प्रचण्ड को मधेशी दलों से लगा डर
विनय कुमार, कार्त्तिक २३, काठमाडू ।
एमाओबादी सुप्रिमो प्रचण्ड को पहली बार मधेशबादी पार्टीयों से डर लगा है । जनकपुर में आयोजित २२ दलों की आमसभा को प्रचण्ड व्दारा हुये सम्बोधन से यह जाहिर हुआ है । प्रचण्ड नें मधेशीयों को खुश करने के लिए अपनी पुरी ताकत लगा दी लेकिन अन्दर ही अन्दर उन्हे एक डर भी लग रहा है । डर यह है कि कहीं कांग्रेस और एमाले मधेशी दलों को फोडने का काम न करे । यह काम तब किया जा सकता है जब कि मधेशी दलों को सरकार मे समावेश होने का आमन्त्रण दे दिया जाय जिसमे कि कांग्रेस और एमाले परागंत है । दो तिहाई पुराने के लिए मधेशी दलों को सरकार में आने के लिए किए डिलिङ किया जा सकता है । यदि डिलिङ पोजिटिभ हो जाता है तो २२ दल को भी बिखड जाना निश्चित है और तिसरे पार्टी बनने के बाद प्रचण्ड का नुकसान हो सकता है । इस लिए जनकपुर(बाह्रबिग्घा) में प्रचण्ड नें कहा कि ‘हम आप लोगों के साथ आगे बढे हैं, बीच मझधार में ना छोडिएगा ।’ अगर प्रचण्ड को मधेशवादी दल धोखा भी देता है तो घाटा मधेशियो का भी भुगडतना पडेगा । क्यों की कांग्रेस और एमाले कीसी भी हालत में मधेस के मुद्दा को सम्बोधित नहीं करेगा ।
लेकिन मेरा मानना है की मधेशी पार्टीयों को आत्मनिर्भर बनना चाहिये । क्यों की जब कांग्रेस और एमाले मिलकर मधेशीयों, आदिवासी,जनजाती, दलित और मुस्लिमों के अधिकार से खेल खेलता है तब आकर मधेशी दल माओबादी से मोर्चाबन्दी बनाती है । एक गठबन्धन बना कर आगे बढ्ते है । यदि माओबादी के गठबन्धन से मधेशी दलों को संघियता, राज्यपुर्नसंरचना के मुद्यों पर बल मिलता है तो कभी भी साथ नहीं छोडना चाहिये । दुसरा संविधानसभा के चुनाव के पुर्व तयारी में भी माओबादी–मधेशवादी गठबन्धन का प्रस्ताव माओबादी नें ही किया था । लेकिन मधेशवादी दलों ने उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया । हो सकता है उस समय मिलकर चुनाव लडते तो ऐसी स्थित नहीं बनती । यह भी कहा नहीं जा सकता की माओबादी और मधेशवादी दल अपना स्वार्थ पुरा कर कें अलग होगें ।

