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मधेश की राजनीति… सीखना जरूरी : कंचना झा

Madhesh Pradesh
 

क्या कुर्सी की चाहत इतनी होती है कि लोग अपनी नैतिकता भी भूल जाते हैं ? नेपाल की राजनीति को देखकर यही लगता है कि आने वाले समय में जिस तरह की राजनीति यहाँ हो रही है । यहाँ कुछ नहीं होने वाला है । सच कहें तो देश दिन ब दिन पीछे होता जा रहा है कि और इसका एक बहुत बड़ा कारण है अस्थिर सरकार ।

कंचना झा, हिमालिनी अंक मई 2024 । आजकल मीडिया में एक ही बात देखने को मिल रही है वह है मधेश की पार्टी का टूटना । जसपा नेपाल का टूटना केवल उपेन्द्र यादव पर ही प्रश्न नहीं उठाता है, प्रश्न उठाता है मधेश की राजनीति पर, मधेश के नेताओं पर । इसी मधेश ने दिग्गज नेताओं को जन्म दिया है, जिनकी प्रेरणा से आज मधेश के कुछ लोग नेता बनने के लिए राजनीति में आते हैं । उनके द्वारा सिखाई गई, बताई गई बातों का स्मरण करते हैं । लेकिन जब स्वयं पर कार्यान्वयन करने की बात आती है तो… ? आज भी मधेश में गजेन्द्र बाबू को लोग श्रद्धा से याद करते हैं । उनके द्वारा दिखाए गए रास्ते पर चलना चाहते हैं । आते तो सभी हैं उन्हें ही याद कर, लेकिन फिर सत्ता, पद और पावर में इतने लिप्त हो जाते हैं कि, प्रेरणादायक बातें कहाँ खो जाती है पता ही नहीं चलता ।

क्यों तोड़ना आसान है मधेशी पार्टी को ? क्या अब भी इस ओर ध्यान नहीं जाना चाहिए ?

क्यों कोई एमाले को तोड़ नहीं पाया ? क्या एमाले पार्टी से आबद्ध सभी पार्टी हित और अपने कार्यकर्ता या देशहित के बारे में ज्यादा सोचते हैं ? ऐसा कुछ नहीं है । जिन पार्टियों को बड़ी पार्टी का दर्जा दिया गया है उसमें भी अपने–अपने स्वार्थ को देखने वाले हैं । कुर्सी की चाहत सभी में है लेकिन सभी एकजूट हैं । कारण है नेतृत्व पर विश्वास । नेकपा एमाले के केपी शर्मा ओली को उनकी पार्टी के लोग, उनके कार्यकर्ता ‘बा’ कहते हैं । बा यानी पिता । पार्टी के लोग उनपर अटूट विश्वास करते हैं । उसी तरह ओली भी अपने पार्टी कार्यकताओं को प्राथमिकता में रखते हैं । ओली की जो चाहत है, जिस तरह के वो खिलाड़ी हैं, जितनी पारखी उनकी नजर है, इसकी सभी दाद देते हैं कि वो अपनी पार्टी को बांधकर रखने की क्षमता रखते हैं । मधेश के नेताओं ने कभी स्वयं से उपर किसी को देखा ही नहीं । पहली चाहत खुद की करते हैं तो नेतृत्व क्षमता कहाँ से आएगी ? ओली बा जो कह देंगे पूरी एमाले पार्टी उनके आगे नतमस्तक ।
कुछ ऐसा ही कांग्रेस के बारे में भी सुनने को मिलता है । कांग्रेस में भी हर बात पर अलगाव है नेताओं में । हर विषय को लेकर अलग मान्यता है । अलग–अलग गुट है । गगन थापा का एक गुट है । शशांक कोईराला का एक गुट है । बहस वहाँ भी होती है । पद की चाहत वहाँ भी है । अपने पराए वहाँ भी हैं लेकिन लाख मनमुटाव के बावजूद टूटने की नौबत नहीं आती है कारण है नेतृत्व । अध्यक्ष की बातों का सभी मान रखते हैं । उन्होंने जो कह दिया तो कह दिया । हाँ ऐसा भी नहीं है कि वो मनमानी करते हैं । वो सुनते हैं अपने कार्यकर्ताओं की । अपने पार्टी के नेताओं की ताकि समन्वय बना रहे ।
लेकिन मधेशी नेताओं का वही रोना है कि उसने मुझे जगह नहीं दिया । मेरे नाम का सिफारिश नहीं किया । चलो अलग पार्टी बनाते हैं और सरकार में शामिल हो जाते हैं । कुछ नहीं से कुछ तो बेहतर । आज जो उपेन्द्र यादव खुले रूप में कह रहे हैं कि एमाले और कांग्रेस ने मिलकर मेरी पार्टी का विभाजन कर दिया है यह बोलने से पहले उन्होंने यह क्यों नहीं सोचा कि यह अवसर किसने दिया है उन पार्टियों को । आप ही तो जहाँ राह देखी वही चले गए तो आज आपके साथ वहीं हो रहा है । समय परिस्थिति अपने मुताबिक देखी नहीं कि चल पड़े मिलने फिर चाहे अपनों को ही क्यों नहीं छोड़ना पड़े । वैसे इस मानसिकता से भरे पड़े मिलेंगे मधेश के नेता ।
वैसे बात कड़वी है मगर सच है कि ये सभी नेता सोचकर, पढ़कर, या सीखकर नेता नहीं बने हैं । मधेश की राजनीति में प्रायः पत्थर फेंककर लोग नेता बने हैंं । इसलिए राजनीति के ‘र’ तक का इन्हें ज्ञान नहीं है । इन्हें केवल ओर केवल कुर्सी चाहिए । ऐसा नहीं है कि सभी मधेश के नेता ऐसी ही चरित्र के हैं । कुछ अच्छे और साफ सुथरे चरित्र के भी हैं जिन्हें लोग अच्छे से पहचानते भी नहीं हैं । अभी के नेताओं के लिए इतना ही कहा जा सकता है कि इनके जेहन में ये कभी नहीं था कि मुझे नेता बनना है देश की जनता के लिए, या फिर समाज सेवा के लिए । ये तो भला हो मधेश आंदोलन या मधेश के मुद्दे का, जो इन लोगों को मधेश की जनता ने चुना और संसद तक की यात्रा करवाई ।

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कुछ ही दिन पहले लोसपा दो टुकड़ों में बंट गई । और अब जसपा । ऐसा नहीं है कि केवल मधेशी पार्टी में ही एकजूटता नहीं है । यहाँ ही एकमतता नहीं है लोगों में । सभी पार्टियों में मन मुटाव, एक दूसरे से तनाव, एक दूसरे से खींचातानी चलती ही रहती है लेकिन बाहर आने पर वे कभी इस रूप में नहीं दिखाई देते हैं जैसा कि मधेशी पार्टी दिखाई दे जाती हैैं ।
अब प्रश्न यह आता है कि क्या मधेश की राजनीति करने वाले नेता कभी आगे नहीं बढ़ पाएंगे ? क्या इसी तरह बड़ी पार्टियां उनका मजाक बनाती रहेगी ? अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए मधेश के सभी दलों को छोटे–छोटे टुकड़ों में बांटती रहेगी । न जाने कब अक्ल आएगी मधेश के नेताओं को ? वो जानते हैं कि बड़ी पार्टी कहलाने वाली ये पार्टियां चाहती ही नहीं कि मधेश कभी आगे बढ़े । या फिर देश की राजनीति में मधेश अपनी पैठ बनाएं । इसलिए जब–जब अवसर मिलता है ये लोग मधेश के नेता मधेश की पार्टी को टुकड़ों में बांट देते हैं और अपनी राजनीति का पाशा अपनी ही मुठ्ठी में रखते हैं ।
वैसे राजनीति तो इसी को कहते हैं । जब तक सत्ता तक आपकी पहुँच नहीं है आप कुछ नहीं कर सकते हैं । आपको काम करने के लिए पद और पावर की आवश्यकता है । सब खेल पद और पावर का है ।
प्रधानमंत्री प्रचण्ड इस खेल में लगे हैं कि कैसे उनकी कुर्सी बची रहे । इसके लिए कितने तरह के नाटक नौटंकी की जा रही है यह जनता भी देख रही है और कुछ जो कह सकते हैं सच्चाई जानते हैं वो केवल यह कहकर चुप हैं कि राजनीति में यह कोई बड़ी बात नहीं है । जब जिससे फायदा हो, अपनी स्वार्थपूर्ति हो उसी का साथ दें चाहे कल तक आप साथ ही क्यों न रहे हो ।
आम जनता इन नेताओं के कारनामे पर हंसती भी है और रोती भी है कि क्यों हमने इन्हें चुनकर भेजा है ? ये लोग तो आपस में ही एक दूसरे से कुर्सी के लिए लड़ रहे हैं । नेता इतने स्वार्थी हो गए हैं कि अपने आगे कुछ नहीं देख पा रहे हैं । यहाँ कोई नैतिकता, कोई इथिक्स, कोई विधान काम नहीं करती ।

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क्या कुर्सी की चाहत इतनी होती है कि लोग अपनी नैतिकता भी भूल जाते हैं ? नेपाल की राजनीति को देखकर यही लगता है कि आने वाले समय में जिस तरह की राजनीति यहाँ हो रही है । यहाँ कुछ नहीं होने वाला है । सच कहें तो देश दिन ब दिन पीछे होता जा रहा है कि और इसका एक बहुत बड़ा कारण है अस्थिर सरकार ।

बहुत आवश्यकता है मधेश के नेताओं को सीखने की । लेकिन दुर्भाग्य ये ललक भी इनमें नहीं है । नेपाल की राजनीति में क्यों आज भी वीपी कोईराला को याद किया जाता है । उन्होंने सिखाया है कि पार्टी कैसे चलती है ? देश के बारे में भी सोचना है । कोइराला के योगदान को कोई भूल सकता है क्या ? एक बात तो है कि ये लोग सबसे पहले नम्बर पर अपनी पार्टी हित को रखते हंैं । वो देश को देखते हैं ।
एक अच्छे नेता की पहचान क्या ? यही न कि वो सबसे उपर अपने राष्ट्र को देखे । वो देश के लिए मरे । वो जनता के लिए काम करें । नेल्शन मंडेला जो साउथ अफी्रका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने । वो क्या ऐसे ही राष्ट्रपति बन गए । ऐसे ही राजनीति में नहीं चले आए थे । अपने जीवन के २७ वर्ष उन्होंने जेल में बिताएं । वो चाहते तो बाहर आ सकते थे लेकिन उन्होंने देश और जनता के लिए उनकी जो मांग थी उसे पूरा होने के बाद ही वो जेल से निकले । जनता को रंगभेद की नीति से बाहर निकालने के लिए उन्होंने जो किया वह आज भी स्मरणीय है ।

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अच्छा नेता वह जो पहले देश और जनता की सोचे । दूर क्यों जाएं ? भारत की ओर देखें । सीखना है तो भारत के प्रधानमंत्री मोदी से सीखें । जिन्होंने भारत को एक नई उँचाई दी है । देश का नाम दुनिया के कोने–कोेने तक पहुँचाया है । सबसे पहले वो देशहित को देखते हैं । अपनी जनता को कैसे खुश करना है वो बहुत अच्छी तरह से जानते हैं । कहाँ, कब और क्या करने से मेरी जनता खुश होगी इसका ध्यान वो सबसे पहले रखते है । पार्टीहित को ध्यान में रखकर अपनी बातों को सबके समक्ष रखते हैं । सबसे राय सलाह लेते हैं तभी कोई कदम उठाते हैं । अपनी पार्टी को कैसे चलाना है ताकि पार्टी के लोग रुष्ट न हो । इस बात का पूरा ध्यान रखते हैं । इतना ही नहीं पार्टी से आबद्ध लोग भी अपने अध्यक्ष के प्रति बहुत वफादार होते हैं । वो उनकी हर बात को मानते हैं, जहाँ अपनी राय देनी होती है वहाँ देते हैं ।
हमारे यहाँ के नेताओें की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि वो सीखना ही नहीं चाहते हैं । वो केवल अपने स्वार्थपूर्ति के पीछे लगे रहते हैं । जसपा नेपाल के उपेन्द्र यादव अध्यक्ष होते हुए भी उस भूमिका में दक्ष नजर नहीं आते हैं तो उनके साथ काम करने वाले नेता, उनके पाटी के लोग भी अपने अध्यक्ष के प्रति वफादार नहीं है यह साफ नजर आती है । कुर्सी की चाहत सबसे ज्यादा है । किसी भी आधार पर कुर्सी चाहिए । पद और पावर में रहना है । वैसे राजनीति तो इसी को कहते हैं । लेकिन सच्चाई यह है कि इस पर बने रहने के लिए आवश्यक है आपका सीखना । जिसके लिए खुद को मंजना जरूरी है । सीखना जरूरी है ।

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