सडे समाज की शल्यक्रिया साहित्य से सम्भव

नेपाली साहित्य के सुप्रसिद्ध हास्यव्यंग्यकार, त्रि.वि. के एक अवकाश प्राप्त प्रोफेसर, पचास से अधिक छद्म नामों से साहित्य रचना करने वाले, सौ से अधिक पुस्तकों के रचयिता, हास्य समाज नेपाल के अध्यक्ष और अन्तर्रर्ाा्रीय पेन चैप्टर नेपाल के अध्यक्ष जो हर साल ‘आलू पार्टर्ीीके बहाने हास्य-व्यंग्य लेखकों की महफिल सजाते हैं और जिन्होंने विदेशों में नेपाली साहित्य का झण्डा ऊँचा रखा, ऐसी शख्शीयत से एक अंतरंग वातचीत हिमालिनी ने की है । उसी वार्ता का सार-संक्षेप पाठकों की खिदमत में पेश हैः
० जन्म कब, कहाँ – किस खानदान को आपने रोशन किया – इस पर कुछ रोशनी डालें, –
-काठमांडू उपत्यका में ललितपुर जिला जाउलाखेल-४ में २५ आषाढÞ २००३ वि.सं. मैं मैंने पहली बार आँखे खोली । मेरे माता-पिता, जो अब दोनों मरहूम हो चुके हैं, प्रेमकुमार और प्रेमजंग थे । कालू पाण्डे नेपाल के सबसे पहले प्रधानमन्त्री थे । उस समय प्रधानमन्त्री को ‘बडÞा काजी’ कहा जाता था । हमारे बुजर्ुग बताते हैं कि हम उन्हीं कालू पाण्डे और दमोदर पाण्डे के खानदान से ताल्लुक रखते हैं । फिलहाल प्रोफेसरी से रिटायर्ड हूँ ।
० साहित्य के हास्यव्यंग्य विधा को ही आपने क्यों अपनाया – और आपने शुरुआती दौर में क्या-क्या लिखा – छपने के लिए जद्दोजहद तो नहीं करनी पडÞी – जैसे आजकल के कलमबाज दर-दर भटकते हैं –
-बिल्कुल नहीं । हास्यव्यंग्य ही मैंने क्यों चुना, इसके पीछे कोई खास योजना नहीं थी । ललितपुर जिले की ‘युवक’ पत्रिका में वि.सं. २०१८ साल में मेरी पहली हास्यकृति ‘म अग्लो भएँ’ -मैं लम्बा हुआ) छपी थी । उसी तरह मेरा पहला व्यंग्यचित्र -कार्टर्ूू सम्वाद वि.सं. २०२२ में ‘मायालु’ नामक पत्रिका में छपा था । हास्य-व्यंग्य की मेरी पहली किताब
‘ख्याल-ख्याल’ -मजाक) का वि.सं. २०२३ में कौवा प्रकाशन की ओर से छपी थी । मेरे संपादन में पहली हास्यव्यंग्य पत्रिका ‘कलियुग’ वि.सं. २०२७ में प्रकाशित हर्ुइ थी । इस तरह देखते-देखते लोगों ने मुझे जबरन हास्यव्यंग्यकार बना ही दिया । किसीने कहा है- यह फकत आपकी इनायत है, वरना मैं क्या, मेरी हकीकत क्या !
० माना कि व्यंग्य लेखन की आपकी कोई पर्ूव-योजना नहीं थी, फिर भी साहित्य में हास्य-व्यंग्य की क्या महत्ता है, इस पर कुछ कहेंगे – इसकी अहमियत … –
-इस बारे में मैं हिन्दी के प्रसिद्ध हास्यव्यंग्यकार गोपल चतर्ुर्वेदी का कथन उद्धृत करना चाहता हूँ । वे कहते हैं- ‘हास्य किसी भी भाषा में हो जीवन के यथार्थ से परिचय कराता है, श्री पाँडे जी यह पुराण कार्य कर रहे है, उन्हें समस्त शुभकामनाओं सहित । -गोपाल चतर्ुर्वेदी, हास्यव्यंग्यकार, भारत ।
मुझे लगता है, इस कथन में साहित्य में हास्यव्यंग्य का क्या महत्व है, यह खुलासा हुआ है । मेरा मानना है, बीमार समाज का आपरेसन हास्यव्यंग्य ही करता है, अपनी कलम की नोक से ।
० सुना है, आपने विदेशों में भी नेपाली हास्यव्यंग्य, चित्रकला, कार्टर्ूूआदि का परचम फहराया है । जरा इस पहलू पर भी रोशनी डालें, किस-किस मुल्क का दौरा किया –
-अन्तर्रर्ाा्रीय हास्य पत्रिकाओं में मेरी संलग्नता रही है । जैसे- हृयुमर जर्नल अँफ हृयुमर रिर्सच स्टडीज में कंसल्टिङ एडिटर- सन् १९९३ तथा इन्टरनेशल जर्नल आँफ आर्ट एडिटोरियल बोर्ड मेम्बर सन् २००० । इसके अलावा सातवें अन्तर्रर्ाा्रीय हास्य सम्मेलन सिडनी, आस्ट्रेलिया, २०५३ वि.सं., बारहवें अन्तर्रर्ाा्रीय हास्य सम्मेलन- ओसाका, जापान, २०५७, चौधवें अन्तर्रर्ाा्रीय हास्य सम्मेलन, बाल्टिमोरो, इटाली, २०५९ में मुझे सहभागी होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । यह फकत आप लोगों की कद्रदानी है । हस्तकला, चित्रकला और कार्टून की पर््रदर्शनियों में भी मैंने भाग लिया है ।
प्रसिद्ध विदेशी हास्यकारों से भी मिलना-जुलना हुआ । जैसे इटली के डानियल फो-नोबल पुरस्कार विजेता, नेल्सेन हास्य अनुसंनधानकर्ता -अमेरिका), व्यंग्य संपादक जोन लेन्ट -अमेरिका), गोपाल चतर्ुर्वेदी, हास्यव्यंग्यकार -भारत) । इन विद्वान लेखकों के साथ विचार-विमर्श का सुअवसर मिला । नेपाल में हास्य-व्यंग्य विधा में क्या कुछ हो रहा है, उसे बताने का मौका मिला और मुल्कों में साहित्यिक तरक्की देख कर और यहाँ की बदहाली देखते हुए रोना आता है ।
० आपकी रचनाओं में काफी विविधता देखने को मिलती है । जरा हमारे पाठकों को भी बता दें कि किन-किन विषयों में आपकी कलम दौडÞी है – इस विविधता की वजह –
-वर्षों तक भूगोल का मैं प्रोफेसर रहा । इस दौरान भूगोल की किताबें भी लिखी । इसलिए भूगोल लेखक के रूप में भी लोग मुझे पहचानते हैं । किशोर वर्ग के लिए, बच्चों के लिए भी मेरी बहुत सी पुस्तकें प्रकाशित हैं । बाल साहित्य, लोकसाहित्य, वातावरण, शिक्षा शास्त्र, नेपाल परिचय, विश्वपरिचय, जनसंख्या शिक्षा आदि विषयों में मेरी किताबें प्रकाशित हैं । पाँडे पुराण तो प्रसिद्ध ही हैं । हरेक का नाम देना यहाँ मुमकिन न होगा ।
मैं जब कक्षा ८ में पढÞता था, उसी समय से हास्यव्यंग की रचना मैंने शुरु की । नेपाली में सबसे छोटी कविता- ‘हो त -‘ मेरी ही रचना है तो एक गीतिकाव्य भी है । जिसका मञ्चन भी हुआ था । जब जिस चीज की कमी मैंने महसूस की, उसी में कलम चलने को मचल उठी ।
नेपाली कर्ीर्तिमान -नेपाली गिनीज बुक) २०४६ में मैंने प्रकाशित किया । जापान सम्बन्धी आधा दर्जन से ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हैं । पत्रकारिता, भूगोलर्,र् इ. बुक, स्टोरी थेरापी -कथोपचार विधि), पुरानी कहानियों का रिमिक्स, अंग्रेजी भाषा में- रेड क्लीन, रोड राइडर, ल्फडेड जर्ज, ग्रास टि्रमोर, अनएक्सप्रेस्ड आदि विविध विधाओं में पुस्तकें प्रकाशित हैं । कुछ पुरस्कार, सम्मान भी इसके लिए मिले हैं ।
मेरी साहित्यिक यात्राएँ थाइलैंड, फिलिपिंस, जपान -१० बार), कोरिया, स्वीडेन, अस्ट्रेलिया, मलेसिया, चीन, भारत आदि देशों में हर्ुइ हैं । इन यात्राओं से बहुत कुछ सीखा और नेपाल को भी विश्वमञ्च पर प्रस्तुत किया । हास्य लेखकों के लिए एक ‘हासने घर’ की परिकल्पना भी हम लोगों ने की है । देखें वह सपना कब साकार होता है । दो दर्जन पाण्डुलिपियाँ अभी भी तैयार हैं ।
० आपने बहुत कुछ लिखा । भगवान आपको अच्छी सेहत और लम्बी उमर दें । इतना कुछ करने के बाद आप को कैसा लगता है – आपने क्या पाया क्या खोया –
-मुझे लगता है, अभी तक मैंने कुछ नहीं किया । अभी बहुत कुछ करना बांकी है । लगता है, मैं कोरा सफेद कागज हूँ । हाथ में शून्य है और मैं शून्य की ओर बढÞ रहा हूँ ।
० नेक और दरियादिल इन्सान ऐसा ही कहते हैं । ऐसे खुदा के बन्दों में बहुत कुछ करने पर भी अकडÞ बिलकुल नहीं आती । नेपाली साहित्य आपसे बडÞी बडÞी उम्मीदें लगा बैठा है । उम्मीद है आप उसे नाउम्मीद ना करेंगे । नेपाली साहित्यकारों को आप कोई सन्देश देना चाहेंगे –
-साहित्यकारों के लिए मेरा एक मात्र संदेश है कि वे जो कुछ लिखना चाहते हैं, उसे लिख डालें । क्योंकि वक्त मुठ्ठी की रेत की तरह देखते-देखते कब फिसल जाती है, पता ही नहीं चलता । कल करे सो आज कर ।
प्रस्तुतिः मुकुन्द आचार्य

