समावेशिता के नाम पर तानाशाही : कंचना झा
कंचना झा, हिमालिनी अंक जुलाई 024 । एकबार फिर जसपा अध्यक्ष उपेन्द्र यादव चर्चा में हैं । चर्चा में होना अच्छी बात है लेकिन चर्चा जब नकारात्मक हो तो समझ लेना चाहिए कि कहीं न कहीं नेतृत्व की क्षमता पर लोग प्रश्न उठा रहे हैं । इन दिनों उपेन्द्र यादव को लेकर सकारात्मक से ज्यादा नकारात्मक चर्चा की जा रही है । अभी उपेन्द्र यादव अपनी पार्टी टूटने की घटना से उबर भी नहीं पाए थे कि एक दूसरी घटना सामने आ गई । एक तो १६ वर्ष के बाद पार्टी का पहला एकता महाधिवेशन किया गया उसमें में भी जिस तरह के निर्णय लिए गए हैं उससे पार्टी के ही लोगों की नाराजगी से उन्हें रूबरू होना पर रहा है ।
वैसे महाधिवेशन की शुरुआत में प्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं को इस तरह के निर्णय होने की भनक नहीं थी । अचानक से सब कुछ किया गया ताकि कोई आवाज नहीं उठा सके । वैसे तो अध्यक्ष उपेन्द्र यादव निर्विरोध एक बार फिर अध्यक्ष चुने गए । और बाकी पदाधिकारियों तथा सदस्यों के चयन की जिम्मेदारी भी अध्यक्ष उपेन्द्र यादव को ही सौंपा गया । बस यही बात, यही निर्णय पार्टी के लोगों को पसंद नहीं आई । राजनीतिक विज्ञों ने भी इस बात की चर्चा की कि –यदि अध्यक्ष ने सारे अधिकार अपने ही पास रख लिए हैं, अगर एक ही के निर्णय से सबकुछ होने वाला है तो एक सक्षम दल की आवश्यकता क्या है ?
एक नेता के अनुसार महाधिवेशन की तारीख तय हो जाने के बाद भी जो पार्टी टूटी इससे यादव बाहर नहीं निकल पा रहे हैं । अशोक राई ६ सदस्यों के साथ जसपा नेपाल से किनारा कर जिस तरह से सरकार में शामिल हो हैं यह बात उन्हें हजम नहीं हो रहा है । नए लोगों पर बहुत जल्दी भरोसा नहीं करना चाह रहे हैं या फिर उन्हें डर है कि अगर नए चेहरे को जिम्मेदार पद नहीं दिया गया तो वो भी पार्टी छोड़ कर जा सकते हैं । शायद इसी उधेड़बुन में उन्होंने सारे निर्णय अपने पास रख लिए हैं ।
इस महाधिवेशन से पदाधिकारी सहित २०१ सदस्यीय केन्द्रीय कार्य समिति चयन करने की कार्यसूची थी । अध्यक्ष का चुनाव तो बिना किसी अवरोध के हो गया लेकिन बाकी पदों पर एक से ज्यादा लोगों ने अपनी उम्मीदवारी दे दी ।
गुरुवार को मतदान तालिका सार्वजनिक की गई । उम्मीदवारों ने मत को गिनना शुरु भी किया । लेकिन इसी बीच गुरुवार की ही सुबह ८ बजे उपेन्द्र यादव ने निर्वतमान कार्यकारिणी समिति की बैठक रख ली । उपेन्द्र यादव के साथ ही इस बैठक में राजकिशोर यादव, लालबाबु राउत, रकम चेम्जोङ, शिवलाल थापा, मृगेन्द्र सिंह यादव, गोबिन्द चौधरी, मनिष सुमन, विजयकुमार यादव शामिल हुए और यह बैठक लगभग तीन बजे तक चली ।
इस बैठक से यह अनपेक्षित निर्णय हुआ कि बाकी पदाधिकारी और केन्द्रीय समिति बनाने का अधिकार उपेन्द्र यादव की दी जाए । लेकिन जैसे ही इस निर्णय का पता प्रतिनिधियों को लगा कि यह जिम्मेदारी अध्यक्ष यादव को दिया गया है तो सभी प्रतिनिधि नाराज हो गए और आक्रोशित होते हुए नारेबाजी करने लगे । कार्यकर्ताओं ने नारेबाजी करते हुए कहा कि सम्मेलन में प्रतिनिधियों का नेता चुनने का लोकतांत्रिक अधिकार छीन लिया गया है ।
इससे भी ज्यादा कार्यकर्ताओं तब बुरा लगा जब बाकी पदाधिकारियों और नेताओं के चयन का अधिकारी स्वयं लेने के बाद उपेन्द्र यादव ने महाधिवेशन की प्रक्रिया को ही स्थगित कर दिया । उनके इस कारनामें से जसपा के कार्यकर्ताओं में बहुत ज्यादा नाराजगी दिखी ।
एक असंतुष्ट नेता ने खुलकर कहा कि ‘ अध्यक्ष के एकमात्र निर्णय से ही यदि नया नेतृत्व का चयन होना था तो इतना नाटक और तामझाम करना जरुरी था क्या ? अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि– अगर यही सब करना था तो इतनी फिजुल खर्ची क्यों की ? जो जिम्मेदारी उन्होंने महाधिवेशन करने के बाद की, वो तो पहले भी कर सकते थे । ये झूठमूठ का दिखावा क्यों ? उन्होंने बताया कि महाधिवेशन से नेता चुने जाने का जो अधिकार था उसे छीन लिया गया है इसका एक कारण महाधिवेशन मतदान से जो नतीजे आने वाले थे । उससे अध्यक्ष डर गए हैं । नेता ने बताया कि ‘उम्मीदवारी दर्ता की अवस्था को देखते हुए कि पार्टी को जिन लोगों की जरुरत है उनमें से बहुत से छूट जाते । नेता कहते हैं– ‘जब खुली प्रतियोगिता होती है तो सम्मेलन स्थगित करना पड़ता है क्योंकि गैर–आरक्षित गैर–सदस्य जीत नहीं पाते ।’
उनके अनुसार महाधिवेशन में १३ सौ में से ७ सौ प्रतिनिधि यादव समुदाय से हैं । ‘प्रतिनिधि में यादवों का बहुमत है और अधिकांश पद में यादव उम्मीदवार होने के कारण नतीजा के बारे में पूर्वानुमान करना सहज था । ‘ऐसे समय में मतदान करने का मतलब है अन्य समुदाय के नेता किनारे हो जाते जिसकी प्रबल संभावना थी । इसलिए अध्यक्ष ने यह निर्णय लिया और इसे मतदान प्रक्रिया में जाने ही नहीं दिया ।’
पार्टी के भीतर भी और पार्टी के बाहर भी लोग प्रश्न कर रहे हैं कि उपेन्द्र यादव ने इस तरह का एकल निर्णय क्यों लिया ? या जिससे उनकी साख घटती हो इस तरह का कदम क्यों उठाया ? इस तरह के प्रश्न के बाद कुछ लोगों से बात करने पर उनका जबाब कुछ इस तरह का आया था ।
सांसद रेखा यादव (जसपा) का कहना है कि– प्रथम राष्ट्रीय महाधिवेशन से सक्षम, अनुभवी नेतृत्वकर्ताओं का चयन किया जाए इस उद्देश्य को देखते हुए महाधिवेशन में चुनाव नहीं किया गया है । अध्यक्ष पद के लिए उपेन्द्र यादव की एकल उम्मीदवारी थी जिसकी वजह से यादव निर्विरोध अध्यक्ष चुने गए । वैसे ये पहली बार नहीं हुआ है इससे पहले भी पार्टी स्थापना के पश्चात् तत्कालीन मधेशी जन अधिकार फोरम के २०६५ के महाधिवेशन में भी उपेन्द्र यादव जी निर्विरोध अध्यक्ष पद में चयनित हुए थे । इसलिए इसबार भी उनका अध्यक्ष पद के लिए चुना जाना सही कदम है ।
गुरुवार की सुबह ८ बजे निर्वतमान कार्यकारिणी समिति की बैठक से ही यह निर्णय आया कि बाकी पदाधिकारी और केन्द्रीय समिति बनाने का अधिकार उपेन्द्र यादव को ही दी जाए । यह निर्णय केवल उपेन्द्र यादव की नहीं वरन पूरी बैठक ने मिल जुल कर की थी । उन्होंने भी इस बात में सहमति जताई कि मतदान की प्रक्रिया से नेता व्यवस्थापन में ज्यादा समस्या आती । इसे देखते हुए ही चुनाव में नहीं जाकर अध्यक्ष को ही पदाधिकारियों को चुुनने का सर्वसहमत निर्णय किया गया । उम्मीदवारी दर्ता की अवस्था को देखते हुए कि पार्टी को जिन लोगों की जरुरत है उनमें से बहुत से छूट जाते । ऐसे समय में मतदान करने का मतलब है अन्य समुदाय के नेता किनारे हो जाते जिसकी प्रबल सम्भावना थी । इसलिए अध्यक्ष ने यह निर्णय लिया और इसे मतदान प्रक्रिया में जाने ही नहीं दिया ।
अध्यक्ष ने इस बात का भी ध्यान रखा है कि एक अच्छी टीम को चलाने के लिए केवल अच्छे अध्यक्ष के होने से नहीं होता है पूरी टीम ही अच्छी होनी चाहिए ।
जनता ने जो इतना विश्वास किया है और जो जिम्मेदारी दी है उसे पूरा करना है । यह बहुत ही चुनौतिपूर्ण काम है लेकिन सभी को समावेश कर, सभी को साथ लेकर आगे बढ़ने की प्रतिबद्धता सभी महाधिवेशन प्रतिनिधियों में देखी गई । सभी जात जाति और भूगोल के आधार में समावेशिता हो, पार्टी के मुख्य उद्देश्य को देखते हुए सम्पूर्ण महाधिवेशन प्रतिनिधियों ने अपनी–अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली ।
उन्होंने अपनी बात को रखते हुए कहा कि जनता समाजवादी पार्टी नेपाल की मैं स्वयं राजनीति समिति सदस्य हूँ और इस महाधिवेशन में मैंने भी अपनी उम्मीदवारी केन्द्रीय उपाध्यक्ष पद के लिए दिया था । लेकिन मेरी भी यही राय है कि समावेशिता को लेकर आगे बढ़ना होगा । लिंग,जात और भूगोल के आधार में सभी का समावेशीकरण करना होगा । पार्टी के प्रति वफादार, निष्ठावान भी होना चाहिए । अध्यक्ष ने सभी की धारणाओं का क्रद करते हुए आगे बढ़ना जरुरी समझा । अध्यक्ष का कहना था कि जनता द्वारा किए गए विश्वास पर हमें खरा उतरना होगा । हमें अपनी जिम्मेदारी को सफलता के साथ पूरा करना है । यह कोई एक जात जाति, विशेष पर आधारित नहीं है । यह सबकी पार्टी है ।
इसी तरह महाधिवेशन को बहुत ही नजदीक से देखने वाले सञ्चारकर्मी शिव अधिकारी यदुवंशी बताया कि पदाधिकारी चयन की जिम्मेदारी जसपा नेपाल के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव को दिए जाने को लेकर किसी तरह की कोई टिप्पणी नहीं होनी चाहिए क्योंकि यह केवल उनका निर्णय नहीं था वरन बहुमत प्रतिनिधि सदस्यों द्वारा लिया गया था ।
उनके अनुसार पार्टी महाधिवेशन सदन की तरह ही होती है । बहुमत सदस्य से जो निर्णय किया जाता है वही सर्वोपरी होती है । और महाधिवेशन प्रणाली में भी बहुमत प्रतिनिधि सदस्य जो आदेश देते हैं वो पार्टी पंक्ति के सभी नेता तथा कार्यकर्ता सहज रूप से स्वीकार करते हैं । जसपा नेपाल के महाधिवेशन में निर्वाचन प्रणाली को यदि आगे बढ़ाई जाती तो पार्टी संचालन के लिए महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों के छुटने की संभावना थी । इस संभावना को देखते हुए बहुमत प्रतिनिधि ने इस तरह निर्णय लिया है ।
अध्यक्ष यादव ने भी इसी कारण से बहुमत प्रतिनिधि के निर्णय को स्वीकार किया होगा । यह बात सभी को समझना जरुरी है । आगे उन्होंने कहा कि एक और महत्वपूर्ण बात, पहले एकता महाधिवेशन से उपेन्द्र यादव को ही अध्यक्ष के रुप में चुना जाना यह दिखाता है कि वर्तमान परिस्थति में भी पार्टी को उनकी आवश्यकता है । इससे यह संदेश भी जाता है कि पार्टी एकजुट है ।
इसी तरह समाजवादी युवा संघ की केन्द्रीय सचिव स्मृति मिश्रा ने बताया कि समाज के लिए अच्छा काम करने के लिए पूरी टीम का अच्छा होना जरुरी है । कुछ समस्या ऐसी थी जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था । पार्टी के हित को देखते हुए सम्पूर्ण महाधिवेशन प्रतिनिधियों ने अपनी–अपनी उम्मीदवारी सोच समझकर वापस ले ली है ।
मैं औरों की क्या बात कहूँ । अपनी ही बात कहती हूँ, समाजवादी युवा संघ की केन्द्रीय सचिव हूँ मैं, इस महाधिवेशन में मैंने अपनी उम्मीदवारी केन्द्रीय सदस्य के लिए दिया था । बात आती है बाजार की जहाँ विभिन्न तरह का अफवाह फैला हुआ है कि उपेन्द्र यादव तानाशाह के रूप में सामने आए लेकिन यह सरासर गलत अफवाह है । यदि वो तानाशाही हिसाब से पेश आते तो वो सीधा अपना फैसला सुनाते लेकिन उन्होंने चुनावी प्रक्रिया को अपनाया । जब सभी की उम्मीदवारी दर्ता हो गई । उसके बाद बैठक कर, बहुत सोच विचार कर उन्होंने समावेशिता के हिसाब से पार्टी को ले जाने की बात कही । यानी बहुत सोच समझकर यह निर्णय लिया गया कि चुनाव नहीं कर अध्यक्ष ही निर्णय करें । मिश्रा ने कहा कि अध्यक्ष यादव के अनुसार लिंग अथवा जात जाति के आधार में सभी का समावेशीकरण हो यह उनकी धारणा है । उनकी एक ही धारणा है कि यह पार्टी सबकी पार्टी है । सभी जात जाति के लोगों का हम स्वागत करते हैं ।
पार्टी के कार्यकर्ता या पार्टी से आबद्ध लोग अपनी पार्टी के बारे में चाहे जो भी कहे । यह एक अच्छाी बात है कि अपनी पार्टी के प्रति आप वफादार है उसकी अच्छाई को देखते हैं । लेकिन इस सच्चाई से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता है कि राजनीति विज्ञ या राजनीति समझने वाले यादव के निर्णय को सही नहीं कह रहे हैं ।
पार्टी में कितनी एकता है ? टीम कितनी अच्छी और सशक्त है यह तो आने वाले दिनों में दिखाई देगा । या फिर जब चुनाव हो तो पता चले । फिलहाल राजनीतिक बाजार में जसपा को लेकर जिस तरह की बातें सामने आ रही है इससे यह साफ नजर आ रहा है कि यादव अपनी मनमानी कर रहे हैं ।
उपेन्द्र यादव ने मतदान रोककर स्वयं मनोनयन करने का रास्ता निकाला ताकि वो अपने अनुकूल पार्टी बना सकें । क्योंकि अभी तक उपेन्द्र की जो इच्छा होती है इसके विपरीत जसपा में किसी ने भी जिम्मेदारी नहीं प्राप्त की है । उनका पूरा तानाशाही पहले भी चलता था और अब भी वो यही चाहते हैं । कुछ लोग जिन्हें वो आगे लाना चाहते हैं वो लोग चुनाव से नहीं आ पाते और शायद जिन्हें वो नहीं चाहते वो आ जाते तो पार्टी में सामजस्य बनाना मुश्किल हो जाता ।
लोकतंत्र का अर्थ है आवधिक निर्वाचन । यही एक प्रणाली है जिसके तहत जनता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है । आपके महाधिवेशन द्वारा यदि प्रतिनिधियों या सदस्यों का चुनाव मतदान से होता तो बेहतर था । चाहे जो कोई भी आए आप सहर्ष स्वीकार करें इसे । आप अपने अनुकूल ही पार्टी के लोगों को रखेंगे तब तो विरोध की बात ही नहीं आएगी । पार्टी है तो लोग हैं । लोग हैं तो आलोचना समालोचना तो होगी ही । इसके लिए पदाधिकारी या फिर सदस्य का चुनाव मतदान प्रक्रिया से नहीं कर समावेशिता के नाम अपनी इच्छानुसार व्यक्ति का चुनाव करना सही निर्णय नहीं है । मतदान लोकतांत्रिक व्यवस्था है तो फिर इस तरह का निर्णय क्यों ? आप समावेशिता के नाम पर लोकतंत्र का जो विधान है उसे बदलने की तैयारी कर रहे हैं इसका हर्जाना हो सकता है आने वाले समय में आपको दिखाई देगा । आप मतदान का अधिकार छीन रहे हैं तो यह देश, जनता, विज्ञ या फिर आपकी अपनी ही पार्टी के लोगों के द्वारा जो विरोध किया जा रहा है, यह करना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है ।

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