संयुक्त राष्ट्र संघ – एक विश्लेषण : अजय कुमार झा
अजयकुमार झा, हिमालिनी अंक नवंबर 023 । अहंकारी, दम्भी, आततायी, घमंडी और षडयंत्रकारी शासकों की क्रूरता और निर्दयतापूर्ण दानवी द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण तथाकथित विजयी परंतु भयकंपित राष्ट्राध्यक्षों ने अपनी भौतिक सुरक्षा और सत्ता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र की स्थापना २४ अक्टूबर १९४५ को किया । इसके मूल संस्थापक और स्थाई सदस्य के रूप में (अमेरिका, चीन, यूके, फ्रांस और रूस) सिर्फ पांच राष्ट्र हंै । उस समय संयुक्त राष्ट्रसंघ के अधिकारपत्र पर ५० देशों ने हस्ताक्षर किया था । वास्तव में द्वितीय विश्वयुद्ध के विजेता देशों ने मिलकर संयुक्त राष्ट्र को अन्तरराष्ट्रीय संघर्ष तथा मामलों में हस्तक्षेप करने तथा अपना वर्चस्व कायम रखने के उद्देश्य से स्थापित किया था । वे चाहते थे कि भविष्य में हमें टक्कर देने की हैसियत रखनेवाला अन्य कोई भी देश न हो पाए । वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र में १९३ राष्ट्र हैं, विश्व के लगभग सारे अन्तरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त राष्ट्र शामिल हैं ।
ध्यान रहे, अंतर्राष्ट्रीय संगठन उन संस्थाओं को कहते हैं जिसके सदस्य, कार्यक्षेत्र तथा उपस्थिति वैश्विक स्तर पर हो । और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवादों को सुलझाने तथा शांति और सुरक्षा स्थापित करने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हो । राष्ट्रसंघ के सुरक्षा परिषद में १५ सदस्य में पाँच स्थायी सदस्य हैं (चीन, फÞ्रांस, रूस, ग्रेट ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका । ) उपरोक्त पाँचों देशो के पास भीटो पावर है । बाकी के दस सदस्य क्षेत्रीय आधार के अनुसार दो साल की अवधि के लिए सामान्य सभा द्वारा चुने जाते हैं । सुरक्षा परिषद का अध्यक्ष हर महीने वर्णमालानुसार बदलता है । संयुक्त राष्ट्र संघ के छह अंग हैंः १. सुरक्षा परिषद् २. अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय ३. महासभा ४. सचिवालय ५. आर्थिक और सामाजिक परिषद् ६. न्याय परिषद् ।
सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की संख्या को बढ़ाने के बारें में बहुत विवाद है । चार विशिष्ट राष्ट्र (ब्राजÞील, भारत, जर्मनी और जापान) जिनको न्द्ध कहा जाता है । जापान और जर्मनी संयुक्त राष्ट्र की अत्यधिक आर्थिक सहायता करते हैं और ब्राजÞील तथा भारत जनसंख्या में बड़े होने के कारण संयुक्त राष्ट्र के विश्व शान्ति के लक्ष्य के लिए सैन्य–दल के सबसे बड़े योगदान करनेवालों में से हैं । फिर भी इन राष्ट्रों को सुरक्षा परिषद में विटो का अधिकार नहीं दिया जा रहा है । यह सीधा अन्याय और षडयंत्र है । आखिर संयुक्त राष्ट्रसंघ के गठन का क्या उद्देश्य माना जाए ? क्या उपरोक्त पांचों राष्ट्र अपनी सत्ता को वैश्विक राजनीति में अक्षुण्ण बनाए रखना चाहते हैं ? वैसे इन पांचों में भी रूस और चीन को नजरंदाज ही किया जाता रहा है । इसका मतलब साफ है कि अंग्रेज आज भी विश्व को अपना गुलाम बनाने में सफल है ।
ध्यातव्य हो ! अमेरिका की जनसंख्याः ३०.५ करोड़, फ्रांस की ६.५१, रूस की १४.६७ यू के की लगभग ः ६.१७ करोड़ चीन की आबादी लगभग एक (१.४०) अरब चालीस करोड़ है । इसके इतर देशों की आबादी को जोड़ा जाए तो लोकतंत्र का भीषण उपहास नजर आएगा । अगर इसे और अनदेखा किया गया तो संयुक्त राष्ट्र की भी विश्वसनीयता धीरे–धीरे कम होती चली जाएगी । जयशंकर ने कहा था कि भारत दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला देश और पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है । ऐसे में अगर भारत को ही यूएनएससी की स्थाई सदस्यता नहीं दी जाएगी तो संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता पर सवाल उठेंगे ही ।
विश्व के राजनीतिक क्षितिज पर २० वीं शताब्दी में तीन ऐसी घटनाएं हैं जिसके कारण अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक प्रणाली में ही भूचाल आ गया । पहली घटना प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद (१९१९), दूसरा अवसर द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद (१९४५) तथा तीसरा अवसर सोवियत संघ के विघटन के बाद १९९ । इनके परिणाम स्वरूप विश्व शक्ति सन्तुलन में बुनियादी परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगा । विश्वव्यापी राजनीतिक परिवर्तनों की तीव्रता एवं स्वरूप, समय एवं परिस्थितियों के साथ परिवर्तित होते रहते है । इन परिवर्तनों का स्वरूप सीमित तथा तीव्रता न्यून होने के बावजूद कभी कभी यह इतनी क्रांतिकारी होती है कि तत्कालीन विश्व व्यवस्था एवं आधारभूत मान्यताओं को ही बदल देती है ।
द्वितीय विश्व युद्धोपरांत की अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में अनेक वैचारिक एवं विरोधी प्रवृत्तियाँ एक साथ क्रियाशील हुई और विश्व दो परस्पर विरोधी खेमों में विभाजित हो गया । शस्त्र–प्रतियोगिता, विश्व के विभिन्न भागों पर वर्चस्व स्थापित करने की प्रतिस्पर्धा और संयुक्त राष्ट्रसंघ की उपेक्षा इस व्यवस्था के स्थाई अंग बन गए । शीत युद्ध की राजनीति ने विश्व राजनीति को इस तरह प्रभावित किया कि विश्व राजनीति का स्वरूप लगभग एक पक्षीय होकर रह गया तथा सम्पूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति वाशिंगटन और मास्को के इर्द गिर्द केन्द्रित हो गई ।
द्वितीय महायुद्ध ने यूरोपीय शक्तियों की क्षमता का अत्यधिक ह्रास कर दिया और इटली, जर्मनी, जापान (धुरी राष्ट्रों) की पराजय हुई । जर्मनी दो राज्यों में विभक्त हो चुका था और इटली के उपनिवेश उससे छीन लिए गए थे । ब्रिटेन और फ्रांस विजयी राष्ट्र होते हुए भी आर्थिक दृष्टि से अत्यधिक दुर्बल हो गए थे । वे स्वयं अपने आर्थिक पुनर्निर्माण एवं औधोगिक विकास के लिए अमरीकी सहायता पर निर्भर करते थे । उनके उपनिवेशों में, राष्ट्रीय आन्दोलनों के कारण, स्वतन्त्रता की लहर व्याप्त थी । युद्ध के बाद वे एक के बाद एक स्वतन्त्र होने लगे थे । उपनिवेशवाद के पतन की प्रक्रिया से यूरोपीय शक्तियाँ राजनीतिक दृष्टि से कमजोर होने लगी और वे अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं थीं । यूरोप में शक्ति शून्यता की स्थिति पैदा हो गई थी । यहाँ साम्यवाद के प्रसार की संभावनाएं बढ़ गई । जिसके परिणाम स्वरूप संयुक्त राज्य अमरीका और पूर्व सोवियत संघ अपनी सर्वोच्च स्थिति बनाने की होड़ में शीत युद्ध के अभूतपूर्व द्वंद्व में फंस गए । शीत युद्ध के कारण विश्व में हथियारों, न केवल पारम्परिक हथियारों अपितु परमाणु हथियारों के लिए भी बड़े पैमाने पर होड़ प्रारम्भ हुई । पूरब–पश्चिम के संघर्ष में विचारधारा की भूमिका अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हो गई । शीत युद्ध के समय छोटे–छोटे राज्यों के बीच अनेक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष युद्ध हुए । जैसा कि, भारत–पाकिस्तान तथा ईरान–इराक के युद्ध, इनमें से कुछ युद्धों, जैसे उत्तर कोरिया व दक्षिण कोरिया के बीच का संघर्ष, मिश्र के खिलाफ ब्रिटेन और फ्रांस का संयुक्त आक्रमण, भारत पर चीन का आक्रमण विश्व शांति के लिए खतरा बन गए । अनेक अवांछित हस्तक्षेपों तथा महाशक्तियों की संचालित कार्यवाईयों, जैसे हंगरी, चेकोस्लोवाकिया तथा अफगानिस्तान में सोवियत संघ का हस्तक्षेप, वियतनाम युद्ध, क्यूबाई संकट, हेती, इराक, आदि में अमरीका के सक्रिय हस्तक्षेप से विश्व, विनाश की स्थिति में पहुँच गया । इन सभी कारणों से अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के स्वरूप एवं सन्दर्भ में व्यापक परिवर्तन हुए ।
साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद के अन्त का अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पर जो गहरा प्रभाव पड़ा उसके कारण यूरोप अब अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का केन्द्र नहीं रहा, शक्ति संघर्ष तथा सत्ता का केन्द्र एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमरीका की ओर बढ़ गाय । इधर नयी महाशक्ति के रूप में भारत और चीन का उदय होता दिखाई देने लगा । द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के साथ ही साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के पतन की प्रक्रिया ने ’तृतीय विश्व’ को जन्म दिया । तृतीय विश्व का आशय एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी राष्ट्रों से लगाया जाता है । ये राष्ट्र विकासशील और अविकसित राष्ट्रों की श्रेणी में आते हैं, जो सदियों तक उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के अधीन थे और जो अब अपनी गरीबी और पिछड़ेपन से उबरकर आधुनिकता एवं सम्पन्नता की ओर बढ़ना चाहते है । आज तृतीय विश्व के नवोदित राष्ट्र अविकसित और छोटे होने के बावजूद अपनी संख्यात्मक शक्ति के कारण राष्ट्र संघ में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निर्वहन करते हैं ।
संयुक्त राष्ट्र का मंच महाशक्तियों की राजनीति का अखाड़ा बन गया और इसे शीत युद्ध के वातावरण में राजनीतिक प्रचार का साधन बना दिया गया । इसका परिणाम यह हुआ कि इसके अस्तित्व को ही संकट उत्पन्न हो गया । निःशस्त्रीकरण के मार्ग में
निःशस्त्रीकरण की योजनाएं धूमिल हो गयीं । संसार के प्रत्येक राष्ट्र ने हथियारों की दौड़ में शामिल होकर समूची अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था को ही हथियारों, प्रक्षेपास्त्रों, बमों से लैस कर दिया । सेनाओं को आधुनिकतम हथियार उपलब्ध कराये गये । सभी राष्ट्रों ने सैनिक व्यय में भारी वृद्धि कर दी थी । इसके साथ–साथ दीर्घकाल तक होने वाली अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति शिखर वार्ता, निःशस्त्रीकरण वार्ता भी राजनीति का शिकार होती रही । इससे शीत युद्ध ने इसके मार्ग में अनेक कठिनाईयाँ खड़ी कर दी थी । आणविक परीक्षणों में निरन्तर वृद्धि होते रहने से विश्व शान्ति खतरे में पड़ गई । यू एन ओ असफलता की ओर बढ़ने लगा ।
सुरक्षा परिषद् जैसी संस्था, जिसके कन्धों पर अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा स्थापित करने का त्वरित निर्णय लेने का भार था सोवियत संघ और अमरीका के संघर्ष का अखाड़ा बन गयी । इसमें महाशक्तियाँ अपने परस्पर विरोधी स्वार्थ के कारण विभिन्न शान्ति प्रस्तावों को वीटो द्वारा बेहिचक रद्द करती रहती थी, वस्तुतः यहाँ इतना अधिक विरोध और वीटो का प्रयोग दिखायी देता था कि इसे संयुक्त राष्ट्र संघ के स्थान पर विभक्त और विरोधी दलों में बंटा हुआ राष्ट्र संघ कहना अधिक उपयुक्त है । फिर भी
विश्व–शान्ति को बनाये रखने के लिए सुरक्षा परिषद् तथा महासभा ने निम्नलिखित प्रमुख अन्तर्राष्ट्रीय विवादों का समाधान करने में एक बड़ी सीमा तक सफलता प्राप्त की है – १. रूस–ईरान विवाद (१९४६ ई०) – संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रयासों से ईरान के अजरबैजान क्षेत्र में सोवियत संघ की सेनाओं के द्वारा प्रवेश करने की समस्या को दोनों देशों में सीधी वार्ता कराकर २१ मई, १९४६ तक रूसी सेनाओं से ईरानी प्रदेश को खाली करा दिया गया । २. यूनान विवाद (१९४६–४७ ई०) – ३ दिसम्बर, १९४६ को यूनान ने संयुक्त राष्ट्र संघ से शिकायत की कि उनकी सीमाओं पर साम्यवादी राज्य आक्रामक कार्यवाहियाँ कर रहे हैं । संयुक्त राष्ट्र ने यूनान तथा साम्यवादी राज्यों में समझौता कराकर इस विवाद को सुलझाने में सफलता प्राप्त की । ३. हॉलैण्ड–इण्डोनेशिया विवाद (१९४७–४८ ई०) – द्वितीय विश्व युद्ध के उपरान्त १९४७ ई० में हॉलैण्ड तथा इण्डोनेशिया के मध्य युद्ध छिड़ गया । २० जुलाई, १९४७ को ऑस्ट्रेलिया तथा भारत ने इस मामले को सुरक्षा परिषद् में उठाया । समिति के प्रयत्नों के फलस्वरूप १७ जनवरी, १९४८ को दोनों पक्षों में एक अस्थायी समझौता हो गया । ४. बर्लिन का घेरा (१९४८ ई०) – २३ सितम्बर, १९४८ को मित्र–राष्ट्रों ने रूस के द्वारा बर्लिन की घेरेबन्दी का मामला सुरक्षा परिषद् में उठाया । परिणामस्वरूप ४ मई, १९४९ के एक समझौते के द्वारा रूस ने १२ मई, १९४९ को बर्लिन की घेराबन्दी समाप्त कर दी । ५. फिलिस्तीन की समस्या (१९४८ ई०) – संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रयासों से १३ सितम्बर, १९९३ को फिलिस्तीन को सीमित स्वतन्त्रता प्रदान करने वाले एक समझौते पर यासिर अराफात और इजराइली प्रधानमन्त्री रॉबिन ने हस्ताक्षर कर दिये । २५ जुलाई, १९९४ को जॉर्डन के शाह हुसैन और रॉबिन ने एक समझौते पर हस्ताक्षर करके अपनी शत्रुता का अन्तं कर दिया । ६. सीरिया और लेबनान की समस्या (१९४६ ई०) – ४ फरवरी, १९४६ को सीरिया और लेबनान ने अपने प्रदेश से फ्रांसीसी सेनाओं को हटाने की माँग की । सुरक्षा परिषद् में विश्व जनमत के दबाव को देखते हुए ब्रिटेन और फ्रांस ने सीरिया तथा लेबनान से अपनी सेनाएँ वापस बुला लीं । इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र इस समस्या को हल करने में सफल रहा । ७. स्पेन की समस्या (१९४६ ई०) – १९४६ ई० में पोलैण्ड ने सुरक्षा परिषद् से यह शिकायत की कि स्पेन में फ्रांको के तानाशाही शासन के कारण अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति को खतरा हो सकता है । संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने इस सम्बन्ध में यह सिफारिश की कि फ्रांको की सरकार को संयुक्त राष्ट्र और उसकी सहायक संस्थाओं की सदस्यता से वंचित कर दिया जाए, किन्तु बाद में यह सिफारिश रद्द कर दी गयी और १९५५ ई० में स्पेन को संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता भी प्रदान कर दी गयी । ८. कोरिया की समस्या (१९५०–५१ ई०) – द्वितीय विश्व युद्ध के उपरान्त कोरिया; उत्तरी कोरिया और दक्षिणी कोरिया के मध्य विभक्त हो गया था । महाशक्तियों के आपसी मतभेदों के फलस्वरूप १९५० ई० में उत्तरी कोरिया ने दक्षिणी कोरिया पर भीषण आक्रमण कर दिया ।
सुरक्षा परिषद् ने उत्तरी कोरिया को आक्रमणकारी घोषित कर दिया । जुलाई, १९५१ ई० में दोनों पक्षों में समझौता हो गया और युद्ध भी बन्द हो गया । यह संयुक्त राष्ट्र की एक उल्लेखनीय सफलती थी, क्योंकि उसी के प्रयासों के कारण ही कोरिया युद्ध विश्व युद्ध का रूप धारण नहीं कर सका था । ९. कश्मीर समस्या – पाकिस्तान ने २२ अक्टूबर, १९४७ को उत्तर–पश्चिमी सीमा प्रान्त के कबाइलियों द्वारा कश्मीर पर आक्रमण करा दिया । १ जनवरी, १९४८ को भारत ने सुरक्षा परिषद् से इस विषय में शिकायत की । १७ जनवरी, १९४८ को सुरक्षा परिषद् ने दोनों पक्षों को युद्ध बन्द करने का आदेश दिया, परन्तु युद्ध समाप्त नहीं हुआ । समस्या के समाधान के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा गठित आयोग ने दोनों पक्षों से बातचीत की । पर्याप्त विचार–विमर्श के बाद दोनों पक्षों ने १ जनवरी, १९४९ को युद्ध–विराम मान लिया । १०. स्वेज नहर की समस्या (१९५६ ई०) – २६ जुलाई, १९५६ को कर्नल नासिर द्वारा स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर मिस्र में स्वेज नहर कम्पनी’ की सम्पत्ति को जब्त कर लिया गया । परंतु ब्रिटेन और फ्रांस के आग्रह पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने २२ राष्ट्रों का एक सम्मेलन आयोजित किया । १५ नवम्बर, १९५६ को संयुक्त राष्ट्र की सेना की एक टुकड़ी कर्नल नासिर की अनुमति से मिस्र पहुँच गयी । अप्रैल, १९५७ ई० में स्वेज नहर पुनः जहाजों के आवागमन के लिए खोल दी गयी । ११. कांगो की समस्या (१९६० ई०) कांगो की भीषण समस्या को भी हल करने में संयुक्त राष्ट्र संघ को सफलता प्राप्त हुई । परन्तु आज भी कांगो की समस्या पूरी तरह सुलझ नहीं पायी है । १२. साइप्रस की समस्या (१९६४ ई०) – १६ अगस्त, १९६० को साइप्रस ब्रिटिश अधीनता से मुक्त होकर एक स्वतन्त्र गणराज्य बन गया । तत्पश्चात् साइप्रस में उत्पन्न गृहयुद्ध की समस्या को समाप्त करने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा वहाँ शान्ति सेना भेजी गयी व सेना द्वारा वहाँ शान्ति स्थापित की गयी । १३. डोमिनिकन गणराज्य विवाद (१९६५ ई०) – १९६४ ई० के अन्त में वेस्टइण्डीज के हेटी टापू के एक भाग में स्थित डोमिनिकन गणराज्य में गृहयुद्ध छिड़ गया । संयुक्त राष्ट्र संघ और अमेरिकी राज्यों के प्रयत्नों के कारण दोनों पक्षों में एक समझौते के बाद वहाँ शान्ति स्थापित हो गयी । १४. अरब–इजराइल युद्ध (१९६७ ई०) – ७ जून, १९६७ को सुरक्षा परिषद् ने एक प्रस्ताव पारित करके अरबों तथा इजराइल को तत्काल ही युद्ध बन्द करने का आदेश दिया ।
फलस्वरूप ८ जून, १९६७ को दोनों पक्षों ने युद्ध बन्द कर दिया । १५. अरब–इजराइल युद्ध (१९७३ ई.) – अक्टूबर, १९७३ ई० में अरब–इजराईल के बीच पुनः युद्ध प्रारम्भ हो गया । लेकिन महाशक्तियों की स्वार्थप्रियता के कारण तत्काल ही सुरक्षा परिषद् ने इस युद्ध को रोकने की कोई कार्यवाही नहीं की । जब युद्ध उग्र रूप धारण करने लगा तब संयुक्त राष्ट्र संघ के हस्तक्षेप से ११ नवम्बर, १९७३ को इजÞराइल तथा मिस्र के मध्य एक छः सूत्रीय समझौता हो गया । १६. वियतनाम की समस्या (१९७४ ई०) – १९६४ ई० में अमेरिका ने वियतनाम संघर्ष में खुलकर हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया । महाशक्तियों की स्वार्थप्रियता के कारण उत्तरी और दक्षिणी वियतनाम के मध्य संघर्ष १९७४ ई० तक चलता रहा । विश्व जनमत के दबाव के कारण अमेरिका को वियतनाम से अपनी सेनाएँ हटानी पड़ीं और अन्ततः उत्तरी तथा दक्षिणी वियतनाम का एकीकरण हो गया । १७. दक्षिणी रोडेशिया की समस्या (१९८० ई०) – संयुक्त राष्ट्र संघ के दबाव के फलस्वरूप १७ अप्रैल, १९८० को भीषण छापामार युद्ध के पश्चात् रोडेशिया को स्वाधीनता प्राप्त हो गयी और ‘जिम्बाब्वे’ के नाम से उसे संघ की सदस्यता भी दे दी गयी । १८. अमेरिकी बन्धकों की समस्या – ४ नवम्बर, १९७९ को ईरान की राजधानी तेहरान में स्थित अमेरिकी दूतावास की घेराबन्दी करके कुछ कट्टर इस्लामी छात्रों ने ५२ अमेरिकी राजनयिकों को बन्दी बना लिया । संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रयासों से अमेरिकी बन्धकों को मुक्ति मिल सकी । १९. फाकलैण्ड की समस्या (१९८२ ई०) – १२ अप्रैल, १९८२ को अर्जेण्टाइना की सेनाओं ने अचानक ही फाकलैण्ड द्वीपसमूह पर आक्रमण करके उस पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया । संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रयासों से १४ जून, १९८४ को अर्जेण्टाइना की सेनाओं ने आत्मसमर्पण कर दिया और फाकलैण्ड पर पुनः ब्रिटेन का प्रभुत्व स्थापित हो गया । २०. ईरान–इराक युद्ध (१९८८ ई०) – सीमा विवाद को लेकर २२ सितम्बर, १९८० को ईरान व इराक के मध्य उत्पन्न युद्ध संयुक्त राष्ट्र द्वारा मध्यस्थता करने पर अगस्त, १९८८ ई० में समाप्त हुआ । २१. नामीबिया की समस्या (१९९० ई०) – नामीबिया एक लम्बे समय से अपनी स्वतन्त्रता के लिए प्रयत्नशील था । संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्त्वावधान में १३ दिसम्बर, १९८८ को कांगो की राजधानी ब्रांजविले में दक्षिण अफ्रीका, क्यूबा और अंगोला के प्रतिनिधियों ने समझौते पर हस्ताक्षर किये । इस समझौते के बाद २१ मार्च, १९९० को नामीबिया एक स्वतन्त्र राष्ट्र बन गया । २२. कुवैत की समस्या (खाड़ी युद्ध १९९१ ई०) – इराक ने अपनी साम्राज्यवादी लिप्सा की पूर्ति के लिए अपने पड़ोसी देश कुवैत पर अधिकार कर लिया । सुरक्षा परिषद् के आदेश से संयुक्त राज्य अमेरिका व मित्र–राष्ट्रों की सेना ने खाड़ी युद्ध में इराक को नतमस्तक करके कुवैत को मुक्त कराया । २३. यूगोस्लाविया की समस्या (१९९२ ई०) १९९२ ई० में यूगोस्लाविया में भीषण जातीय संघर्ष छिड़ गया, जिसमें बीस हजार से अधिक लोग मारे गये । संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्त्वावधान में भारत के लेफ्टीनेण्ट जनरल सतीश नाम्बियार के नेतृत्व में २५ हजार सैनिकों की एक सेना यूगोस्लाविया में शान्ति स्थापना हेतु भेजी गयी । इस सेना ने यूगोस्लाविया (वर्तमान बोसनिया) में शान्ति की स्थापना की । २४. सोमालिया की समस्या (१९९३ ई०) – १९९१ ई० को राष्ट्रपति मोहम्मद सैयद की पदच्युति के बाद गृहयुद्ध और अधिक तेज हो गया । संयुक्त राष्ट्र संघ ने १९९२ ई० में अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति सेना की सहायता से सोमालिया में शान्ति स्थापित करने में सफलता प्राप्त की । उपर्य‘क्त विवेचन से स्पष्ट है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व के अनेक राष्ट्रों की गम्भीर समस्याओं को शान्तिपूर्ण ढंग से सुलझाने में सफलता प्राप्त की है । यदि इस सम्बन्ध में संयुक्त राष्ट्र संघ की सकारात्मक भूमिका नहीं होती तो तीसरे विश्व युद्ध की सम्भावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता था ।
संयुक्त राष्ट्र संघ की विफलताएँ । आधुनिक अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की कुछ जटिल समस्याएँ ऐसी भी हैं जिनका समाधान करने में संयुक्त राष्ट्र संघ विफल रहा है; जैसे कम्पूचिया की समस्या । रूस का चेचेन्या पर आक्रमण (१९९६ ई०) । खाड़ी क्षेत्र की समस्या (दिसम्बर, १९९६ ई०) । अफगानिस्तान में गृहयुद्ध (अक्टूबर, १९९६ ई०) । कोसोवो की समस्या (१९९९ ई०) जिसमें ल्ब्त्इ संगठन के देशों ने अमेरिका तथा ब्रिटेन के नेतृत्व में कोसोवो पर सैनिक हमला किया । इराक के सैनिक ठिकानों की खोज का कार्यक्रम (१९९८ ई०), जहाँ रासायनिक अस्त्रों के भण्डार को छुपाया गया था । कुछ स्थानों की तलाशी न दिये जाने के कारण अमेरिका ने इराक पर (१९९९ ई०) सैनिक आक्रमण कर दिया । पाकिस्तान (जून, १९९९ ई०) द्वारा भारतीय सीमा पर अन्तर्राष्ट्रीय नियन्त्रण रेखा का उल्लंघन कर भाड़े के घुसपैठियों द्वारा कारगिल क्षेत्र में युद्ध जैसी कार्यवाही करना । १९९९ ई० में उत्पन्न पूर्वी तिमोर की समस्या । अफगानिस्तान में आतंकवाद की समस्या (२००१ ई०), इजराइल–फिलिस्तीन संघर्ष (मार्च २००२ ई०) तथा अमेरिका द्वारा इराक पर आक्रमण (मार्च २००३ ई०), रूस का चेचेन्या में हस्तक्षेप (दिसम्बर २००४ ई०), इराक में आतंकी विस्फोट (अप्रैल २००५ई०), रूस व जापान के बीच द्वीपों का विवाद (जनवरी २००६ ई०), ईराने की परमाणु नीति (मार्च २००६ ई०) । श्रीलंका में लंबे समय से चले आ रहे जातीय संघर्ष को रोकने में विफल रहे हैं । पश्चिम एशिया में पेलेस्टाइन और इजराइल के बीच सीमा समझौता करा कर शांति स्थापित करने में विफल । अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद को रोकने में असफल रहे । इराक के निःशस्त्रीकरण की समस्या सुलझाने में विफल । इराक पर अमेरिकी आक्रमण को रोकने में विफल । कश्मीर के प्रश्न पर भारत व पाकिस्तान के बीच अभी तक अंतिम समझौता संभव नहीं हो सका है । उपर्य‘क्त विवेचन से स्पष्ट है कि अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा को बनाये रखने में संयुक्त राष्ट्र को एक आदर्श संस्था के रूप में स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि इस संस्था में महाशक्तियों के प्रभुत्व का बोलबाला है । कुछ विद्वानों ने तो यहाँ तक टिप्पणी की है कि संयुक्त राष्ट्र संघ को अमेरिका ने खरीद लिया है । आधुनिक अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में संयुक्त राष्ट्र संघ की अपेक्षा विश्व राजनीति पर अमेरिका का प्रभुत्व स्थापित हो गया है । अतः संघ के आंतरिक परंतु विवादित संरचना में अविलंब परिवर्तन की आवश्यकता है । लोकतांत्रिक संस्कार के वैश्विक प्रतिनिधि के प्रतीक दिखने की आवश्यकता है । अन्यथा भारत जैसे कुछ राष्ट्रों के निकल जाने से ही इसकी हैसियत शून्य हो जाएगी । एक दंतहीन बूढ़े शेर के रूप में कराहते नजर आएगा ।

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