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मधेशी दलों की राजनीति कौन सी करवट लेगी

 

कैलाश दास:मधेशवादी दलांे के ऊपर फिर से संकट मंडरा रहा है । बारा के स्रि्रौनगढÞ में पुलिस की गोली से युवक की मृत्यु हर्ुइ । संविधान में मधेश का अधिकार सुनिश्चित नहीं हुआ तो ‘मधेश प्रदेश नहीं, देश बनेगा’ आवाज उठाया तो विखण्डनकारी का आरोप लगा कर डा.सि.के राउत को गिरफ्तार कर लिया गया । अदालत ने उन्हे ५० हजार रुपये की ग्यारेन्टी में रिहा करने की बात कही है । उसके बावजूद भी मधेशवादी दलों की ओर से ‘चूं’ तक आवाज न निकलना कुछ सन्देश तो अवश्य देता है ।ck raut
हो सकता है- मधेशवादी दल अगर किसी मुद्दा को लेकर आन्दोलन में उतरते हैं तो उन पर ‘संविधान विरोधी’ आरोप लग सकता है । जो नेपाली काँग्रेस, नेकपा एमाले सहित के दल चाहते हैं । इस मायने में कुछ हद तक तो ठीक है, लेकिन इसका मतलव यह नहीं कि एक मधेशी के ऊपर कहर ढाहा जाए और मधेश के जिम्मेवार दल चुपचाप बैठे रहें । राणा शासन और राजतन्त्र में कृपा और चाकरी के कारण मधेशियों की पहुँच ऊपर तक होती थी । शायद इसी लिए मधेशी जनता नेपाली होते हुए भी उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक माना जाता था । लेकिन लोकतन्त्र में जनता द्वारा चुनकर भेजने पर नेपाली नागरिक को दूसरा दर्जा दिया जाए, इससे शर्मनाक बात लोकतन्त्र में और क्या हो सकती है –madhesi
मधेश में हांल ही में घटित तीन घटनाओं से स्पष्ट होता कि राणातन्त्र और राजतन्त्र से ज्यादा लोकतन्त्र में मधेशी जनता को अवहेलित होना पडÞा है और उसकी वाक्-स्वतन्त्रता भी छीन ली गई है । तीन घटना हैं- सप्तरी में फेस बुक टिप्पणी काण्ड, बारा के स्रि्रौनगढ की घटना और डा.सी.के राउत प्रकरण ।
डा.सी.के राउत की गलती बस इतनी है कि उनके पास न तो किसी प्रकार का संगठन है और न वे बडÞे दलों के साथ हैं । अगर कोई भी दल या संगठन देश को विखण्डन करना चाहता है तो वास्तव में वह सबसे बडÞा अपराध है । ऐसा अभियान चलाने वालों को एक नीति निर्माण के तहत सजा मिलनी ही चाहिए । लेकिन लोकतन्त्र में किसी व्यक्ति को बोलने पर दण्ड-सजा दिया जाए तो अभिव्यक्ति स्वतन्त्रता का क्या मतलव – यह न तो राणा शासन काल में था और न हीं राजतन्त्र में । अगर लोकतन्त्र में इसकी व्यवस्था है तो सबसे पहले राप्रपा नेपाल के अध्यक्ष कमल थापा पर ऐसी कारवाही क्यो नहीं की गई –
राजतन्त्र को खत्म करने के लिए बहुतों ने अपनी जान की आहुति दी है । देश की आर्थिक स्थिति भी चकनाचूर हो गई । तब लोकतान्त्रिक और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बना । उस लोकतन्त्र और धर्मनिरपेक्षता के विरोध में राप्रपा नेपाल ने खुलेआम ‘राजा आऊ, देश बचाऊ’, हिन्दू राष्ट्र घोषणा गर’ अभियान चलाया तो उस पार्टर्ीीो ऐसी स्वतन्त्रता कहाँ से मिली – और मधेश में जन्मे डा. सी.के राउत को राजद्रोह – शायद सी.के. मधेश में नहीं किसी पहाडÞ में जन्में होते तो आज उन्हे यह दिन देखना नहीं पडÞता ।
मधेशी जनता ने नेताओ को मत देकर जिताया, राज्य को अच्छा खासा राजस्व दिया । फिर भी पुलिस की गोली से मधेशी की हत्या होना, जेल जाना, अपराधी का ठप्पा लगना, इलेक्टि्रक युग में फेसबुक के किसी समाचार पर टिप्पणी करने पर कारवाही होना, अधिकार की लडर्Þाई में नेता वर्ग द्वारा मौन रहना, होता है तो ऐसा लोकतन्त्र किस काम का – इससे पहले भी एकीकृत नेकपा माओवादी द्वारा संसद में बजट बक्स तोडÞा जाता है तो उन्हे कुछ नहीं किया जाता । मधेशी नेता द्वारा संसद में माइक तोडÞने और कर्ुर्सर्ीीmेकने पर उन्हे जर्ुमाना, जेल और निलम्बन तक की आवाज उठी, ऐसा क्यो – जबकि क्षेत्रफल, जनसंख्या, राजस्व प्रत्येक दृष्टि से मधेश नेपाल का महत्वपर्ूण्ा भूभाग है । लेकिन अधिकार और स्वतन्त्रता में हमेशा कमजोर ।
मधेशवादी दल अपने आप को कितना भी शक्तिशाली समझें, लेकिन वे बहुत ही कमजोर हैं । उन में स्वच्छ विचार, राजनीतिक परिपक्वता, इमानदारी और दूरगामी दृष्टि की कमी है । और जब तक इस अवस्था में सुधार नहीं होगा, तब तक मधेश अपने अधिकारों का समुचित प्रयोग नहीं कर पाएगा ।
संविधान निर्माण की बात मधेशी दलों के लिए गौण है । वे पहचान एवं संघीयता सहित का संविधान चाहते हैं । लेकिन संसद में वे कमजोर हैं । सडÞक आन्दोलन के लिए मधेशी जनता मधेशी दलों पर विश्वास नहीं करते । ऐसी अवस्था में वे क्या करें – नेपाली काँग्रेस, नेकपा एमाले और एकीकृत नेकपा माओवादी के पिछलग्गू बनना उनके लिए बाध्यता है । लेकिन ये तीनों बडेÞ दल संघीयता सहित के संविधान लाने के पक्ष में नहीं हैं । भले ही एमाओवादी संघीयता और पहचान के लिए कुछ शब्दों को खर्च कर रहे हैं । इसीलिए मधेशवादी दल उसके साथ मोर्चा बना कर बैठे हैं ।
यहाँ एक बात स्मरणीय है, जिस समय एमाओवादी नेतृत्व की सरकार थी, उस सरकार में मधेशवादी दलों की भी सहभागिता थी । उसी सरकार ने संघीयता सम्बन्धी विवाद के कारण ही संविधान सभा को विघटन कर दिया था । आज वही एमाओवादी के साथ गठबन्धन कर मधेशवादी दल आन्दोलन की बात कर रहे हैं, जो मधेशी जनता के हित में नहीं है ।
मधेशवादी दलांे की माँग है- पहचान सहित का संघीय संविधान, स्वायत मधेश एक प्रदेश । लेकिन मोर्चा में ही आवद्ध एमाओवादी उसके विपरीत हंै । एमाओवादी प्रचण्ड की अभिव्यक्ति से स्पष्ट होता है कि वो मधेश एक प्रदेश के लिए वे कभी राजी नहीं हांेगे । एक कार्यक्रम में तर्राई मधेश राष्ट्रीय अभियान के संयोजक जयप्रकाश गुप्ता ने कहा कि प्रचण्ड की अभिव्यक्ति से दो प्रकार की बातें स्पष्ट होती हैं । एक मधेश स्वायत प्रदेश कर दिया गया तो आनेवाले कल में, जो डा. सी.के राउत का अभियान है वह सफल हो जाएगा । इसलिए मधेश में पाँच प्रदेश आवश्यक है ।
यह बहुत ही गम्भीर बात है । एक तरफ मधेशवादी एमाओवादी के साथ कन्धा में कन्धा मिलाकर चलना चाहता है तो दूसरी ओर विश्वासघात की बात आ रही है । ऐसे में क्या एमाओवादी के साथ गठबन्धन कर चलना ठीक है – कदापि नहीं । क्यो चाहिए एमाओवादी का साथ मधेशवादी दलों के गठबन्धन को – अगर सभी मधेशवादी दल एक होकर एक नारा, एक अभियान और अपनी माँग के प्रति दृढÞ रहें तो आनेवाले संविधान मंे मधेश का समुचित अधिकार सुनिश्चित है । वैसे जिस प्रकार से नेतागण की अभिव्यक्ति आ रही है इससे स्पष्ट होता है कि माघ ८ गते संविधान नहीं बन पाएगा ।
अभी नेपाली काँग्रेस और एमाले के गठबन्धन वाली सरकार है । फिर भी दोनों पार्टर्ीीे नेतागण विश्वस्त नहीं है कि संविधान माघ ८ गते बन पाएगा । नेपाली काँग्रेस की बात करें तो प्रधानमन्त्री सुशील कोइराला का कहना है कि किसी भी हालत में निर्धारित तिथि में संविधान बनेगा । और उसी पार्टर्ीीे वरिष्ठ नेता शेरबहादुर देउवा इस बात में सशंकित हैं । मधेशवादी दलों को बहस उससे नही है । मधेशियों को संविधान किसी भी हालत में चाहिए – इसलिए एक नीति के तहत उस पर दवाव सृजना करने की आवश्यकता है । संघीयता सहित के संविधान और एक मधेश स्वायत प्रदेश की जो माँग है, उसके लिए एकजूट होकर कंधा से कंधा मिलाकर चलें, इसी में मधेश और मधेशवादी दलों का भला दिखता है । अगर इस समय एकीकरण नही हो सका तो मधेश की राजनीति ही खत्म नही होगी बल्कि मधेश को अधिकार से भी हाथ धोना पडÞ सकता है । मधेशी जनता की चाहना और भावना के अनुसार आगे बढÞने में ही सभी का भला है ।

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