Tue. May 28th, 2024

फिल्मों का उद्देश्य मनोरंजन करना है, शिक्षा देना नहीं है : पूर्णेन्दू झा, फिल्म निर्देशक

 



पूर्णेन्दू झा, फिल्म निर्देशक Purnanendu Jha 2
पूर्णेन्दू झा, फिल्म निर्देशक Purnanendu Jha 

लीलानाथ गौतम, हिमालिनी अंक फरवरी 2024 । फिल्म से प्रभावित ना होनेवाला व्यक्ति मिलना मुश्किल है । इसमें से कई लोगों के जीवन का एक कालखण्ड ऐसा भी होता है, जहां युवा और युवतियां खुद को फिल्मी कलाकारों से तुलना करते हैं और सोचते हैं कि मैं भी फिल्मी नायक और नायिकाओं से कम नहीं हूँ । ऐसा सोचकर फिल्मी कलाकारों की नकल करनेवाले बहुत सारे किशोर और किशोरियां होते हैं । उनकी चाहत होती है कि मैं भी भविष्य में फिल्मी कलाकार ही बनूंगा । ऐसे ही पात्रों में से एक हैं– सर्लाही जिला गोडैता नगरपालिका के स्थायी निवासी पूर्णेन्दू झा । लेकिन पूर्णेन्दू कलाकार नहीं, फिल्म निर्माता बनना चाहते थे ।

हां, उनकी जीवनी भी फिल्मों से अधिक प्रभावित रही । आज से ३०–३५ साल पहले हर शनिवार नेपाल टेलिभिजन और भारतीय टेलीभिजन में आनेवाला नेपाली तथा हिन्दी फिल्म उन्होंने खूब देखा । अधिक फिल्म देखने के कारण बचपन में कई बार उनके माता पिता ने उन को बहुत पीटा भी । लेकिन फिल्म देखते वक्त पूर्णेन्दू खूद को ‘हीरो’ नहीं समझते थे । वह सोचते थे कि भविष्य में मैं भी फिल्म बनाऊंगा, फिल्म निर्देशन करुंगा । लेकिन माता–पिता चाहते थे कि बेटा डॉक्टर बने । इन्हीं पारिवारिक चाहतों के साथ उन्होंने आईएससी किया । लेकिन उनका मन हरदम फिल्मी दुनियां की ओर आकर्षित रहा ।

ऐसी ही पृष्ठभूमि में सन् २००४ में कलाकार तथा फिल्म निर्देशक नीर शाह ने काठमांडू में ‘कॉलेज ऑफ फिल्म स्टडिज’ नाम से एक कॉलेज की स्थापना की, जहाँ फिल्मी विषय को लेकर अध्ययन–अध्यापन किया जाता था । यह कॉलेज त्रिभुवन विश्वविद्यालय से सम्बन्धन प्राप्त था । पूर्णेन्दू ने डाक्टर बनने की चाहत छोड़ दी और कॉलेज ऑफ फिल्म स्टडिज’ में भर्ती हो गए । कॉलेज के लिए पूर्णेन्दू प्रथम बैच के विद्यार्थी हैं । वही पूर्णेन्दू आज नेपाली फिल्मी उद्योग में निर्देशक के रूप में जाने जाते हैं । हिमालिनी के लिए लिलानाथ गौतम ने फिल्म निर्देशक पूर्णेन्दू जी से उनकी फिल्मी जीवन तथा भावी योजना को लेकर बातचीत की है । प्रस्तुत है, बातचीत का सम्पादित अंश–

० फिल्मी दुनियाँ में आप का प्रवेश कैसे हुआ ?
– कॉलेज ऑफ फिल्म स्टडिज से मैंने सन् २००७ में स्नातक किया । मेरा अध्ययन का मुख्य विषय फिल्म निर्देशन तथा पटकथा लेखन है । कॉलेज से स्नातक करने के बाद कुछ समय स्वअध्ययन भी किया । उसी समय युएसएड ने शॉर्ट फिल्म कम्पिटीसन के लिए एक सूचना जारी की । जारी सूचना में कहा गया था कि एच.आई.भी. एड्स विरुद्ध जनचेतनामूलक कमर्सियल शॉर्ट फिल्म निर्माण करना है । मैंने उस कम्पिटीसन में भाग लेने के लिए ठान लिया । फिल्म निर्माण के लिए आवश्यक आर्थिक सहयोग युएसएड की ओर से ही मिलनेवाला था । कथा लेखन, निर्माण और निर्देशन की जिम्मेदारी मेरी थी । नेपाली, मैथिली तथा प्रचलित अन्य भाषाओं में फिल्म निर्माण करना था । मैंने नेपाली भाषा को चयन किया और अपनी कथावस्तु और फिल्म निर्माण संबंधी कन्सेप्ट प्रस्तुत किया । मेरे साथ–साथ अन्य ७ प्रतिस्पर्धियों की कथा भी फिल्म निर्माण के लिए चयन हो गया । कुल ८ कथा और कन्सेप्ट में फिल्म निर्माण प्रक्रिया आगे बढ़ा । उक्त प्रतिस्पर्धा में सहभागी अन्य ७ प्रतिस्पर्धी आज नेपाली फिल्म उद्योग में स्थापित नाम हैं ।

सात–आठ मिनेटों का शॉर्ट फिल्म निर्माण करना था । सभी ने अपने–अपने कन्सेप्ट में फिल्म निर्माण किया । मैंने नेपाली फिल्म उद्योग में स्थापित कलाकार निर शाह, राजबल्लभव कोइराला, ऋचा शर्मा, विकास रौनियार, मेलिना मानन्धर जैसे कलाकारों को लेकर ‘अपवाद’ नाम से फिल्म निर्माण किया । सभी फिल्मों को देश भर प्रदर्शन में लाया गया । मीडिया मार्केटिङ के लिए भी बजट दिया गया था । चार–पाँच महीने तक इसको प्रदर्शन में लाया गया । फिल्म को लेकर खूब चर्चा हुई । पब्लिक प्रदर्शन के बाद अंत में युएसएड और अमेरिकी दूतावास ने एक विशेष कार्यक्रम आयोजना किया । उस कार्यक्रम का उद्देश्य फिल्म को प्रतिस्पर्धात्मक दृष्टिकोण से रैकिंग करना भी था । मेरे नेतृत्व में निर्मित शॉर्ट फिल्म ‘अपवाद’ विजयी हो गई, इसने प्रथम स्थान हासिल किया ।

प्रथम निर्देशकीय प्रयास से निर्मित अपवाद को प्रथम स्थान मिलने के कारण नेपाली फिल्मी उद्योग में मेरा नाम एक प्रकार से चर्चा में आ गया । तत्कालीन पत्रपत्रिकाओं ने भी ‘प्रथम निर्देशकीय प्रयास से निर्मित फिल्म को प्रथम स्थान’ कह कर समाचार लिखा था । इस सफलता के बाद युएसड ने ही हम लोगों को तीन महीनों की ट्रेनिङ के लिए मुम्बई भेजा । भारती जी टीभी संजाल अन्तर्गत की ‘जी इन्स्टिच्यूट ऑफ मिडिया आर्टस्’ नामक संस्था द्वारा संचालित कक्षा में तीन महिनों की ट्रेनिङ ली । ‘अपवाद’ के बाद मेंने मैथिली भाषा में अन्य पाँच शॉर्ट फिल्म भी निर्माण किया । एक समय तो ऐसा भी रहा कि नयी पीढ़ी के युवाओं में से (जो शॉर्ट फिल्म निर्दशन करता है) मेरा नाम प्रथम स्थान में रहा । स्पेनिस टीम, साउद अफ्रिकन टीम, अमेरिकी टीम के साथ मिलकर विज्ञापन, डाक्युमेन्ट्री, टीभी शो जैसे क्षेत्र में भी काम करने का अवसर मिला । टीभी फिल्मी का रियालिटी शो ‘कौन बनेगा कलाकार ?’ में भी डाइरेक्शन करने का अवसर मिला । बॉलिउड कलाकार अक्षय कुमार की फिल्म ‘बेबी’ (जो नेपाल में सुटिङ हुई थी) में सहायक निर्देशक की भूमिका में रहा । इसी तरह फिल्म क्षेत्र में २० साल बीत चुका है ।

० एक कहावत है कि नेपाल में नेपाली फिल्मों से ज्यादा हिन्दी फिल्मों का बाजार है । इसके पीछे का कारण क्या हो सकता है ?
– यह आप की गलत सूचना है । कुछ साल पहले तक का तथ्यांक ऐसा हो सकता है, लेकिन अब ऐसी अवस्था नहीं है । नेपाली फिल्मों का बाजार ही नेपाल में ज्यादा है । मान लें कि कोई हिन्दी फिल्म नेपाल में १८–२० करोड़ तक का व्यापार करता है । नेपाली फिल्मों का व्यापार भी उससे कम नहीं है, ज्यादा है ।

० हर साल दर्जनों नेपाली फिल्म निर्माण होता है । लेकिन दो–चार फिल्म को ही बाजार मिलता है । क्यों ?
– सिर्फ नेपाल में नहीं, विश्व बाजार में भी ऐसा ही होता है । जहां जितना भी फिल्म बनता है, उसके ८–१० प्रतिशत फिल्म को ही सफलता मिलती है । मान लीजिए कि हर साल भारत में १०० फिल्म बनती है, उसमें से मुश्किल से ७ से १२ फिल्मों की ही चर्चा होती है । नेपाल और भारत में ही नहीं, विश्व बाजार का तथ्यांक यही है ।

० करोड़ों खर्च कर फिल्म निर्माण किया जाता है । एक निर्देशक के नाते फिल्म ना चलने का क्या कारण हो सकता है ?
– हर फिल्म निर्माण के पीछे व्यापारिक उद्देश्य नहीं होता । कई फिल्म ऐसे भी होते हैं, जो लोगों को पसन्द आते हंै, लेकिन व्यापारिक दृष्टिकोण से उसको असफल माना जाता है । कई फिल्मों में सामान्य कथावस्तु और प्रस्तुति होती है, लेकिन व्यापार में सफल हो जाता है । सिर्फ आर्थिक बजार को मध्यनजर कर निर्माण होनेवाला फिल्म भी असफल हो जाता है । मेरे खयाल से निर्माता–निर्देशक फिल्म के जरिए क्या कहना चाहते हैं ? इस प्रश्न का जबाव फिल्म में मिल जाता है तो वह फिल्म सफल है ।

० फिल्मी जगत समाज के लिए एक आईना भी है । कई लोग कहते हैं कि फिल्मी कथा से समाज निर्देशित होना चाहिए । लेकिन शिकायत है कि ऐसा नहीं होता है । समाज की आवश्यकता अनुसार फिल्म निर्माण होना चाहिए या बाजार की मांग के अनुसार ?
– यह जटिल प्रश्न है । फिल्म निर्माण करते वक्त समाज की आवश्यकता क्या है और बाजार की मांग क्या है ? इस विषय को लेकर खास बहस भी नहीं होती । अगर कोई कहता है कि ऐसा होता है, यह सिर्फ भ्रम है । हां, तत्कालीन समाज, संस्कृति और राजनीतिक परिस्थिति फिल्मी कथावस्तु में आ सकता है, लेकिन उस कथावस्तु के जरिए समाज को मार्ग निर्देशन करना चाहिए, ऐसा सोचना गलत है । फिल्म का मुख्य उद्देश्य लोगों को मनोरंजन प्रदान करना है । अगर शिक्षा ही प्राप्त करना है तो आप के लिए स्कूल और कॉलेज है । जिसतरह मन शांत करने के लिए, भगवान प्राप्ति के लिए, पूजापाठ के लिए लोग मन्दिर जाते हैं, वैसे ही मनोरंजन के लिए लोग फिल्म हॉल जाते हैं । इसीलिए फिल्म को सामाजिक दायित्व वहन करना चाहिए, ऐसी बाध्यता नहीं है ।

० फिल्म और कलाकारों का कोई भी सामाजिक दायित्व नहीं है, ऐसा कहना क्या गलत नहीं है ?
– मैंने ऐसा नहीं कहा कि फिल्म और कलाकारों का कोई भी सामाजिक दायित्व नहीं होता है ! फिल्म निर्माता, निर्देशक और कालाकार समाज का ही एक अंश हैं । इनका दायित्व समाज को मनोरंजन प्रदान करना है, समाज को बिगाड़ना नहीं है । इसीलिए समाज के अन्य लोगों की तुलना में इनकी चेतना स्तर एक हद तक ऊपर ही होना चाहिए । अगर आवश्यक पड़ जाता है तो अपनी कला के माध्यम से समाज को शिक्षा प्रदान करने के लिए और मार्गनिर्देश के लिए भी पीछे नहीं हटना चाहिए । फिर भी उनके लिए यह मुख्य जिम्मेदारी नहीं है, मुख्य जिम्मेदारी तो मनोरंजन प्रदान करना ही है ।

० मनोरंजन के लिए प्रेम कथा में निर्मित फिल्म ज्यादा प्रभावकारी है । क्या मैंने सच कहा ?
– नहीं, यह पूर्ण सत्य नही है । सिर्फ प्रेमकथा में निर्मित चलचित्र से मनोरंजन प्राप्त होता है, ऐसा सोचना गलत है । सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक कथावस्तु में निर्मित चलचित्र से भी मनोरंजन प्राप्त हो सकता है और प्रेम कथा में निर्मित चलचित्र से लोग दुखी भी हो सकते हैं । फिल्मी कथावस्तु और प्रस्तुति से पता चलता है कि फिल्म मनोरंजनात्मक है या नहीं ! मैं फिल्म में विशेषतः रोमान्टिक ड्रामा को प्रस्तुत करना चाहता हूँ । मेरे निर्देशन में बननेवाला ‘पीजे–३’ रोमान्टिक ड्रामा में आधारित है, जहां रोमान्स और ड्रामा है ।

० आपके द्वारा निर्देशित प्रथम बड़े पर्दे की फिल्म ‘संरक्षण’ है, जिसका कथानक राजनीतिक है । क्या इसे एक मनोरंजनात्मक फिल्म कहा जा सकता है ?
– हां, राजनीतिक विषय में भी मनोरंजनात्मक प्रस्तुति हो सकती है ! तत्कालीन मधेश आन्दोलन की पृष्ठभूमि में यह फिल्म बनी है । फिल्म में समावेश अधिकांश संवाद राजनीतिक है । फिर भी यह मनोरंजनात्मक है । फिल्म में समावेश कथा और संवाद लोगों को पसंद आया है, उनकी जुबान में फिल्म का डायलॉग है । इसीलिए नाच और गाना में ही मनोरंजन होता है, ऐसा नहीं है । वैसे तो संरक्षण में नाच और गाना भी है । आइटम गीत को भी समावेश किया गया है ।

० संरक्षक फिल्म से क्या आप सन्तुष्ट हैं ?
– ज्यादा सन्तुष्ट नहीं हूँ । निर्माता और निर्देशक एक ही फिल्म में सन्तुष्ट हो जाते हैं, ऐसा नहीं है । अगर हो जाते हैं, तो उन लोगों की ओर अन्य फिल्म निर्माण होने की सम्भावना कम रहती है । जहां तक फिल्म संरक्षण की बात है, कुछ हद तक यह फिल्म सफल रही । जिस वक्त (श्रावण २७, २०७४) फिल्म रीलिज हुई थी, उस समय तराई मधेश के अधिकांश शहर बाढ़ में डूब गए थे । परिणामतः फिल्म प्रदर्शन में कुछ कठिनाईयां हुई थी ।

० नेपाल में निर्माण होनेवाला अधिकांश फिल्म पहाड़ी क्षेत्र में रहनेवालों के जनजीवन और समाज पर केन्द्रित होती है । इसी तरह तराई मधेश में रहनेवाले लोग, वहां का समाज, संस्कृति और भेषभूषा को केन्द्रीय विषयवस्तु बनाकर फिल्म निर्माण होना चाहिए, क्या आप को ऐसा नहीं लगता ?
– लगता है । इसतरह की कई फिल्में बन भी चुकी हैं । तराई–मधेश का सेट रख कर कई फिल्म बनी है । तराई का समाज, संस्कृति, चरित्र, भाषा लेकर भी फिल्म निर्माण होना चाहिए, इसमें कोई अलग मत नहीं है ।

० तराई का ही कथा और पात्र को लेकर फिल्म निर्माण किया जाता है तो उसमें खेलने वाले कलाकार पहाड़ के होते हैं । मेरा मतलब है कि केकी अधिकारी को तराई की बेटी बनाकर फिल्म निर्माण करने के बदले तराई की ओरिजनल भेषभूषा वाली बेटी को लेकर फिल्म निर्माण करें तो बेहतर होगा । क्या ऐसा नहीं है ?
– हाँ, नेपाली फिल्मों में कुछ हद तक ऐसी समस्या है । लेकिन तराई के ही भाषा और भेष–भूषा वाले बहुत कलाकार नेपाली फिल्म उद्योग में स्थापित भी हो चुके हैं । मेरे निर्देशन में निर्मित संरक्षण में भी ऐसे बहुत कलाकार हैं, जो मुख्य पात्रों की भूमिका में हैं । लेकिन महिला तथा नायिकाओं की भूमिका के लिए आप के कथन अनुसार कुछ हद तक समस्या भी है । हम लोग भी ऐसे युवतियां ढूंढने में असफल दिखाई दे रहे हैं, लेकिन मैं जानता हूँ कि अब हम लोगों को ही यह काम करना होगा ।

० आपने ‘पीजे ३’ फिल्म निर्माण के लिए घोषणा की है, यह कैसी फिल्म है ?
– जब मैं ‘कॉलेज ऑफ फिल्म स्टडिज’ का विद्यार्थी था, उसी समय मैंने १७ फिल्मों के लिए कथावस्तु और कन्सेप्ट तैयार किया था । मेरे निर्देशन में निर्मित संरक्षण और चौकादाऊ इसमें से नहीं है । लेकिन पीजे ३ उसी में से है । इसमें रोमान्टिक ड्रामा होगा, जहां राधा और रुक्मिनी नाम से दो चरित्र प्रस्तुत होंगे । काठमांडू, पोखरा और पाल्पा में सुटिङ करने की तैयारी है । बाद में इसको हिन्दी भाषा में भी डब की जाएगी ।
इसीतरह एक और मैथिली फिल्म भी निर्माण कर रहा हूँ । उसकी कथावस्तु तैयार है । कथा और पटकथा लेखन का कार्य जारी है । फिल्म का नाम और कलाकार फाइनल नहीं हुआ है । मैथिली भाषा में निर्माण होनेवाली यह फिल्म भोजपुरी और नेपाली भाषा में भी डब होनेवाला है ।

० नेपाल फिल्म उद्योग में ऐसे कई निर्माता और निर्देशक है, जिन्होंने फिल्म सम्बन्धी विषय को लेकर कोई भी औपचारिक अध्ययन नहीं किया है । फिल्म निर्माण के लिए औपचारिक अध्ययन जरुरी है ?
– हां, एकदम जरुरी है । मैथिली भाषा में निर्माण होनेवाले फिल्म के लिए मैं चार महिनों से अध्ययनरत हूँ । तब भी कुछ अधूरा ही लग रहा है । इसीलिए आज भी अनुसन्धान कर रहा हूँ । फिल्म निर्माण के लिए जिसतरह अर्थ की जरुरत है, उसीतरह निर्देशन और कथावस्तु लेखन के लिए अध्ययन और अनुसन्धान की जरुरत है । मैं तो निर्देशक हूँ, अपनी जिम्मेदारी पूर्ण रूप से निर्वाह कर सकूं, यही सोचता हूँ । नेपाली भाषा में निर्माण होनेवाला पीजे ३ हो या मैथिली भाषा में निर्माण होनेवाली फिल्म ! दोनों फिल्म के लिए अमेरिका निवासी नारायण अधिकारी जी आर्थिक सहयोग कर रहे हैं ।

० नेपाली फिल्म निर्देशन में आप के आदर्शपात्र कौन हैं ?
– खास तो कोई नहीं हैं । लेकिन एक ही नाम लेना है तो मैं नीर शाहजी को मानता हूँ । मेरे लिए शाह जी विशेष हैं । उनके द्वारा स्थापित कॉलेज में ही मैंने फिल्मी विषय का अध्ययन किया है । अगर उन्होंने नेपाल में ही कॉलेज स्थापना नहीं की होती तो ना जाने मैं फिल्मी क्षेत्र में होता या नहीं !

० अन्त में, चलचित्र विकास बोर्ड की बात करें । बोर्ड के लिए वर्तमान अध्यक्ष भुवन केसी अन्य पूर्व अध्यक्ष की तुलना में कुछ ज्यादा ही चर्चा में हैं । चलचित्र उद्योग के विकास के लिए बोर्ड और अध्यक्ष केसी की भूमिका को किस तरह देखते हैं आप ?
– नेपाली चलचित्र उद्योग की विकास के लिए बोर्ड स्थापना की गई है । लेकिन आज तक बोर्ड ने क्या किया ? इसका ठोस जबाब नहीं है । नेपाली चलचित्र उद्योग का विकास और उत्थान के लिए बोर्ड की महत्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए । स्मरणीय बात है कि नेपाली फिल्म उद्योग विश्व बाजार में उभर रहा है । बर्लिन फिल्म फेस्टिबल, टोरन्टो फिल्म फेस्टिबल, बुसान फिल्म फेस्टिबल जैसे अन्तर्राष्ट्रीय प्लेटफार्म में नेपाल की प्रस्तुति उल्लेखनीय है । पिछली बार मीन बहादुर भामाजी की फीचर फिल्म ‘सम्बाला’ बर्लिन फिल्म फेस्टिबल में मुख्य केटेगरी में चयनित है । इसतरह के कई उदाहरण हंै । विश्व बाजार में नेपाली फिल्मों की जो भी स्थिति है, वह सिर्फ निर्माता और निर्देशकों के व्यक्तिगत पहल में हुआ है । इसमें चलचित्र विकास बोर्ड की कोई भूमिका नहीं है । नेपाल का फिल्म उद्योग विश्व बाजार में आगे बढ़ने के लिए जो संघर्ष कर रहा है, उसमें चलचित्र विकास बोर्ड की भी विशेष भूमिका होनी चाहिए ।



About Author

यह भी पढें   चलचित्र पत्रकारिता दिवस के अवसर पर सम्मान तथा पुरस्कार
आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading...
%d bloggers like this: