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ॐ वो मणि है जो कमल पर विराजमान है, ॐ शब्द से परहेज क्यों ?

ॐ शब्द से सरकार क्यों डर रही है ? सनातन की भावनाओं से खिलवाड कब तक ?

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२०६९ साल में सावन २२ गते तत्कालीन माओवाददी शिक्षामंत्री दीनानाथ शर्मा द्वारा मंत्री स्तरीय बैठक द्वारा वर्णविन्यास परिमार्जित करने का निर्णय लिया गया था जिसके विरोध में उस समय अधिवक्ता स्वागत नेपालल और पत्रकार तपेन्द्र कार्की ने सर्वोच्च में रिट दायर किया था । अब सात वर्ष के बाद

नेपाल की शब्दावली से ‘ॐ’ (ओम) शब्द को हटाने की तैयारी हो रही है । इस  विचार पर हिन्दु समाज ने अपनी घोर आपत्ति व्यक्त की है और इस मामले पर सरकार का ध्यान आकर्षित कराया है ।

नेपाल के शब्दकोश से ॐ शब्द हटाने को लेकर यहां बवाल मच गया है। सरकारी निकाय के इस फैसले का ना सिर्फ चौतरफा विरोध हो रहा है, बल्कि इसको लेकर सर्वोच्च अदालत में मुकदमा तक दायर कर दिया गया है।

नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान ने अपने यहां से प्रकाशित होने वाले आधिकारिक नेपाली शब्दकोष से ॐ शब्द को हटाने का फैसला लिया है, जिसका राजनीतिक रूप से व्यापक विरोध हो रहा है। कई राजनीतिक दल के नेताओं ने प्रज्ञा प्रतिष्ठान को चेतावनी देते हुए इस फैसले को वापस लेने की मांग की है। सत्तारूढ नेपाली कांग्रेस की केन्द्रीय समिति की बैठक में ही इस पर आवाज उठाई गई है। कांग्रेस के नेता शंकर भण्डारी ने इस विषय में सरकार से अपना पक्ष रखने की मांग की है।

इसी तरह राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के नेता कमल थापा ने भी ॐ शब्द हटाने को लेकर अपनी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि ॐ सिर्फ एक शब्द या ध्वनि नहीं, बल्कि यह सनातन समाज की पहचान है। इसे हटाना धर्म पर प्रहार करने जैसा है। इसके अलावा अलग-अलग पार्टियों ने भी इसका विरोध किया है। नेपाल के गैर राजनीतिक छात्र संगठन प्राज्ञिक विद्यार्थी परिषद के छात्रों ने नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान के समक्ष विरोध प्रदर्शन किया है। प्रतिष्ठान को अपने फैसले तत्काल वापस लेने की मांग करते हुए ज्ञापन पत्र भी दिया गया है।

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इस बीच काँग्रेस के केन्द्रीय सदस्य शंकर भण्डारी ने कहा है कि नेपाल की डिक्शनरी से ‘ओम’ शब्द हटाया जा रहा है । सरकार को सचेत होने की आवश्यकता है भंडारी ने कहा, “यह बहुत ज़्यादा है।” ये आवाज हमने मौखिक तौर पर रखी है. यदि नहीं तो हम मजबूती से आवाज उठाएंगे।’

भंडारी ने आगामी महासमिति की बैठक में हिंदू राष्ट्र के मुद्दे को एजेंडे के रूप में प्रस्तुत नहीं किए जाने पर चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा कि आगामी महासमिति में यदि हिंदू राष्ट्र का एजेंडा नहीं लाया गया तो मुश्किल होगी ।

इसबीच वकील स्वागत नेपाल द्वारा दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई शुरू कर दी  है । जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने नेपाली शब्दकोष से ॐ  शब्द को हटाने के फैसले के खिलाफ दायर रिट में बार से एमिकस क्यूरी पठाने का अनुरोध किया है। सुप्रीम कोर्ट ने नेपाल बार एसोसिएशन से इसकी व्याख्या के लिए भाषा और कानूनी विशेषज्ञता वाले एक व्यक्ति सहित एक एमिकस क्युरी भेजने को कहा है।

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वकील स्वागत नेपाल और अन्य की ओर से दायर रिट पर सुनवाई करते हुए जस्टिस कुमार चुडाल और विनोद शर्मा की बेंच ने कम से कम तीन एमिकस क्यूरी भेजने को कहा.

एक रिट दाखिल कर कहा गया कि साजिश के तहत विदेशी प्रभाव में नेपाली, भाषा, संस्कृति और परंपरा को खत्म करने के लिए इस शब्द को शब्दकोष से हटाया गया है।

धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से ॐ का बड़ा ही महत्व है। हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख जैसे धर्मों में ॐ या ओम अथवा ओंकार की ध्वनि को पवित्र माना जाता है। ॐ शांति का प्रतीक है। यह शब्द हमारे मन के अंदर है और बाहर भी है। ॐ हिंदू समेत विभिन्न धर्मों का पवित्र चिह्न है। अधिकतर मंत्रों की उत्पत्ति भी ओम से ही हुई। इसमें पूरे ब्रह्मांड का सार निहित है।

जब हम ध्यान लगाते हैं तो मन के अंदर एक ध्वनि सुनाई देती है। यह ध्वनि ॐ की होती है। हम श्वास लेते हैं तो तब भी ओम की ध्वनि निकलती है। इसका सीधा संबंध परमेश्वर से है। ॐ ही ब्रह्म है। ॐ ऐसी ध्वनि है जिसका कभी क्षरण नहीं हो सकता। ॐ तीन अक्षरों से मिलकर बना है, अ, उ और मा कई शास्त्रों में ॐ का महत्व बताया गया है। भागवत गीता में कहा गया है कि जो व्यक्ति ॐ का उच्चारण करते हुए अपने शरीर का त्याग करता है, वह परमगति को प्राप्त होता है। वैसे तो ॐ की उत्पत्ति का वर्णन कहीं नहीं दिया गया है। कुछ मान्यताओं के अनुसार ॐ की उत्पत्ति शिव के मुख से हुई। हालांकि ऋग्वेद और यजुर्वेद से लेकर कई उपनिषदों में ॐ का जिक्र मिलता है।

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यानी ॐ इस ब्रह्मांड में हमेशा से था, है और रहेगा। इसका कभी क्षरण नहीं हो सकता। यह एक नियमित ध्वनि है। इस ब्रह्मांड में जब किसी तरह का शोर नहीं होगा, तब सिर्फ एक ध्वनि सुनाई देगी वो है ॐ । जैन धर्म में अरिंहत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और मुनियों को पंच परमेष्ठी माना गया है। इनके आद्य अक्षरों को मिलाया जाए, तो ॐ की ध्वनि निकलती है। सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानकदेव ने कहा था कि एक ओंकार सतनाम अर्थात् ॐकार ही अटल सत्य है। हमारे द्वारा बोले जाने वाले सभी शब्दों की एक सीमा होती है मगर ॐ की कोई सीमा नहीं होती। यह असीमित होता है। बौद्ध धर्म में ‘ओम मणि पद्मे हुम्’ मंत्र का बड़ा महत्व है। कुछ विद्वानों के मुताबिक इस मंत्र का अर्थ है ॐ वो मणि है जो कमल पर विराजमान है।  डॉ श्वेता दीप्ति



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