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हंगामे के बीच यूपी को चार टुकड़ों में बांटने का प्रस्‍ताव पास, सपाइयों की हुई पिटाई

 

नई दिल्ली।। यूपी की मुख्यमंत्री मायावती ने भले ही हंगामे के बीच ध्वनिमत से यूपी को चार हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव पास करवा लिया है, लेकिन संवैधानिक दृष्टि से इस काम में उनकी कोई अहम भूमिका नहीं है।

वास्तव में नए राज्य का गठन या किसी राज्य का विभाजन या राज्यों के कुछ हिस्सों को आपस में बदलने का अधिकार केन्द्र सरकार के ही पास है। इसके लिए न तो राज्य पुनर्गठन आयोग बनाने की आवश्यकता है और न ही राज्य सरकारों की स्वीकृति की।

मुख्यमंत्री मायावती द्वारा विधानसभा चुनावों के मौके पर राज्य के बंटवारे का प्रस्ताव और कांग्रेस द्वारा राज्य पुनर्गठन आयोग के गठन का सुझाव-दोनों ही जनभावनाओं के अनुरूप तो हो सकते हैं, लेकिन केन्द्र सरकार की मंशा सर्वोपरि है। यदि केन्द्र सरकार चाहे तो राज्यों की अनुमति के बिना ही उनका विभाजन-पुनर्गठन कर सकती है।

संविधान में स्पष्ट प्रक्रिया है
संविधान विशेषज्ञ अनिल चावला के मुताबिक संविधान के अनुच्छेद तीन में राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया का स्पष्ट उल्लेख है। अगर किसी राज्य का विभाजन कर नया राज्य बनाया जाता है तो उसके लिए केन्द्र सरकार को एक प्रस्ताव (विधेयक) तैयार करके राष्ट्रपति को भेजना होता है। राष्ट्रपति केन्द्रीय कैबिनेट के इस प्रस्ताव को उस राज्य या उन राज्यों की विधानसभाओं को भेजते हैं, जिनका विभाजन प्रस्तावित है। इन विधानसभाओं को एक निश्चित समयावधि में इस प्रस्ताव पर अपनी राय राष्ट्रपति को भेजनी होती है।

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राज्य के विरोध का असर नहीं
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि यदि विधानसभा राज्य विभाजन का विरोध करती है तो भी प्रस्ताव पर कोई असर नहीं पड़ेगा। विधानसभा की विपरीत राय प्रस्ताव में बाधा नहीं बनेगी। अगर कोई विधानसभा निर्धारित समयावधि में अपनी राय राष्ट्रपति को नहीं भेजती है तो राष्ट्रपति चाहे तो उसकी अवधि को आगे बढ़ा सकते हैं। वह यह फैसला भी कर सकते हैं कि और समय बढ़ाना आवश्यक नहीं है। राज्यों की राय मिल जाने या फिर उनकी राय के लिए निर्धारित समयावधि खत्म हो जाने के बाद राष्ट्रपति प्रस्तावित विधेयक को अपनी मंजूरी के साथ संसद को भेजेंगे। मंजूरी में इस बात का भी उल्लेख होगा कि विधानसभा की क्या राय है या फिर निर्धारित समय में राय व्यक्त नहीं की गई है।

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राष्ट्रपति और संसद का फैसला अंतिम
राष्ट्रपति की संस्तुति के बाद केन्द्र सरकार प्रस्तावित विधेयक को संसद के किसी भी एक सदन , लोकसभा या राज्यसभा में पेश करेगी। संसद के दोनों सदनों में पारित होने के बाद विधेयक फिर से संस्तुति के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ही एक राज्य का विभाजन करके नए राज्य का गठन किया जा सकेगा। संविधान विशेषज्ञ के मुताबिक अगर कोई विधानसभा इस प्रक्रिया से अलग कोई प्रस्ताव पारित करती है तो उसकी कोई संवैधानिक प्रासंगिकता नहीं है। सिर्फ राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए प्रस्ताव पर उसकी राय ही संवैधानिक रूप से प्रासंगिक मानी जाएगी। अगर कोई विधानसभा राज्य के विभाजन का विरोध भी करती है तो भी राष्ट्रपति ( केन्द्र सरकार ) और संसद इस संबंध में फैसला कर सकते हैं।

केंद्र सलाह मानने को बाध्य नहीं है
नए राज्य के गठन के लिए राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन भी संवैधानिक आवश्यकता नहीं है। अब तक के इतिहास में सिर्फ एक बार दिसंबर 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया गया था। बाद में नए राज्यों के गठन में इस प्रक्रिया का अनुसरण नहीं किया गया। जहां तक पुनर्गठन आयोग का सवाल है , उसकी भूमिका सिर्फ सलाहकार की होती है। उसे कोई संवैधानिक अधिकार नहीं होता है। इस संबंध में कोई फैसला करने से पहले केन्द्र सरकार किसी व्यक्ति या व्यक्तियों से सलाह ले सकती है , लेकिन वह सलाह मानने के लिए बाध्य नहीं है।

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सामान्य बहुमत ही काफी
यह भी उल्लेखनीय है कि अनुच्छेद तीन के तहत इस तरह के विधेयक को पारित करने के लिए संसद में तीन – चौथाई बहुमत की आवश्यकता नहीं होगी। केन्द्र सरकार विधेयक को पेश करके सामान्य बहुमत से भी पारित करवा सकती है। संवैधानिक दृष्टि से यह स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश का विभाजन सिर्फ केन्द्र सरकार ही कर सकती है। अगर वास्तव में जनभावनाओं का आदर करके नए राज्यों का गठन किया जाना है तो केन्द्र सरकार को प्रस्ताव पेश करना होगा। लेकिन तेलंगाना राज्य की मांग पर केन्द्र सरकार का जो रुख है , उससे यह साफ है कि फिलहाल वह कोई फैसला करने की स्थिति में नहीं है।

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