलन आरंभ हुआ। त्रि दिवसीय लेखक कवि सम्मेलन
पूर्वोत्तर हिन्दी अकादमी सिलांग, मेघालय के नेतृत्व में “प्रेम एवं सद्भाव” के नारे के साथ जनकपुर धाम स्थित राजदरबार होटल में आरंभ हुआ। जिसमे विचार गोष्ठी, कविता वाचन, भाषा साहित्य पर विश्लेषण तथा प्रेम और सदभाव पर मंतव्य के साथ सम्मान समारोह का वृहद आयोजन किया गया।
तीसरे दिन सांस्कृतिक धरोहर और स्थलों के भ्रमण में कल दिनांक 2080-06-07, रविवार को एक दिवसीय सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक यात्रा पर सुबह नौ बजे मेरे अगुवाई में दोनों बसें और एक कार धनुष धाम के लिए रवाना हुए। वहां पहुंचकर दधीचि ऋषि के अस्थि से निर्मित शिव धनुष के भग्नावशेष का दर्शन किया गया। वहां विद्यमान पुजारी ने धनुष यज्ञ और धनुष क्षत्र से संबंधित अनेक कहानियां और किंबदंती सुनाए। वैज्ञानिकों द्वारा किया गया परीक्षण और धनुष के आकार में हो रहे वृद्धि के रहस्य के संबंध में बताया गया। वहां पर्यटक साहित्यकारों संयोजक डा अकेला भाई ने पी एच डी के लिए नए नए विषयों हेतु युवा साहित्यकारों को अभिप्रेरित किया।
वहां से जलेश्वर के मेयर श्री सुरेश साह सोनार जी के विशेष आमंत्रण में दोपहर 12 बजे जलेश्वर नाथ के दर्शन को आए सभी साहित्यकारों का जलेश्वर नाथ मंदिर में मेयर सुरेश साह सोनार जी ने भव्य स्वागत एवं सम्मान का कार्यक्रम रखा। जिसमे सभी अतिथियों को माला, राम नाम अंकित अंगवस्त्र, चाय, पानी से स्वागत किया गया। इसके अलावा जलेश्वर नाथ महादेव मंदिर एवं अन्य रमणीय एवं पर्यटन स्थलों को स्मृति चिन्ह के रूप में आमंत्रित साहित्यकारों में वरिष्ठ 15 साहित्यकारों डॉ. अकेला भाई, प्रो. अश्विनी कुमार शुक्ल, डॉ. उषा लाल, डॉ. रघुनाथ पांडे, प्रो. सुरेश माहेश्वरी, डॉ. मदन मोहन शंखधर, प्रो. पंकज शर्मा, डॉ. राजकुमार भारती, डॉ. मीना कुमारी परिहार, डॉ. अरुणा उपाध्याय, प्रो. विजय बागड़ी, डॉ. भोला प्रसाद आग्नेय, श्रीमती अंजना सबी, डॉ. दविंदर कौर, प्रो. श्री रत्नचंद्र निर्झरी आदि वरिष्ठ साहित्यकारों को अर्पण किया गया।
उक्त मौके पर साहित्यकारों ने जलेश्वर नाथ महादेव के भजन भी प्रस्तुत किये। साहित्यकारों ने एक स्वर से मेयर सुरेश साह सोनार जी को लंबी उम्र और कीर्तिमान स्थापित करने का आशीर्वाद देकर उनके प्रति आभार व्यक्त किया। पत्रकार के साथ संवाद में मराठी, कन्नड़, पंजाबी, भोजपुरी आदि अनेक भाषाओं में लोगों ने अपनी प्रतिक्रियाएं अर्पण किया। जमकर फोटो सेशन हुआ।
कोई एक भौतिक इच्छा के लिए इस मंदिर में महादेव के समक्ष प्रार्थना करने पर अवश्य पूर्ण होता है। ऐसा मेरा विश्वास है, मेरी इस उदगार के बाद वे लोग पुनः जलेश्वर नाथ महादेव के दर्शन करने आऊंगा ऐसा भाव भी लोगों में देखा गया।
समय सीमा का ध्यान रखते हुए मेयर साहब के व्यवथापन में आर एस फैमिली होटल में शुद्ध शाकाहारी किन्तु स्वादिष्ट भोजन से तृप्त होकर साहित्यकारों की गाड़ी मटिहानी की ओर चल पड़ी।
मटिहानी में राजकीय संस्कृत माध्यमिक विद्यालय के आदरणीय प्रधानाध्यापक श्री ईश्वरी पौडेल जी के संचालन में बटुकों द्वारा स्वस्ति वाचन, रुद्राभिषेक एवं रुद्राक्ष माला, त्रिपुंड, मंगलसूत्र, अल्पाहार के साथ-साथ स्वागत भाषण और मटिहानी मठ का ऐतिहासिक परिचय दिया गया। अतिथि लेखिका डा. नीलिमा वर्मा द्वारा संस्कृत में सरस्वती वंदना गाई गई तथा डॉ. अरूणा उपाध्याय जी ने नेपाली हिन्दी में धन्यवाद ज्ञापन किया। अंत में रेखा कुमारी राय ने विदाई गीत प्रस्तुत कर अतिथियों के आंखों को नम कर दीं।
चार बजे लक्ष्मी नारायण मंदिर में प्रवेश हुआ, जहां मेयर श्री हरि मंडल की उपस्थिति में सभी साहित्यकारों को माला और अंगवस्त्र से सम्मानित किया गया और इतने सारे विद्वानों को एक ही स्थान पर स्वागत करना सौभाग्य का द्योतक कहते हुए खुशी जाहिर की।
अतिथि साहित्यकार डॉ अकेला भाई ने खुद को धन्य मानते हुए कहा कि, “जलेश्वर और मटिहानी द्वारा किया गया स्वागत, स्वागत की सीमा से अधिक हो गया और हम निःशब्द हो गए। सामूहिक स्वीकारोक्ति की गई कि हमारे शब्दकोष में कृतज्ञता के लिए इससे बड़ा कोई शब्द नहीं है।” प्रेम और सौहार्द का संदेश लेकर आई आज की मंडली एक ऐसा संदेश लेकर गई जो जीवन भर स्मृति पटल पर नाचता रहेगा।
सभी कलमकारों ने जलेश्वर एवं मटिहानी के दिव्य दृश्यों को शब्दचित्रों के माध्यम से अमर बनाने का सामूहिक संकल्प लिया।
इस भूमि के लिए संभवतः ऐसी विद्वान मण्डली का आगमन प्रथम था। हमारी संस्कृति ही हमारी पहचान है। हमें इस का संरक्षण और संवर्धन करने के लिए विशेष योजना के साथ आगे बढ़ना होगा। हमें अपनी स्थानीय धरोहरों पर गर्व महसूस करना चाहिए। इसकी प्रचार प्रसार में हृदय से सहयोग करना चाहिए। हमें यह कदापि नहीं सोचना चाहिए कि यह काम मेयर और बाबाओं का है। नहीं, यह हम सब का है। हमने सामाजिक संजाल के मार्फत सबको मंदिर में आने के लिए प्रार्थना किया था। जो नहीं आ पाए उनकी मजबूरी रही होगी। लेकिन समारोह ऐतिहासिक रहा। फिर से इतने विद्वानों को बुलाना कब संभव होगा यह कहा नहीं जा सकता।
ज्ञातव्य हो, यह भूमि राजर्षी जनक की है जहां विश्वभर के विद्वानों का सम्मेलन आयोजित किया जाता था, शास्त्रार्थ किए जाते थे, फिर धर्म और राजनीति के द्वंद्व और समस्याओं का सामूहिक समाधान निकाला जाता था। अष्टावक्र जैसे प्रचंड विद्वानों की इस भूमि में ही वह सामर्थ्य है कि एक साथ सयौं विद्वानों, साहित्यकारों, कवियों और ऋषियों को अपनी आँचल में संतुष्ट कर सके। इसी पुण्य घड़ी में अष्टावक्र जनक संहिता के काव्यानुवाद और भावानुवाद मेरी पुस्तक ” अष्टावक्र गीता ” का विमोचन होना मेरे लिए तो सौभाग्य की बात हुई ही,भविष्य में इस मिट्टी के लिए भी विशेष रहेगी।
पुनः मेयर सुरेश साह सोनार, मेयर हरि मंडल एवं प्र.अ. श्री ईश्वरी पौडेल, साथ ही प्रिय संतोष साह, राकेश चौधरी जी, राजा साह जी, रोहित ठाकुर जी, राम प्रसाद चौधरी जी, श्री शोभाकांत जी, बटुकगन आदि को धन्यवाद अर्पण करता हूँ।

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