Sat. Jun 6th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

वृक्षों को राखी बांधकर की पहाड़ की वीरांगनाओं ने पर्यावरण की रक्षा !

 

पर्यावरण दिवस 5 जून पर विशेष

डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट
प्राकृतिक धरोहर में सम्रद्ध उत्तराखंड के जल,जंगल और जमीन को बचाने के लिए उत्तराखंड के लोग सदा आगे रहे है।हरेभरे वृक्षों को पैसो के लालच में काटने वाले वन माफियाओं से टकराने में यहां संघर्षरत रहे लोगो ने कभी अपने प्राणों की भी परवाह नही की।पुरुषों के साथ -साथ महिलाओं ने भी वृक्षों को राखी बांधकर और वर्षो पर आरी और कुल्हाड़ी चलने के समय वृक्षों से चिपक कर वृक्षों को कटने से बचाया है। उत्तराखंड में कुछ लोगो ने जुनून की हद तक पर्यावरण बचाने के लिए संघर्ष किया है।इन संघर्षशील विभूतियों में चाहे सुंदर लाल बहुगुणा हो या फिर विश्वेशर दत्त सकलानी अथवा गौरा देवी जिन्हें आज भी उत्तराखण्ड में पर्यावरण का मसीहा कहा जाता है। विश्वेशर दत्त सकलानी जीवन पर्यन्त उत्तराखंड में अपने पैतृक गांव टिहरी के पुजारा में रहे।उनमें वृक्ष लगाने की धुन सवार थी।लगता था जैसे वृक्ष ही उनका परिवार हो।तभी तो उनके जाने के बाद से इंसान ही नही वे पेड़ पौधे भी आजतक गमजदा है ,जिनके लिए सकलानी जीवन पर्यन्त जीते रहे।क्या कोई इंसान कभी वृक्ष व वनसम्पदा से इतना लगाव और प्यार कर सकता है।जितना सकलानी ने कर दिखाया।वह एक ऐसा हरियाली का नायक था ,जिन्होंने अपना पूरा जीवन धरती मां को हरा भरा रखने के लिए समर्पित कर दिया| वह एक ऐसा तपस्वी था जिसकी मेहनत गढ़वाल की एक पूरी घाटी को हरियाली में बदल चुकी है। विशेश्वर दत्त सकलानी को वनऋषि भी कहा जाता था।उन्होंने मात्र 8 साल की उम्र से पेड़ लगाने शुरू किए थे और जीवन के अंत तक 50 लाख से अधिक पेड़ लगाकर दुनिया को पर्यावरण के प्रति एक रिकार्डमय सन्देश दिया । इन्हें पहाड़ का मांझी कहे तो अतिशयोक्ति नही होगी।जिसने अपनी मेहनत से विशाल जंगल तैयार कर दिया है।जिससे आने वाली पीढ़िया अपने को खुशहाल महसूस करेंगी।
विश्वेश्वर दत्त सकलानी ने अपनी उम्र के अंतिम पड़ाव में भी आंखों की रोशनीचली जाने के बावजूद पेड़ लगाना जारी रखा।पेड़ के पुजारी विश्वेश्वर द्त्त सकलानी का जन्म 2 जून 1922 को हुआ था।
बचपन से विश्वेश्वर दत्त को पेड़ लगाने का शौक था और वे अपने दादा के साथ जंगलों में पेड लगाने जाते रहते थे।उनका जीवन माउन्टेंन मैन दशरथ मांझी की तरह रहा है , जिन्होंने एक सड़क के लिए पूरा पहाड़ खोद दिया था। दशरथ मांझी की तरह विश्वेश्वर दत्त सकलानी के जिन्दगी में भी अहम बदलाव तब आया जब उनकी पत्नी शारदा देवी का देहांत सन 1948 को हो गया। इस घटना के बाद उनका लगाव वृक्षों और जंगलों की तरफ हो गया ।अब उनके जीवन का एक ही उद्देश्य बन गया था केवल वृक्षारोपण करना ओर उन्ही के लिए जीना।सकलानी ने धरती मां के लिए अपनी आंखो की रोशनी गंवा दी थी। बीमारी के बावजूद जंगलों में पेड़ लगाने का उनका जूनून कम नही हुआ ।जब शरीर ने भी साथ छोड दिया तब भी वे पेड़ के लिए ही सांस लेते रहे।तभी तो उन्हें वृक्षमानव की उपाधि से नवाजा गया। विश्वेश्वर दत्त सकलानी अंत तक अपने पैतृक गांव पुजारा में रहते रहे।उनकी सांसे भी पेडों की ही बातें करती रही। विश्वेश्वर दत्त सकलानी ने उत्तराखंड की सकलाना घाटी की तस्वीर ही बदल कर रख दी। करीब 60- 70 साल पहले तक इस पूरे इलाके में अधिकतर इलाका पेड़ विहीन था। सकलानी ने धीरे धीरे बांज,बुरांश,सेमल,भीमल और देवदार के पेड़ लगाने शुरु किये। शुरू शुुरू में ग्रामीणों ने इसका काफी विरोध किया, यहां तक कि उनपर कई बार हमला भी किया गया, लेकिन धरती मां के इस नायक ने अपना जूनून नही छोडा जिसके परिणाम स्वरूप करीब 1200 हेक्टेयर से भी अधिक क्षेत्रफल में उनके द्वारा पूरा जंगल खडा हो चुका है।पुजारा गांव के लोग बताते हैं कि जब उनकी बेटी का विवाह हुआ और कन्यादान होने जा रहा था तो उस समय में वह जंगल में वृक्षारोपण करने गए हुए थे। विश्वेश्वर दत्त सकलानी का जीवन उन पर्यावरण विदों के लिए आईना है जो अपने जुगाड़ के कारण बड़े बड़े अवार्ड हथिया लेते हैं लेकिन जमीनी स्तर पर दिखाने के लिए उनके पास कुछ भी नही होता।ऐसे ही सुन्दरलाल बहुगुणा को राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण विद के रूप में जाना जाता है।सुंदर लाल बहुगुणा का जन्म 9 जनवरी सन 1927 को टिहरी गढ़वाल (उत्तराखंड) के मरोड़ा गाँव में हुआ था। उनकी पहचान चिपको आंदोलन के अगुआ के रूप में भी की जाती है। उन्होंने सन 1970 के दशक में हिमालय के जंगलों को बचाने के लिये कई वर्षों तक संघर्ष किया। सुंदर लाल बहुगुणा जी आम जन को जागरुक करने और अपने आंदोलन में सहयोग की मांग को लेकर वर्ष 1981 से 1983 के दौरान हिमालय क्षेत्र में 5000 किमी की पैदल यात्रा की। पर्यावरण संरक्षण की दिशा में उनके अतुलनीय योगदान के लिये भारत सरकार द्वारा उन्हें वर्ष 2009 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। वे जीवन पर्यंत पर्यावरण के प्रति समर्पित रहे।महिला शक्ति की प्रतीक
गौरा देवी सन 1925 में जन्मी थी , वह चिपको आंदोलन की एक महत्वपूर्ण कड़ी मानी गई। उनके मन में बचपन के दिनों में माँ से पर्यावरण को संजोने की प्रेरणा पैदा हुई । 26 मार्च 1974 को उत्तराखंड के रेनी नामक छोटे से गाँव में गौरा देवी के नेतृत्व में महिलाओं का एक समूह तीन दिन व तीन रात जंगल में पेड़ों से चिपककर खड़ा रहा और इस प्रतिरोध के द्वारा पेड़ों को काटने से रोका। उस समय गाँव के पुरुष काम करने के लिए चमोली गये हुये थे, इसी बात का फायदा उठाकर वन माफियाओं द्वारा पेड़ों को काटने की प्रक्रिया शुरू की गई थी। लेकिन गौरा देवी ने वन माफियाओं के इरादे पर पानी फेर दिया। उन्होंने बहादुरी का परिचय देते हुये उनसे कहा कि हमने इन पेड़ों को गले लगाया है। अगर वे इन पेड़ों को काटना चाहते हैं तो पहले कुल्हाड़ी उनके शरीर पर चलाओ। यह सुनकर पेड़ काटने आए लोग पीछे हट गये और गौरा देवी का नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। गौरा देवी की मृत्यु सन 1991 में हो गई थी।इसी प्रकार चंडी प्रसाद भट्ट को भी पर्यावरण के लिए सम्मान के साथ याद किया जाता है । जिनका जन्म 23 जून सन1934 को उत्तराखंड के गोपेश्वर में हुआ था। चंडी प्रसाद भट्ट चिपको आंदोलन के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे। उन्होंने सन1964 में दशोली ग्राम स्वराज्य संघ की स्थापना की जो आगे चलकर चिपको आंदोलन की मातृ संस्था बनी थी। चंडी प्रसाद भट्ट ने सामाजिक पारिस्थितिकी के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किये । पर्यावरण और पारिस्थितिकी जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान के लिये सन 1982 में चंडी प्रसाद को रेमन मैगसेसे पुरस्कार और सन 2013 में गाँधी शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया आज भी उत्तराखंड में अनेक व्यक्ति व संस्थाओं ने पर्यावरण संरक्षण को एक आंदोलन के रूप में अपनाया हुआ है ।जिनमे वनाधिकार आंदोलन के रूप में टिहरी विधायक किशोर उपाध्याय का नाम अग्रणी पंक्ति में आता है ,जो उत्तराखंड में जगह जगह पर्यावरण बचाने व जल,जंगल ,जमीन के हक हकूकों की लड़ाई लड़ रहे है।(लेखक विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ के उपकुलपति व वरिष्ठ साहित्यकार है)
डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट
पोस्ट बॉक्स 81,रुड़की,उत्तराखंड
मो0 9997809955

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *