Sat. Apr 13th, 2024

रबि लामिछाने के स्टण्ट्स से देश का समस्या समाधान नहीं, और उलझने बाला है : कैलाश महतो



कैलाश महतो, नवलपरासी । कहते हैं कि नये नये बाबा जी खुब वदन पर भभूत लगाते हैं, माथे पर चन्दन का तिलक लगाता है और धार्मिक किताबों को अपने सर पर लेकर दौड लगाता है । नयी नयी दुलहन खुब सजती संवरती है, ससुराल की खुब गीत गाती है और अपने में एक अनहोनी करामात देखती है । मगर वक्त सबको अपने रङ्ग में रंग लेता है । कोई वक्त से मुकावला कर लेता है, कोई राम रहीम तो कोई नेपाल-भारत के चर्चित भागवत कथा पाखण्डी वाचक बाबा ब‌न जाता है ।

चौदह महीने के अन्दर तीन तीन बार मन्त्री मण्डल बदलना और इस छोटी सी अवधि में जोड जबर्जस्ती रबि जी का दो दो बार गृहमन्त्री बनना भयंकर लालच, कोई अदृश्य ललक और आत्मरति का कोई बडा कोई गुमसुम तारीखखाना का भोगाई नजर आता है । ‌‌‌‌‌

नेपाल के राजनीति में‌ कुछ राम रहीम, नेपाली धर्मगुरु तथा कथा वाचक शितलकृष्ण भूसाल और कथा की  हनीप्रीत भी हैं, जो कथा सुनाने और नये नये रङ्ग दिखाने में माहिर हैं । लेकिन‌ गौर करने बाली बात फिर यह मजे की है कि अपने विशाल पगडियों के अन्दर में कन्ट्रासेप्टिव डिवाइस भी रखे जाने की कलात्मक चमत्कार हैं – जिसका प्रयोग अपराधी और ढोंगी बाबा लोग बडे कलसत्मक रुप से गैर कानुनी धन्धे के लिए करते हैं । नेपाली राजनीति हमेशा से जितने गन्दे थे, उसमें नयापन लाने में जितने नये पार्टियों ने जन्म लेते ही लाया है, संभवत: पूराने पार्टियों को वह करने में तीन दशक लगे हैं । नये कोई भी पार्टी देश के राजनीति को सुधारने से ज्यादा वे इस मनोदशा से राजनीति में कदम रखा है कि राजनीतिक आक्रोश का आवरण दिखाकर उसी किचड में कुछ मछलियां‌ पकडने हैं, जिसे तलकर अपना भी परिवारिक वजूद और व्यक्तिगत शान झार लेना है ।

दो कहावत अपने अपने जगहों पर सही सत्य होकर भी हरेक स्थान‌ पर सही नहीं हो सकते । दिमाग से सातिर कुछ लोग प्राय: यह उदाहरण देकर किसी के कालेपन को उजला बनाने की कोशिश करते हैं कि महा फसादी हत्यारा रत्नाकर जब सुधर सकता है, तो फिर कोई मूक बिगडा क्यों नहीं ? मगर यह भी सत्य है कि कुत्ते के पूंछ पर जितना भी घी मालिश हो, वह सीधा नहीं हो सकता ।

रत्नाकर को सुधरने और साहित्यकार बनाने में जो आत्मगत घटना ने भूमिका निभाया था, वैसी घटनायें वर्तमान नये और पूराने राजनीतिक नेताओं के लिए प्रयोगहीन हो चुके हैं । इनके लिए नयेपन का मतलब जलता हुआ श्मसान घाट को चुल्हा मानकर अपने लिए खाना तैयार करना है । इन्हें यह कतई भी फिक्र नहीं कि उस आग में किसी का परिवार जल रहा है, किसी का सपना ढह रहा है और किसी खुशी भष्म हो रहा है ।

देश में मौजूद नया तीन युवा नेतृत्वों को पूराने नेतृत्वों से तुलना की जाय, तो वे तीन युवा नेतृत्व पूराने नेतृत्वों से अकल्पनीय स्तर पर ज्यादा चोर, सुलझे भ्रष्ट और भद्र पथनष्ट हैं । ये सब नये नये खुराफाती जुगाडी हैं ।

राजनीति या तो इइ नये महानायकों के समझ से बाहर है, या इस बिगाडे हुए राजनीति का सहारा लेकर उसमें नये ढंग से कमाई करने की चिन्तन की विकास है । इनके लिए शायद यह बना बनाया माहोल है कि भ्रष्ट राजनीति में अगर ये भी कुछ रङ्ग रुप बदलकर भ्रष्टाचार करें तो सबसे पहले तो जनता को यह पता लगाना मुश्किल होगा कि सही में भ्रष्टाचार किया किसने ? दूसरा यह कि पूराने भ्रष्टों को गाली देकर एक माहोल तैयार करना और उसके सहारे अपनी कमाई करनी है । तीसरा, वे नये बाबा लोग यह बखुबी जानते हैं कि पूराने का विरोध कर देश में लूट भी मचाये, तो पूराने भ्रष्ट अपने को बचाने हेतु नये को उसके मर्जी के अनुसार छुट देते जायेंगे ।चौथा यह कि पूराने चोर को नया उर्जावान साथी मिल‌ गये हैं, जिनके हिजडेपन पर पूराने भी अट्टहास करते हैं ।

जनता को यह मानना होगा कि जहर के फ्याक्ट्री में अमृत बन ही नहीं सकता । जिस देश का चुनाव प्रणाली भ्रष्ट, महंगा और गरीब विरोधी हो, उससे उत्पादित नेता, संसद, सांसद और सरकार देश और जनमैत्री हो ही नहीं सकता । नेता और पार्टी नया हो सकता है, मगर वो नया चोर है – इस बात को झूठलाया नहीं जा सकता ।

मीडिया में रहकर भ्रष्ट नेताओं को गाली देकर भ्रष्टाचार को खत्म करने के पुलावी नारे देकर राजनीति में आए रबि लामिछाने लगायत के नव-चोरों ने नये ढंग से पूराने चोरों के जमात में चोरी करने पहुंचे हैं । भ्रष्टाचार को भ्रष्टाचार और भ्रष्टों को भ्रष्ट कह देने से न तो भ्रष्टाचार खत्म हो सकता है, न भ्रष्टों का खात्मा । उसे खत्म करने के लिए भ्रष्टाचार के मूल कारणों को समाप्त करना होगा और वह है महंगा और भ्रष्ट निर्वाचन प्रणाली । उसके बाद ही कोई गरीब, सरीफ और जनप्रेमी नेता चुनाव में भाग ले सकता है ।

घुसखोर, भ्रष्ट, नियतखोर और कामचोर को कानुनी घेरे में लाना राज्य और सरकार का कर्तव्य है । देश के भ्रष्ट बडे मछलियों (ठूलो माछा) को पकडना हिम्मत की बात है । सराहनीय काम‌ है । रबि को उसके लिए जितना भी धन्यवाद दें, कम होगा । मगर … !

मगर गृहमन्त्री रबि लामिछाने वाकई वीरता के प्रतिक हैं, या कोई अनहोनी स्टण्ट का पूनर्जागृति है ? गृहमन्त्री जब कानुन पालना की बात करें, तो वही कानुन उस पर लागू क्यों नहीं हो सकता ? देश को सुधारने बाला सुधारमन्त्री जब अपने को चोर और बेइमान बनाये रखे, तो वो भ्रष्टाचार को खत्म किस आधार पर करेगा ? दो देशीय नागरिक, दो देशीय पासपोर्टधारी, देश के सर्वोच्च अदालत में मुद्दा खेपने बाले, सहकारी का अरबों घोटाला का पात्र किस राजनीतिक सुधार का सुपात्र हो सकता है ? शादियों को मजाक, वहु विवाह का राजकुमार और महिला जिस्म का नशाखोर शख्स देश के महिलाओं को न्याय किस आधार पर दिलायेगा ? जिस देश का प्रधानमन्त्री विवादित, घोटालेबाज, विदेशी बैंकों के मालिक के प्रधानमन्त्रित्व को स्वीकार कर केवल और केवल गृहमन्त्री बनने का पारामीटर कायम करता हो, उसका गृह प्रशासन सवच्छ होने का सवाल ही हास्यास्पद है ।

कृष्ण बहादुर महरा और पूर्व उपराष्ट्रपति पुन पुत्र की गिरफ्तारी, आरती साह के परिवार से सम्झौता, मीटर ब्याजी पीडितों से सहमति, भूटानी शरणार्थी मुद्दा को पूनर्जार्गरण, आदि निश्चित ही जनप्रिय कार्य हैं । मगर इतनेभर से क्या देश का राजनीति, नेताओं की नीति, रबि का ही कुत्सित नियत, देश में व्याप्त घुसखोरी, आदि खत्म हो जायेंगे या रबि कुछ नौटंकी दिखाकर सहकारी घोटाला और डब्बल पासपोर्ट काण्ड को सफाया करना चाहते हैं ?

रबि लामिछाने के बाहरी तीर से आन्तरिक शिकार और जुगाड को देश को भलीभांती समझनी होगी । रबि को इमानदार और कानुन सम्मत गृहमन्त्री होने के लिए प्रथमत: अपने आपको अपने देशद्रोही और आर्थिक  अपराध के लिए प्रहरी को अपने गिरफ्तारी के लिए निर्देश देना चाहिए । जिस उखाने टुक्के के सह में उप तथा गृहमन्त्री हुए हैं, उनको, प्रधानमन्त्री प्रचण्ड, शेर बहादुर, आरजू देउवा लगायत के लोगों को हिरासत के लिए निर्देश करना चाहिए ।

दु‌निया का हर विकसित राष्ट्र विधि के शासन पर चलता है । नेता उसका सहयोगी और राजनीति उसका रक्षक होता है । राजनीति और नेता विधी पर विश्वास करता है, दिखावा नहीं – जैसे नेपाल में किया जाता है । विधि के शासन बाले देशों में राजनीति शास्त्र के विद्वानों द्वारा प्रतिपादित प्राविधिक शब्द सूत्रों को सदियॊ से प्रयोग में रखें हैं । कोई छेडखानी नहीं । मगर नेपाल के नव महानायक पंडित परिवार नेता हर सप्ताह नये नये शब्द का आविष्कार करने का स्टण्ट करते हैं ।

रबि के एक्शन से समस्या सुलझने से ज्यादा उलझने के आसार है । क्योंकि उनके स्टण्ट्स के कारण जो समस्या पैदा होने बाले हैं, वे ये हैं कि रबि जी जानते हैं कि लम्बे समयतक वे मन्त्री रहेंगे नहीं । चार छ: महीनें में वे हटेंगे या हटाये जायेंगे । रवि को कांग्रेस और एमाले मिलकर हटायेंगे । रबि का स्टण्ट्स समाप्त और उनके द्वारा किए गये सारे कार्यों को उलटाये जायेंगे जैसे नारायण काजी जी के साथ हुए । यह क्रम चलता रहेगा और देश का समस्या ज्यों का त्यों रहेगा । रबि और कुछ स्व-प्रचारक नेता यह जानकर भी ऐसे बेतुक के एक्शन करते हैं कि सीधा और सपाट नेपाली जनता इनके प्रदर्शन पर कायल होकर अगले चुनाव में ज्यादा सीट जितायेंगी ता कि वे ज्यादा कमायेंगे ।

देश का समस्या चुनाव लडने और ज्यादा सीट जितने से नहीं, भ्रष्ट निर्वाचन प्रणाली को खत्म कर बदले निर्वाचन प्रणाली से खत्म होंगे । इस बात को रबि लगायत नये राजनीतिक ठेहा चलाने बालों को स्वीकारना होगा ।

स्वच्छ और एक्शनफूल गृहमन्त्री बनने के लिए भ्रष्ट और व्यवस्था बिगारु सारे नेता और अधिकारियों को समय रहते गिरफ्तार करें । उनकी सम्पत्ती छानविन करायें, गरीबों को राज्य से हक दिलायें और मधेशी तथा जनजातियों को राज्य और उसके संसद व सरकार में समानुपातिक प्रतिनिधित्व करवायें । नहीं तो एक‌ शराबी शराब को गाली देने जैसा वरताब माना जायेगा ।



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