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भारत से दूर और रूस के करीब होते गोरखा

 


काठमांडू 9 मई

नेपाल के करीब 15,000 गोरखा सैनिक रूस की तरफ से यूक्रेन से युद्ध लड़ रहे हैं. eurasiantimes की एक ताजा रिपोर्ट में यह दावा किया गया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि रूसी सरकार द्वारा आकर्षक पैकेज की घोषणा के बाद आर्मी में शामिल होने वाले गोरखा जवानों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. रूस ने ऐलान किया था कि उनकी तरफ से लड़ने वाले जवानों को 2000 डॉलर (167,020 रुपये) प्रतिमाह सैलरी के साथ-साथ रूस की नागरिकता और तमाम दूसरी सुविधाएं मिलेंगी.
हाल के सालों तक भारतीय सेना, गोरखा जवानों की पसंदीदा हुआ करती थी, लेकिन अब वे इंडियन आर्मी से छिटकर दूसरे ठिकाने तलाश रहे हैं. कई मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि गोरखा सैनिक, अनौपचारिक तौर पर चीन और पाकिस्तान की सेना भी ज्वाइन कर रहे हैं.
गोरखा या गोरखाली नेपाल की एक पहाड़ी जाति है, जिसे लड़ाका भी कहते हैं. गोरखा अपने साहस और वफादारी के लिए पहचाने जाते हैं. शारीरिक और मानसिक तौर पर बहुत मजबूत होते हैं. गोरखा सैनिकों की पहचान उनका एक खास पारंपरिक हथियार खुखरी है. यह करीब 18 इंच की एक तेज धारदार चाकू जैसा है. ऐसी कहावत है कि एक बार खुखरी म्यान से निकल गई तो उसे हर हाल में दुश्मन का खून चाहिए होता है. वरना म्यान में वापस रखने से पहले मालिक को अपना देना होता है.
अंग्रेजों ने साल 1815 में हुई सुगौली संधि के जरिए गोरखा सैनिकों (Gurkha Soldiers) को औपचारिक तौर पर ब्रिटिश फौज में शामिल करना शुरू किया. हालांकि उससे बहुत पहले से गोरखा सैनिक भारत में सेवा देते रहे हैं. ईस्ट इंडिया कंपनी (East India Company) के आने से पहले तमाम रियासतों की फौज में गोरखा तैनाक थे. उदाहरण के तौर पर महाराजा रणजीत सिंह ने गोरखाओं की एक बटालियन बनाई जो 1809 से 1814 तक सिख सेना का अंग थी.
1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम में गोरखा सैनिक अंग्रेजों की तरफ से भारतीय क्रांतिकारियों से लड़े, क्योंकि उस वक्त तक गोरखा, ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन थे. गोरखा ने अंग्रेजों के लिए प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध भी लड़ा और अपनी बहादुरी का लोहा मनवाया.
साल 1947 में जब भारत आजाद हुआ तो उस वक्त कुल 10 गोरखा रेजीमेंट हुआ करती थीं. अंग्रेजों ने गोरखा सैनिकों पर छोड़ दिया कि वह किस तरफ जाएंगे. भारत में रहेंगे या पाकिस्तान के साथ जाएंगे. 10 में से 6 रेजीमेंट ने भारतीय सेना के साथ रहने का फैसला किया. गोरखा सैनिकों के बंटवारे के लिए बाकायदे एक समझौता भी हुआ, जिसे गोरखा सोल्जर पैक्ट 1947 कहा जाता है.
1947 से लगातार गोरखा सैनिकों को भारतीय सेना में जगल मिलती रही और उनकी भर्ती चलती रही. एक और रेजिमेंट का गठन भी हुआ और कुल 7 रेजिमेंट (Gorkha Regiment) बन गई. गोरखा रेजिमेंट का नारा ”जय महाकाली, आयो गोरखाली” का भारतीय सेना की पहचान बन गया. 1965 में भारत-पाकिस्तान की लड़ाई से लेकर कारगिल तक, तमाम महत्वपूर्ण ऑपरेशन में गोरखा सैनिकों ने अहम भूमिका निभाई.

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क्यों भारत से दूर गए गोरखा?
साल 2020 के आसपास जब भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद गहराया तब गोरखा सैनिकों का मुद्दा भी उठा. नेपाल के विदेश मंत्री ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि 1947 की संधि अब प्रासंगिक नहीं रह गई है और इस पर दोबारा सोचने की जरूरत है. बाद में जब भारत सरकार अग्निपथ योजना लेकर आई तब गोरखा सैनिकों का मामला और गहरा गया. नेपाल सरकार ने दो टूक कहा कि वह गोरखा रेजीमेंट के लिए अग्निपथ योजना के तहत सैनिकों की भर्ती नहीं कराएगी, क्योंकि यह 1947 में हुए समझौते का उल्लंघन है.
कभी इंडियन आर्मी की गोरखा रेजीमेंट में 40,000 गोरखा सैनिक हुआ करते थे, जिसमें से 60% नेपाली गोरखा थे. लेकिन हाल के सालों में नेपाली गोरखा सैनिकों की संख्या में तेजी से कमी आई है. अग्निपथ योजना के बाद तो नाममात्र नेपाली गोरखा सैनिकों की भर्ती हुई.

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