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आजय कुमार झा, हिमालिनी ,अंक मार्च 2024-नेपाल में संघीय प्रणाली किसी राजनीतिक दल के नेतृत्व और सैद्धांतिक प्रतिबद्धता के कारण नहीं आया है । जब अंतरिम संविधान बना तब भी संघीयता को स्वीकार नहीं किया गया था । आदिवासियों ने मंदिर में संविधान जलाया जिसके दो चार दिन बाद उस समय के एनजीओ मधेसी जन अधिकार फोरम के आह्वान में आंदोलन ने तीव्रता ले लिया । उस समय मधेश में मधेसियों के अधिकार के लिए पदीय आकर्षण के कारण अनेक टुकड़ों मे बटी नेपाल सद्भावना पार्टी थी । मधेश में तमाम जनसंगठनों और गैरसरकारी संगठनों के साथ आंदोलन ने आंधी का रूप ले लिया । लोग शहीद होने लगे । समग्र मधेस मे अग्नि प्रज्ज्वलन, चक्काजाम, अनेकानेक रूपों मे प्रदर्शन, बाल, वृद्ध, युवा, महिला, संत, महंत, साधु, सन्यासी आदि सभी दिलों जान से स्वतःस्फूर्त सहभागिता दर्ज कराने लगे । उसके बाद सामंती मानसिकता से पीडि़त राजनीतिक दल अंतरिम संविधान में संशोधन कर अनुच्छेद १३८ में संघवाद में जाने और प्रांतीय सरकार बनाने के लिए बाध्य हुए । जिसतरह विदेशी शक्ति के दबाव में ८८ प्रतिशत जनता हिन्दू होते हुए भी देश को धर्मनिरपेक्ष धोषित किया गया, उसी तरह देश के बहुसंख्यक जनजाति और मधेसी जनता के कड़े प्रतिकार और दबाव मे संघीय प्रणाली को स्वीकारा गया । साथ ही जो वर्ग इस प्रणाली का विरोध कर रहें हैं, वो वही वर्ग हंै, जिन्हें अपनी जातीय सत्ता लाभ के तुलना में न देश से मतलब है और न नेपाली जनता से ।



नेपाल में संघवाद राजनीतिक सोच और राष्ट्रीय अस्तित्व के लिए नहीं आया है । नेपाल का संघवाद तो मधेश के प्रति ऐतिहासिक अन्याय के प्रति जागरूकता का परिणाम है । वास्तब में यह सिर्फ शासन का मामला नहीं है । जैसे–जैसे नेपाल राज्य का विकास हो रहा था, आर्थिक स्थिति भी धीरे–धीरे बढ़ती जा रही थी, वैसे वैसे मधेश की आर्थिक हैसियत तो बढ़ी, लेकिन प्रशासनिक तथा राजनीतिक हैसियत न्यून होती चली गई । जो देश के बहुसंख्यक जनता के लिए अपमान ही नहीं अस्तित्व पर भी खतरा का सूचक था । वहीं दूसरे वर्ग के लोग सत्ता और पदीय षडयन्त्र के कारण सड़क से सदन और खोला से मंत्रालय मे आसीन होने लगे । राजनीतिक स्थिति और आर्थिक स्थिति के बीच बढ़ते असमानता के मुद्दा ने मधेश आंदोलन को ऊर्जा प्रदान किया । इस मुद्दा ने केवल मधेशी ही नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र संघ को भी सोचने पर मजबूर कर दिया । हमारे जैसे कई लोग इस न्यायसंगत प्रश्न के लिए साथ देने को तैयार हुए । इस असमानता के मुद्दा से न केवल शासक वर्ग के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगा, बल्कि अत्याचार के कई अन्य बातें भी विश्वपटल पर उभरकर सामने आईं ।

यदि मधेश आन्दोलन आगे बढ़ता तो शासक वर्ग हस्तक्षेपकारी भूमिका निभाते और वह नेपाल के आंतरिक सामंजस्य के लिए भीषण खतरा का कारण बन सकता था । इसीलिए तत्कालीन शासकवर्ग (कांग्रेस, एमाले और माओवादी) ने मिलकर विशेष योजना के तहत उक्त स्वतःस्फूर्त ऐतिहासिक मधेस आंदोलन को कमजोर करने के लिए समझौता का नाटक मंचन करना आरंभ किया । और मकड़जाल में पदलोलुप मधेसी नेता लोग फसते चले गए । गंभीरता और स्पष्ट रूप में कहा जाए तो हम कह सकते हंै कि, “मधेसियों को पहाडि़यों ने नहीं लूटा है; स्वयं मधेसियों ने लूटा है और ठगा भी है और यही कारण है कि आज आम मधेसी जनता मधेसी नेताओं के साथ नहीं हैं । वास्तव मे देखा जाए तो वर्तमान मे मधेसी जनता किसी के साथ नहीं है । मधेसियों की भावना को समझने की सामर्थ्य न किसी पार्टी के सिद्धांत मे है; न नेतृत्व वर्ग मे ही ।

अब भी नेपाल के नेताओं की केंद्रीकृत मानसिकता नहीं बदली है । काठमांडू के शासकों, पुलिस और प्रशासन की केंद्रीकृत मानसिकता वैसी ही है । इसलिए, काठमांडू–केंद्रित विषयों का हमेशा अभ्यास किया जाता रहा है । मुख्य बाधा भी तो यही है । नेपाल की राजनीतिक व्यवस्था बदल गई है । प्रशासनिक ढाँचा बदल गया है । एकात्मक संरचना की स्थिति संघीय ढांचे में चली गई । सरकार की केंद्रीकृत प्रणाली संघीय सरकार प्रणाली में चली गई । लेकिन हमारा स्टाफ नहीं बदला । नेता की कार्यशैली, सोच और व्यवहार नहीं बदला । सेना, पुलिस, अदालतें और नौकरशाही नहीं बदली । हमने बदलाहट नहीं की । हम पंचायतों और बहुदलीय व्यवस्था की विरासत लेकर चलने वाली केंद्रीकृत शासन प्रणाली की आदी नौकरशाही की मानसिकता को नहीं तोड़ पाए हैं । दूसरे शब्दों में, हमने ऐसे कर्मचारी तैयार नहीं किए जो संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य के अनुसार काम कर सकें । वास्तव मे यह सब हम चाहते ही नहीं थे ।

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जब संविधान बनाया गया, तो सामान्य अधिकारों की कई सूचियाँ तैयार की गईं, जिससे संघवाद लागू होने पर विवाद पैदा हो गया । वास्तव मे यह संघीय प्रणाली को असफल बनाने के लिए सत्ताधारियों के द्वारा योजनाबद्ध रूप में आपसी सहमति के आधार पर किया गया था । क्योंकि इतनी छोटी–छोटी गलतियाँ तो स्कूली बच्चे भी नहीं करते हैं । एकल अधिकारों की सूची को थोड़ा और व्यवस्थित करने से संघवाद का कार्यान्वयन आसान हो सकता था । शिक्षा, संघ कितना लेगा, प्रांत कितना लेगा, स्थानीय स्तर कितना लेगा और स्वास्थ्य, उद्योग और विकास का काम कौन करेगा ? बस इतनी बातों को समझने की क्षमता यदि हमारे नेता और प्रशासक में नहीं है तो यह प्रश्न उठना नाजायज नहीं होगा, कि क्या वह उस पद के लायक थे ? दोनों प्रकार से परंपरावादी सत्ताधारी वर्ग नेपाली जनता के हित मे निर्णय लेते नहीं दिखते हैं । अतः इन्हें अदूरदर्शी तथा असक्षम नागरिक के श्रेणी मे रखा जाना चाहिए । ऐसे को नेता कहना, नेता शब्द का भी अपमान होगा ।

 

उपरोक्त अनेक बाधाओं के बावजूद अन्य देशों की तुलना में हमारे देश में संघीय प्रणाली का क्रियान्वयन बुरा नहीं कहा जा सकता । आज, जब पहले पांच साल पूरे हो गए और दूसरा कार्यकाल चल रहा है, तो इसने एक आकार ले लिया है । संघवाद का कार्यान्वयन इतनी आसानी से नहीं हुआ है । अभी भी ऐसी स्थिति है जहां संघीय सरकार स्थानीय स्तर पर आने वाली समस्याओं के प्रति गंभीर नहीं है और राज्य सरकारों को संघीयता के कार्यान्वयन में आने वाली समस्याओं के बारे में बहुत अधिक दबाव डालना पड़ता है और रैलियां निकालनी पड़ती हैं । ऐसी स्थिति है कि सरकार को संघवाद लागू करने में जिस तरह की सतर्कता और भूमिका निभानी चाहिए, वह नहीं निभा पा रही है । क्योंकि संघ में रहने वाले सिंहदरबार के लोग केंद्रीकृत शासन प्रणाली के आदी हैं । विरासत छोड़ने मे प्राण निकल रहा है । सबसे जटिल समस्या यही है । ध्यान रहे ! दस प्रतिशत लोगों के हाथों से सत्ता निकलकर नब्बे प्रतिशत नेपालियों के हाथों मे जा चुका है । जिसे पुनः वापस लाने के लिए हीं संघ के कारण आर्थिक संकट और देश को डूबने, श्रीलंका बनने जैसी भयावह वाक्यों का प्रयोग किया ज रहा है ।

 

यह देखा जा सकता है कि नेपाल द्वारा राज्य प्रबंधन की प्रणाली के रूप में संघवाद को अपनाने के पीछे तीन औचित्य हैं । सबसे पहले, नेपाल की विभिन्न जातियों और भौगोलिक क्षेत्रों की पहचान का प्रबंधन करना और मौजूदा सामाजिक और आर्थिक मतभेदों को हल करना । दूसरा, नेपाल के विकास को क्षेत्रीय, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पहलुओं के संदर्भ में निष्पक्ष और संतुलित बनाना । और, तीसरा, नेपाल की पारंपरिक रूप से अत्यधिक केंद्रीकृत राजनीतिक, प्रशासनिक और वित्तीय प्रणाली को सबसे निचले स्तर तक विकेन्द्रीकृत करना । इसका उद्देश्य लोकतंत्र को संस्थागत बनाना है, जो बिना किसी भेदभाव के सभी नागरिकों के प्रति जवाबदेह हो । शासन प्रणाली को लोगों के जमीनी स्तर तक लाना और विकास को जन–उन्मुख और लोगों के प्रति उत्तरदायी बनाना है । परंतु क्या पिछले पंद्रह वर्ष में इसका अल्पांश भी हो पाया है ? इन वर्षों में लगभग पंद्रह बार सरकार बदल चुकी लेकिन किसी सरकार के कार्यकाल में जनता को थोड़ी भी राहत मिली ? वास्तव मे नेपाली जनता इन दुष्ट नेताओं से पूरी तरह तंग हो चुकी है । नेपाली नागरिक कहलाने में भी युवा वर्ग शर्मिंदगी की अनुभव कर रहे हैं । आम लोगों को खुदपर भी शर्म होने लगा है । लोग समझ गए हैं कि देश और सरकार अब नेपालियों के हाथों मे नहीं रहा । देश की मौलिकता को चुपके से गिरवी रख दिया गया है । न यहाँ पत्रकार क्षेत्र ईमानदार रहा न व्यापार क्षेत्र ही । शनैः शनैः आम नागरिक देश से पलायन होने को मजबूर कर दी जाएंगे । और बाकी बचेंगे उन्हें मजदूर बनने पर मजबूर कर दिया जाएगा । लोकतंत्र के सपना को नोटतंत्र में बदलकर भोगवादी प्रवृत्ति के दास नेपाली मूढ़ विद्वानों ने अपना असली चरित्र दिखा दिया है । यही कारण है कि यहाँ सैकड़ों शहीद होने के बावजूद भी मुठ्ठी भर व्यक्ति के हाथों में आज भी शासन सत्ता कायम है । किसी शायर ने कहा है,”बरबादे गुलिस्ताँ के लिए बस एक ही उल्लू काफी है । जहाँ डाल डाल पर उल्लू है अंजामे गुलिस्ताँ क्या होगा ?” मतलब, एक पतित, बेईमान और तुच्छ मनुष्य हजार सभ्य, ईमानदार और स्वाभिमानी व्यक्ति पर भारी पड़ता है । नेपाल मे तो उल्लुओं की भीड़ लगी है । जीत देखो तीत उल्लू उल्लू !

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नेपाल का संविधान २०७२ नेपाल की सरकारी प्रणाली में मूलभूत परिवर्तन की परिकल्पना को साकार करने के लिए प्रतिबद्ध है । सदियों के केंद्रीकृत शासन को विकेंद्रीकृत, संघीय ढांचे में बदल दिया गया है । निसन्देह, यह नेपाल की शासन परंपरा में युगांतकारी राजनीतिक एवं प्रशासनिक परिवर्तन है । संविधान में सरकार के तीन स्तरों का प्रावधान है जिनमें संघ, राज्य और स्थानीय स्तर शामिल हैं । सरकार के इन तीन स्तरों के एकल और सामान्य अधिकारों की सूची भी संविधान द्वारा ही निर्धारित की गई है । संविधान की अनुसूची ५ में संघ के ३५ अधिकार सूचीबद्ध हैं, जबकि अनुसूची ६ में प्रांतों के २२ अधिकार सूचीबद्ध हैं । अनुसूची ८ में २२ स्थानीय स्तर के अधिकारों की सूची है । इसी प्रकार अनुसूची ७ में संघ एवं राज्य के सामान्य २५ अधिकारों की सूची है तथा अनुसूची ९ में संघ, राज्य एवं स्थानीय स्तर के सामान्य १५ अधिकारों की सूची है । इस प्रकार संविधान में प्रत्येक स्तर पर एकल एवं सामान्य अधिकारों के माध्यम से स्वशासन एवं सामान्य शासन की व्यवस्था की गई है । मंत्रिपरिषद ने संघ, राज्य और स्थानीय स्तर के एकल और सामान्य अधिकारों की सूची विस्तृत की है, हालाँकि कई भ्रम और अस्पष्टताएँ बनी हुई हैं ।

संविधान में सरकार के तीनों स्तरों के बीच संबंध सहयोग, सह–अस्तित्व और समन्वय पर आधारित है । नेपाल सरकार द्वारा एकत्रित राजस्व को संघ, राज्य और स्थानीय स्तर पर उचित तरीके से वितरित और हस्तांतरित करने के लिए एक अलग और स्वायत्त ‘राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधन और वित्त आयोग’ का गठन किया जाएगा । इस आयोग की सिफÞारिश के अनुसार, केंद्र से प्रांतों और स्थानीय स्तरों पर वित्तीय हस्तांतरण में राष्ट्रीय नीति, स्थानीय स्तरों द्वारा प्रदान की जाने वाली आवश्यकताओं और सेवाओं, राजस्व संग्रह की क्षमता को ध्यान में रखा जाना चाहिए । विकास में सहयोग, क्षेत्रीय असंतुलन को कम करने तथा गरीबी एवं असमानता को कम करने के लिए आवश्यक संसाधनों एवं साधनों की व्यवस्था है । केंद्र से स्थानीय स्तर तक चार प्रकार के अनुदान होते हैं, समानीकरण, सशर्त, अनुपूरक और विशेष अनुदान । उसी प्रकार प्रांत भी स्थानीय स्तर पर समानता के आधार पर सब्सिडी प्रदान करता है । स्थानीय सरकार अपनी नागरिकों के ज्वलंत और दीर्घकालीन समस्याओं का पहचान कर आवश्यकता अनुसार सुविधाएं उपलब्ध करा रही है । पहले की अपेक्षा आम नागरिक तक राज्य व्यवस्था का पहुँच देखा जा सकता है । इन सबके वावजूद केन्द्रीय शासन सत्ता मे पिछड़े और वहुसंख्यक नेपाली जनता को न्यायोचित अधिकार नहीं दिया गया है । जो भविष्य मे राष्ट्रीय विपदा का उत्पादक बन सकता है ।
वास्तव में नेपाल सरकार अर्थात संघ सरकार प्रांत को अधिकार देना ही नहीं चाहती है । प्रांतीय सरकार से संघ सरकार भयभीत है । दोनों के सत्ताधारी वर्गों के बीच पहाड़ी मधेसी मानसिकता जैसे मनोवैज्ञानिक भय और दूरी है । केंद्र मे मुठ्ठीभर परंपरावादी नेताओं का कब्जा है; तो वही प्रांत में जनजाति, दलित, मधेसी, थारु, आदि की पकड़ है । लंबे समय तक सत्ता भोग के बाद इन लोगों की राजनीतिक पकड़ जनता में मजबूत हो जाएगी और आर्थिक–प्रशासनिक पकड़ तो सत्ता का सहज फल है ही । यही आस्तित्व विहीनता के मनोवैज्ञानिक भय से आक्रांत खस मानसिकता के लिए संघीयता गले का घेघ बनता जा रहा है । इसी घेघ को सर्जरी करने के लिए प्रदेश सरकार को कमजोर करने का हर संभव प्रयास किया जा रहा है । प्रादेसिक नेताओं को अनेकों प्रलोभन दिए जा रहे हैं । और ये प्रादेशिक नेतागण इतने मूर्ख हैं कि केंद्र से अधिकार छीनने के बदले हिजड़ों की तरह जनता के आगे रोना रोते हैं । वे केवल प्रतिकूल बातें कह रहे हैं कि केंद्र सरकार ने हमें नियंत्रित कर लिया है और हमारे अधिकार छीन लिये हैं । जबकि संघीय सरकार भी एक सरकार है, और प्रांतीय सरकारें भी सरकार हैं । केन्द्रीय सरकार को प्रांतीय और स्थानीय सरकार के सह–अस्तित्व को स्वीकार करना होगा । और सहयोग तथा समन्वय के साथ मिलकर काम करना होगा । षड़यन्त्र ज्यादा समय तक नहीं चलेगा । प्रांतीय और स्थानीय सरकार को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए अल्पकालीन और दीर्घकालीन विकास के सभी योजनाओं पर गहन विचार विमर्श आपसी समझदारी और पूरी ईमानदारी के साथ कार्यान्वयन करना चाहिए । परंतु यह किसी पंचवर्षीय योजना के आधार पर चलता नहीं दिख रहा है । कानून मनमर्जी से बनाये जाते हैं । राज्य सरकार का कहना है कि संघ ने अधिकार नहीं दिया, एकल अधिकारों की सूची में शामिल मामलों पर कानून बनाने के अधिकार का संघ ने अतिक्रमण किया है । संघ ने २–३ फीसदी बजट देकर राज्य का अपमान किया है । जब वित्तीय अधिकार न मिले तो क्या करें ? राजकोषीय संघवाद के मामले में अन्य प्रांत बहुत कमजÞोर हैं । उस लिहाज से, केंद्र सरकार यह नहीं सोचती कि राज्य सरकार को कैसे मजबूत किया जाए । अब इसपर भी जनता को ही आंदोलित होना पड़ सकता है ।

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गंभीरता से देखा जाए तो अब सभी पुराने कानून रद्द होने चाहिए । कानून संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य के अनुसार बनाये जाने चाहिए । राज्य सरकार को पुलिस और कर्मचारी व्यवस्थापन का सम्पूर्ण अधिकार होना चाहिए । धीरे–धीरे जिला समन्वय समिति को समाप्त किया जा सकता है और स्थानीय स्तर पर ही संगठित होकर आगे बढ़ा जा सकता है । प्रांत के नीतिगत दायित्वों में से कुछ ऐसा कार्य है, जिसे स्थानीय स्तर, नगरपालिका स्वयं नहीं कर सकती । चार या पांच नगर पालिकाओं को जो करने की आवश्यकता है, ऐसे काम प्रांत द्वारा नगर पालिकाओं के सहयोग से किए जाएंगे । जो दीर्घकालीन विकास के गति को मजबूती प्रदान करेगा । नेपाल छोटा देश होने और यहाँ के नागरिक कर्मठ और जिम्मेदार होने के कारण यहाँ विकास के किसी भी आधुनिक प्रयोग को सफलता पूर्वक किया जा सकता है । कर्मठ, शान्त तथा स्वभाव से सृजनशील होने के कारण मधेसी जनता कसी भी प्रकार के विकास के योजनाओं को बड़ी ही धैर्यता पूर्वक कार्यान्वयन कर सकती है । परंतु इन्हें इस प्रकार के अवसरों से वंचित रक्खा जाता रहा है । भले ही देश गर्त मे चला जाए परंतु, मधेसी को न अवसर देना है न अधिकार । यही खसवादी परंपरागत सोच है । राज्य शक्ति के पहुंच में असमानता है, जातियों में असमानता है । कोई समावेशी, न्यायसंगत विकास नहीं हुआ । नेपाल में ऐतिहासिक काल से, इस देश के निर्माण के बाद से, काठमांडू से बाहर के लोगों की काठमांडू के प्रति जिम्मेदारी और स्नेह है । अपनत्व का भाव भी है । परंतु केंद्र (काठमांडू) के जनता को बाहरी के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है, और नहीं अपनत्व का भाव ही ।

अतः संघीय प्रणाली का संबंध केवल मधेश से नहीं है । आप सुदूर पश्चिम में जाएं, आप कर्णाली जाएं, आप नेपाल के हिमालयी क्षेत्र में जाएं, हर जगह इस तरह की धारणा है । इसलिए, समतामूलक समावेशी विकास संघीयता का एक महत्वपूर्ण पक्ष है । और ऐसे पुनीत कार्य को सफलता पूर्वक व्यवहार मे लागू करने के लिए सत्ता और शक्ति का विकेंद्रीकरण जरूरी है । विकेन्द्रीकरण के लिए ही हमारे संविधान ने स्थानीय स्तर पर ग्रामीण गांवों और नगर पालिकाओं का निर्माण किया । वर्तमान में हमारे संविधान के अनुसार सबसे शक्तिशाली नगर पालिका है । उनकी संरचना पक्षपातपूर्ण नहीं है, नगर पालिका के कैडर पक्षपातपूर्ण नहीं हैं ।
हमारी शक्ति नीचे तक जाए ताकि वह अच्छे से जड़ें जमा ले । यह गंतव्य की स्पष्ट समझ और दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ संघवाद को लागू करने, शक्ति की जमा राशि को मूर्त रूप देने, प्रांतों और नगर पालिकाओं को सक्षम, मजबूत और मजबूत बनाने के लिए सहभागी लोकतंत्र का अभ्यास करने और सभी प्रकार के व्यवधानों को संबोधित करने का एक ऐतिहासिक अवसर है । सरकार के तीनों स्तरों के लिए अपने पिछले अनुभवों से सबक सीखकर आगे बढ़ने, एक–दूसरे से सीखने, नियंत्रण–उन्मुख शासन से सुविधा–उन्मुख शासन की ओर बढ़ने, सुविधा–उन्मुख राजनीतिक से आगे बढ़ने का इससे बेहतर अवसर कब मिलेगा । प्रशासनिक व्यवस्था से लेकर सेवा–उन्मुख नेतृत्व व्यवस्था तक, और भाषण के बजाय काम से पहचान बनाएं ? स्वच्छ नेतृत्व और राजनीतिक इच्छाशक्ति, इस तरह अगर राज्य और स्थानीय स्तर को केंद्र में रखकर विकास की चर्चा नहीं बढ़ाई जा सकी तो संघीय प्रणाली के पाँव को उखड़ते देर नहीं लगेगी, जो देश और देशवासी के लिए दुर्भाग्यपूर्ण होगा । बस, समझ काफी होता है ।



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