बसंत हमारी चेतना के द्वार खोलता है, दिलों में रंग भरता है : श्वेता दीप्ति
काठमान्डू 3 फरवरी

डा.श्वेता दीप्ति
महाभारत काल में स्वयं श्री कृष्ण कहते हैं– ‘गायन करने योग्य श्रुतियों में मैं बृहत्साम और छन्दों में गायत्री छन्द हूँ तथा महीनों में मार्गशीर्ष और ऋतुओं में बसन्त मैं हूँ ।’
बसंत का आना, सबके मन को लुभा जाना । बसंत, जब प्रकृति सृष्टि का श्रृंगार करती है । बसंत का आगमन होते ही शीत ऋतु की मार से ठिठुरती धरा उल्लसित हो उठती है । प्रत्येक दिशाएं प्राकृतिक सुषमा से शोभित हो मनभावन हो जाती हैं । शीतल, मंद, सुगंधित बयार हमारे प्राणों में हर्ष का नव–संचार करती है । बसंत हमारी चेतना के द्वार को खोलता है, हमारे दिलों में रंग भरता है । नवागंतुक कोपलें हर्ष और उल्लास का वातावरण बिखेर कर चहुंदिशा में एक सुहावना समा बांध देती हैं । प्रकृति सरसों के पुष्परूपी पीतांबर धारण करके बसंत के स्वागत के लिए आतुर हो उठती है । टेसू के फूल चटककर और अधिक लाल हो उठते हैं । आम के पेड़ मंजरियों से लद जाते हैं । भौरों की गुंजन सबको अपनी ओर आकर्षित करने लगती है । बसंत ऋतु का प्रभाव जनमानस को उल्लासित करता हुआ होली के साथ विविध रंगों की बौछारों से समाहित होता रहता है ।
मौसम का रुख बदला
वसुधा ने अंगड़ाई ली
पहाड़ों की चोटियों से
आहिस्ता–आहिस्ता
अब उतरने लगी है
सहमी गुनगुनी सी धूप
आलस के लिहाफ से
निकलने लगा है
बेईमान पागल मन
गौरैयों के कलरव से
चहकने लगा है घर आँगन
फिजाओं में घुलने लगी है
मंजर की बौराई सी खुशबु
कहीं दूर से हवाओं के साथ आती
विरहा चैती और फागुन के सुर
बेचैन मन को भाने लगे हैं
भीगी पाँखों को मुँडेर पर
सुखाती चिड़िया चहकने लगी है
कोयल की कूक तिरने लगी है
हवाओं में तेरा पैगाम लेकर
फागुन की अलमस्त बयार
अल्हड़ बनाने लगी है मन को
और फिर रंग लिया मैंने
तेरी यादों के बासंती रंग से खुद को
जानते हो क्यों ?
क्योंकि बसन्त आ गया है न !
हिन्दी साहित्य में कवियों का प्रिय मौसम रहा है बसंत । सच ही तो है जब हमारे आसपास सुन्दर वातावरण हो तब हमारा मन स्वयं रचनाशील होने लगता है । उपनिषद, पुराण–महाभारत, रामायण (संस्कृत), हिन्दी, प्राकृत, अपभ्रंश की काव्य धारा में बसंत का रस हर ओर बिखरा मिलता है । अर्थवेद के पृथ्वीसूत्र में भी बसंत का व्यापक वर्णन मिलता है । महर्षि वाल्मीकि ने भी बसंत का व्यापक वर्णन किया है । किष्किंधा कांड में पम्पा सरोवर तट इसका उल्लेख मिलता है– अयं वसन्तः सौ मित्रे नाना विहग नन्दिता ।
बुध्दचरित में भी बसंत ऋतु का जीवंत वर्णन मिलता है । भारवि के किरातार्जुनीयम, शिशुपाल वध, नैषध चरित, रत्नाकर कृत हरिविजय, श्रीकंठ चरित, विक्रमांक देव चरित, श्रृंगार शतकम, गीतगोविन्दम्, कादम्बरी, रत्नावली, मालतीमाधव और प्रसाद की कामायनी में बसंत को महत्त्वपूर्ण मानकर इसका सजीव वर्णन किया गया है । कालिदास ने बसंत के वर्णन के बिना अपनी किसी भी रचना को नहीं छोड़ा है । मेघदूत में यक्षप्रिया के पदों के आघात से फूट उठने वाले अशोक और मुख मदिरा से खिलने वाले वकुल के द्वारा कवि बसंत का स्मरण करता है । कवि को बसंत में सब कुछ सुन्दर लगता है । कालिदास ने ‘ऋतु संहार’ में बसंत के आगमन का सजीव वर्णन किया हैः–
द्रुमा सपुष्पाः सलिलं सपदमंस्त्रीयः पवनः सुगंधिः।
सुखा प्रदोषाः दिवासश्च रम्याःसर्वप्रियं चारुतरे वतन्ते॥
मैथिल कोकिल विद्यापति की वाणी मिथिला की अमराइयों में गूंजी थी । ।ृंगार रस से ओतप्रोत इनकी रचनाओं में बसंत के आगमन पर प्रकृति की पूर्ण नवयौवना का सुंदर व सजीव चित्र रेखांकित हुआ हैः–
आएल रितुपति राज बसंत,छाओल अलिकुल माछवि पंथ ।
दिनकर किरन भेल पौगड़,केसर कुसुम घएल हेमदंड ।
हिन्दी साहित्य का आदिकालीन रास–परम्परा का ‘वीसलदेव रास’ कवि नरपतिनाल्हदेव का अनूठा गौरव ग्रंथ है । इसमें स्वस्थ प्रणय की एक सुंदर प्रेमगाथा गाई गई है । प्राकृतिक वातावरण के प्रभाव से विरह–वेदना में उतार–चढ़ाव होता है ।
चालऊ सखि ! आणो पेयणा जाई,आज दी सई सु काल्हे नहीं ।
पिउ सो कहेउ संदेसड़ा,हे भौंरा, हे काग ।
ते धनि विरहै जरि मुई,तेहिक धुंआ हम्ह लाग ।
विरहिणी विलाप करती हुई कहती है कि हे प्रिय, तुम इतने दिन कहाँ रहे, कहाँ भटक गए ? बसंत यूं ही बीत गया, अब वर्षा आ गई है ।
घनानन्द का प्रेम काव्य–परम्परा के कवियों से सर्वोच्च स्थान पर है । ये स्वच्छंद, उन्मुक्त व विशुध्द प्रेम तथा गहन अनुभूति के कवि हैं । प्रकृति का माधुर्य प्रेम को उद्दीप्त करने में अपनी विशेष विशिष्टता रखता है । कामदेव ने वन की सेना को ही बसंत के समीप लाकर खड़ा कर दियाः–
राज रचि अनुराग जचि, सुनिकै घनानंद बांसुरी बाजी।
फैले महीप बसंत समीप, मनो करि कानन सैन है साजी।
हिन्दी साहित्य में रीतिकाल अपनी श्रृंगारिकता के लिए विख्यात है । रीतिकालीन कवियों ने जगह–जगह बसंत का सुंदर वर्णन किया है । आचार्य केशव ने बसंत को दम्पत्ति के यौवन के समान बताया है । जिसमें प्रकृति की सुंदरता का वर्णन है । आचार्य केशव ने अपनी कविता में प्रकृति का आलम्बन रूप में वर्णन किया हैः–
दंपति जोबन रूप जाति लक्षणयुत सखिजन,
कोकिल कलित बसंत फूलित फलदलि अलि उपवन।
बिहारी प्रेम के संयोग–पक्ष के चतुर चितेरे हैं । ‘बिहारी सतसई’ उनकी विलक्षण प्रतिभा का परिचायक है —
वन वाटनु हपिक वटपदा, ताकि विरहिनु मत नैन।
कुहो–कुहो, कहि–कहिं उबे, करि–करि रीते नैन।
हिये और सी ले गई, डरी अब छिके नाम।
दूजे करि डारी खदी, बौरी–बौरी आम।
‘कामायनी’ में जयशंकर प्रसाद ने श्रद्धा को बसंत–दूत के रूप में प्रस्तुत किया है–
कौन हो तुम बसंत के दूत? विरस पतझड़ में अति सुकुमार
घन तिमिर में चपला की रेख तमन में शीतल मंद बयार।
महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म बसंत पंचमी के दिन हुआ था । फिर भला वे कैसे बसंत के मादक स्पर्श से अछूते रह सकते थे । अपनी कविता में वे कहते हैं—
सखि बसंत आया,भरा हर्ष तन के मन,नवोत्कर्ष छाया,
किसलम–वसना नवल्य लतिका,मिली मधुर प्रिय उर तरू–पलिका,
मधुपद्य–वृंद बंदी,पिक–स्वर नभ सरसाया,
लता–मुकुल हार गंध भार भर,बही पवन मंद–मंद मंदतर,
जागी नयनों में वन,यौवन की माया,
आवृत सरसी उर सरसिज उठे,केशर के केश कली के छटे,
स्वर्ग शय अंचल,पृथ्वी का लहराया ।
सुमित्रानंदन पंत के लिए प्रकृति जड़ वस्तु नहीं, सुंदरता की सजीव देवी बन उनकी सहचरी रहीः–
दो वसुधा का यौवनसार,गूंज उठता है जब मधुमास ।
विधुर उर कैसे मृदु उद्गार,कुसुम जब खिल पड़ते सोच्छवास ।
न जाने सौरस के मिस कौन,संदेशा मुझे भेजता मौन ।
अज्ञेय ने अपने घुमक्कड़ जीवन में बसंत को भी बहुत करीब से देखा है, अपनी ‘बसंत आया’ कविता शीर्षक में कहा हैः–
बसंत आया तो है,पर बहुत दबे पांव,
यहां शहर में,हमने बसंत की पहचान खो दी है,
उसने बसंत की पहचान खो दी है,
उसने हमें चौंकाया नहीं।अब कहाँ गया बसंत ?
बसंत ऋतु का आगमन वास्तव में खुशियों का समय है । यह ऋतु नई उमंग, नई ऊर्जा और नई संभावनाओं का प्रतीक है । मां सरस्वती की पूजा वसंत ऋतु में विशेष रूप से की जाती है, क्योंकि वह ज्ञान, कला और संस्कृति की देवी हैं । उनकी पूजा से हमें ज्ञान, बुद्धि और रचनात्मकता की प्रेरणा मिलती है । पीले रंग का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी महत्व है । पीला रंग सूरज की किरणों का प्रतीक है, जो हमें ऊर्जा और जीवन देती हैं । पीले रंग के फूल, जैसे कि सरसों, वसंत ऋतु में खिलते हैं और हमें नई उमंग और नई संभावनाओं की ओर आकर्षित करते हैं । बसंत ऋतु का आगमन हमें नई शुरुआत करने, नई उमंग और नई ऊर्जा के साथ जीवन को आगे बढ़ाने का अवसर देता है ।
बसन्त ऋतुओं का राजा है । जिसके आने से मानवीय जीवन की पीड़ा नीरसता अवसाद दूर हो जाती है । जीवन मे आनन्द उत्साह उमंग छा जाता है ।

