अस्थिरता की राह पर बंगलादेश : कंचना झा
काठमांडू, सावन २२ –
कंचना झा – आखिरकार बंगलादेश की प्रधानमंत्री शेख हसिना को इस्तीफा देना पड़ा । इतना ही नहीं उन्हें अपना देश छोड़कर भागना पड़ा है । वो अभी किस देश में रहेंगी ? इस बात का पता नहीं चल पाया है । विद्यार्थियों द्वारा लगभग डेढ़ महीने से आंदोलन किया जा रहा था । आंदोलन में कुछ मांग की जा रही थी आरक्षण को लेकर । जिसे देश की प्रधानमंत्री हसिना बहुत ही हल्के तरीके से ले रही थी ।
युवाओं के बारे में हमेशा से एक बात कही जाती रही है कि इतिहास को रचने का दम रखते हैं युवा । वो चाहे तो ताज और तक्ख बदल दें । नया इतिहास रच दें । जनता जब आक्रोश में आ जाती है तो वो किसी की नहीं सुनती है । ऐसा ही कुछ बंगला देश के साथ हुआ है ।
अक्सर होता क्या आया है कि पद पर बैठे लोग कुछ गलतफहमी का शिकार हो जाते हैं । उन्हें लगने लगता है कि वो जो कर रहे हैं ठीक कर रहे हैं । शेख हसिना से भी यही गलती हुई । उन्होंने अपने आप को जनता से अलग कर सोचना शुरु कर दिया । लेकिन वो भूल गई कि आप जितने बड़े पद पर बैठे हैं आपको उतना ही संभलकर बोलना पड़ता है क्योंकि आप किसी चौक चौरोहे पर नहीं एक कुर्सी पर बैठे व्यक्ति है जिसपर सभी की नजर टीकी रहती है ।
पद पर बैठे शेख हसिना यह नहीं समझ पाई कि जिन छात्रों को वह आतंकवादी और देश द्रोही की संज्ञा दे रही थीं वो उनके ही देश के बच्चें थे और अपने अधिकार के लिए लड़ रहे थे । कहते हैं मांगने से अधिकार नहीं मिले तो छीन लेनी चाहिए । और छात्रों का आंदोलन इस मोड़ पर आ चुका था कि उन्हें अपना अधिकार छीनना था देश की राजनीति से । उन्हें राजनीति से कोई मतलब नहीं था वो केवल इतना कह रहे थे कि स्वतंत्रता सेनानी को जो आरक्षण दिया जा रहा है अब जाकर उसे समाप्त कर देना चाहिए क्योंकि आने वाले समय को लेकर विद्यार्थी बहुत परेशान थे । वो अपने देश में रहकर काम करना चाहते थे लेकिन अरसे से चले आ रहे आरक्षण के कारण उन्हें बहुत कम अवसर मिल रहे थे । वो ऊब चुके थे आरक्षण को लेकर । वो चाहते थे कि प्रधानमंत्री उनकी बातों, उनकी मांग पर गोर फरमाएं ताकि आने वाले समय में विद्यार्थी को इस तरह के कष्ट का सामना नहीं करना पड़े ।
आखिर विद्यार्थियों ने क्यों किया आंदोलन ?
बांग्लादेश में स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों के लिए सरकारी नौकरियों में अभी तक ३० प्रतिशत आरक्षण दिया गया था। इसी आरक्षण के विरोध में पिछले डेढ़ महीने से बांग्लादेश में प्रदर्शन हो रहे थे । आज के बच्चें इस बात से वाकीफ है कि रोजगार दिन प्रतिदन कम होते जा रहे हैं । एक तो कम हैं ही और दूसरा कुछ लोग आरक्षण के नाम पर रोजगार अपने हाथ में ले लेते हैं । छात्रों का कहना था कि आरक्षण को समाप्त किया जाए । सुप्रीम कोर्ट द्वारा २१जुलाई को आए फैसले के बाद ऐसा माना जा रहा था कि विरोध प्रदर्शन खत्म हो जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ । आंदोलन ने और भी उग्र रुप ले लिया । छात्र लगातार शेख हसिना से पद छोड़ने की मांग कर रहे थे और हारकर उन्हें इस्तीफा देना पड़ा । इतना ही नहीं अपने देश को छोड़कर भागना पड़ा । ये होती है जनता । वो जब तक चाहे आपको पलको पर बिठा कर रखती है लेकिन जब आप उसके मुताबिक काम नहीं करते हैं तो आपको गद्दी तो गद्दी देश छोड़कर भागना पड़ता है ।
शेख हसिना के आवास छोड़ने के बाद जिन दृश्यों को दिखाया गया तो उसकी तुलना श्रीलंका से की जाने लगी । श्रीलंका की जनता ने भी इसी तरह का प्रदर्शन किया था । राष्ट्रपति के आवास पर जाकर उनके सभी सामानों को तहस नहस कर दिया था । कुछ इस तरह का ही दृश्य देखा गया बंगलादेश में भी । प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री आवास पर कब्जा जमा लिया था और उनके आवास में रखे सभी सामान को लूट लिया । उनके कमरे में लगे साफे और कुर्सी पर लोग जा बैठे । यहाँ तक कि उनके पलंग पर बैठकर और सोते हुए तस्वीरें भी ली । देश के हालात पर सेना प्रमुख ने बयान जारी किया और प्रदर्शनकारियों से संयम बरतने की अपील की ।
कुछ दिन पहले विद्यार्थी आन्दोलन शांत हुआ था । क्योंकि पिछले महीने यहां की सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरियों में आरक्षण की अधिकांश व्यवस्था को खत्म कर दिया था । सबकुछ ठीक ठाक ही चल रहा था कि अचानक से रविवार को सरकारी नौकरियों में आरक्षण के मुद्दे को लेकर शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन एक बार फिर उग्र हो गया । इस हिंसक आंदोलन के चलते ४०० से ज्यादा लोगों की मौत हो गई । तानाशाही की हद तब हो गई जब देश में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गई, देश में कर्फ्यू लगा दिया गया । सरकार ने तीन दिन की सार्वजनिक छुट्टी घोषित कर दी । इन सब के बावजूद हालात काबू में नहीं आया । अब तक आन्दोलन में लगभग ४०० लोगों की जान जा चुकी थी और सैकड़ों घायल हो चुके हैं । पुलिस ने हजारों प्रदर्शनकारियों को तितर–बितर करने के लिए आंसू गैस और रबर की गोलियां चलाईं, जिसके चलते ये मौतें हुई ।
रविवार शाम से पूरे देश में कर्फ्यू लगा दिया गया, रेलवे ने अपनी सेवाएं निलंबित कर दीं और देश का वस्त्र उद्योग बंद कर दिया गया । सरकार ने रविवार को शाम छह बजे से अनिश्चितकालीन राष्ट्रव्यापी कर्फ्यू की घोषणा की और सोमवार से तीन दिन की सार्वजनिक छुट्टी की भी घोषणा की।
मोबाइल ऑपरेटरों ने बताया कि हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान दूसरी बार सरकार ने हाई–स्पीड इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी हैं ।
कोई भी आंदोलन अचानक से नहीं बढ़ता है । यह आंदोलन एक दिन में हिंसात्मक रुप में नहीं आया था । इसके पीछे बुहत से कारण रहे हैं । जब यह आंदोलन जून महीने के अंत में शुरू हुआ था तब यह हिंसक नहीं था । मामला तब बढ़ गया जब इन विरोध प्रदर्शनों में हजारों लोग सड़क पर उतर आए । और १५ जुलाई को ढ़ाका विश्वविद्यालय में छात्रों की पुलिस और सत्तारूढ़ अवामी लीग समर्थित छात्र संगठन से झड़प हो गई । इस घटना में कम से कम १०० लोग घायल हो गए ।
सरकारी नौकरी में सभी आना चाहते हैं तो ऐसे में बंगलादेश के विद्यार्थी अगर यह चाहते थे तो कोई बहुत बड़ी बात भी नहीं थी । और आरक्षण कोई आज ही नहीं १९७२ की यह बात थी जब इस व्यवस्था के तहत स्वतंत्रता सेनानियों के परिजनों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण का प्रावधान था । प्रदर्शनकारी छात्रों की यह चाहत थी कि इसकी जगह योग्यता आधारित व्यवस्था लागू हो । प्रदर्शनकारी इस व्यवस्था को खत्म करने की मांग कर रहे थे, उनका कहना है कि यह भेदभावपूर्ण है और प्रधानमंत्री शेख हसीना की अवामी लीग पार्टी के समर्थकों के फायदे के लिए है ।
१९७२ से जारी इस आरक्षण व्यवस्था को २०१८ में सरकार ने समाप्त कर दिया था । जून में उच्च न्यायालय ने सरकारी नौकरियों के लिए आरक्षण प्रणाली को फिर से बहाल कर दिया । कोर्ट ने आरक्षण की व्यवस्था को खत्म करने के फैसले को भी गैर कानूनी बताया था । कोर्ट के आदेश के बाद देश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए । लेकिन यह भी बात सत्य है कि शेख हसीना सरकार ने उच्च न्यायालय के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी । सरकार की अपील के बाद सर्वोच्च अदालत ने उच्च न्यायालय के आदेश को निलंबित कर दिया और मामले की सुनवाई के लिए ७ अगस्त की तारीख तय कर दी । लेकिन इससे पहले ही आंदोलन अपने चरम पर पहुँच गया । शेख हसिना का कहना था कि अदालती कार्यवाही का वह इंतजार कर रही हैं अभी वह किसी भी तरह के मांगों को पूरा नहीं कर सकती हैं । उनके इस इनकार के बाद ही आंदोलन ने एक नया रुख ले लिया । आंदोलन और तेज कर दिया गया । प्रधानमंत्री ने प्रदर्शनकारियों को ‘रजाकार’ की संज्ञा दी । दरअसल, बांग्लादेश के संदर्भ में रजाकार उन्हें कहा जाता है जिन पर १९७१ में देश के साथ विश्वासघात करके पाकिस्तानी सेना का साथ देने के आरोप लगा था । यह बात विद्यार्थियों को पसंद नहीं आई । और अपने विरोध और आंदोलन से देश तक्खा पलट दिया ।
अब इसी आंदोलन को, या फिर नेपाल के युवाओं या फिर जनता से जोड़ती हूँ तो ऐसा लगता है कि हमारे यहाँ की जनता क्यों किसी भी बात को लेकर उग्र नहीं होती । हम सबकुछ इतनी आसानी से क्यों स्वीकार कर लेते हैं । कितनी अस्थिरता है हमारे देश में । प्रत्येक वर्ष कुर्सी बदलती है । बहुत बार तो लोग हंसकर पूछते हैं कि देश के प्रधानमंत्री कौन हैं ? यहाँ तक कि बच्चों को भी नहीं मालूम रहता है कि देश के प्रधानमंत्री कौन हैं ? क्योंकि जबतक उन्हें पढ़ाया जाता है तबतक एक नाम रहता है और परीक्षा आते आते प्रधानमंत्री बदल जाते हैं । बेचारे बच्चे समझ ही नहीं पाते । लेकिन हम चुपचाप सब तमाशा देखते रहते हैं ।
हाँ यह सही है कि हम प्रकृति से नहीं लड़ सकते । लेकिन हम अपनी सुरक्षा के इंतजाम कर सकते हैं । सरकार कुछ कदम उठा सकती है लेकिन वो खामोश रहती हैं क्योंकि उसे जनता के मरने जीने से कोई फर्क नहीं पड़ता है । वो अपनी कुर्सी बचाने में लगी है । सबसे आश्चर्य तो तब लगा जब कुछ ही दिन पहले त्रिशुली नदी में दो दो बसें गिर गई । कितने परिवार जनों ने अपने लोगों को खोया लेकिन सरकार की ओर से कोई शांत्वना या संवेदना के शब्द नहीं आए । तब कांग्रेस और एमाले गठबंधन में लगी थी और प्रचंड अपनी कुर्सी बचाने में लगे थे । जनता के लिए उनके पास समय ही नहीं है ।
अभी बरसात के महीने में पूरे देश में तबाही है बाढ़ और भूस्खलन से । जनता अपने तरीके से जो करना होता है करती है लेकिन सरकार की ओर से किसी तरह की कोई मदद नहीं मिलती है ।
अब आवश्यकता इस बात की है कि नेपाल के नेता भी इसका ध्यान रखें कि जनता क्या चाहती है ? जनता की ईच्छा का ध्यान रखें क्योंकि ये जनता ही है जो आपको चुनकर लाती है आप इनके लिए अगर कुछ नहीं करते हैं या अपनी मनमानी करते रहे तो वह दिन दूर नहीं कि आपको भी यह दिन देखना पड़ सकता है । अगर अफगानिस्तान, श्रीलंका और बंगलादेश की जनता यह काम कर सकती है, नेताओं को सबक सिखा सकती है तो यहाँ की जनता भी कर सकती है तो आवश्यकता है सावधानी बरतने की । जिस दिन जनता जाग गई उस दिन आपको ऐसा पटकेगी कि आप कहीं के नहीं रह पाएंगे । आज शेख हसिना है तो कल आप भी हो सकते हैं ।


