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भारत की बदलती नेपाल नीति

 

dipendra jhaदीपेन्द्र झा:चर्चा नेपाल की राजनीति की हो और उसमें भारत अनदेखा रह जाए, ऐसा तो हो ही नहीं सकता । दो अलग राष्ट्र, किन्तु कई मायने में समान । संस्कृति, परम्परा और रिश्तों की जडÞें इन दोनों राष्ट्रों में इतनी गहर्राई तक फैली हर्ुइ हंै कि इसे निर्मूल किया ही नहीं जा सकता । इन बातों से हम सब, खास कर तर्राईवासी अच्छी तरह परिचित हैं । बचपन मेरा मधेश में गुजरा और तभी हमारी नजर में भारत, भिट्ठामोडÞ, सुरसन्ड, सुनौली और सिलीगुडÞी तक ही सीमित था । एक बात जो हम सब हमेशा सुना करते थे कि भारत से हमारा रोटी और बेटी का सम्बन्ध है, तो बचपन में हम इसका सीधा अर्थ यह लगाते थे कि हमारे खाने का सामान भारत से आता है और शादियों में इधर की बेटियाँ उधर जाती हैं और उधर की बेटियाँ इधर आती हैं, जिसका प्रमाण यह था कि मेरी दादी बिहार की थी, मेरी माँ बिहार से थीं और इतना ही नहीं मेरी दोनों फुआ बिहार में ब्याही गई थीं । ये सिर्फएक मेरे परिवार की बात नहीं है, मधेश के हर दूसरे घर में एक ना एक रिश्ता भारत से जुडा मिल ही जाता है । यहाँ सीमा का कोई सवाल नहीं होता सिर्फरिश्ते होते हैं । सीमा से सटे गाँवों में चले जाइए, कहीं कोई र्फक देखने को नहीं मिलता पर जब राजनीति की कुदृष्टि पडÞती है तो रिश्तों में दरार की अवस्था आ ही जाती है । ब्रिटिश सत्ता ने जो राजनैतिक लकीर सीमा के रूप में दोनों राष्ट्रों के बीच खींची, उसे सीमा से सटे लोगों ने कभी नहीं माना । स्थिति तो वहाँ ऐसी है कि चाय बनाते-बनाते अगर चीनी खत्म हो जाय तो लोग साइकिल उठाकर भारत से चीनी ले आते हैं और चाय बन जाती है । ऐसे में भला सीमा के बन्धन को सामान्य जनता क्या जानें, उन्हें तो सब एक जैसा लगता है । मैं पेशे से वकील हूँ और सर्वोच्च अदालत में वकालत करता हूँ और मजे की बात तो यह है कि नेपाल के सर्वोच्च अदालत में भारत के सर्वोच्च अदालत का नजीर पेश करता हूँ, यह उदाहरण काफी होगा इन दो देशों के बीच के रिश्ते को समझने के लिए ।  ind
पिछले दिनों दिल्ली जाने का अवसर प्राप्त हुआ सर्ंदर्भ था संविधान निर्माण । वैसे दिल्ली से मैं ज्यादा वाकिफ नहीं हूँ क्योंकि शुरुआती शिक्षा के पश्चात् मैंनें उच्च शिक्षा विलायत बैडफोर्ड विश्वविद्यालय से प्राप्त की और उसके बाद कानून की उच्च शिक्षा थाइलैण्ड के महिडोल विश्वविद्यालय से मैंनें प्राप्त की । इस वजह से न्यायिक प्रक्रिया के अध्ययन के सर्न्दर्भ में अमेरिका, स्वीटजरलैण्ड, ब्राजील और मैक्सिको आदि जगहों से मैं ज्यादा जुडÞा रहा । बहुत कुछ सीखने का अवसर प्राप्त हुआ । आज देश जिस संक्रमणकाल से गुजर रहा है, उस स्थिति में कई एक सवाल से हर बुद्धिजीवी वर्ग गुजर रहा है । असमंजस की स्थिति बनी हर्ुइ है । इसी मसले पर भारत की राजधानी दिल्ली जाने का पहला औपचारिक अवसर मिला । कई एक बातें सामने आईं । आखिर क्या है नजरिया भारत का नेपाल की वर्तमान राजनीतिक अवस्था को लेकर – यह वह सवाल है जिसे हर नेपाली नागरिक सोच रहा है । क्योंकि यह धारणा है कि भारत की कोई नीति नेपाल के लिए है ही नहीं बस एक नौकरशाह का वर्ग है जो नेपाल के लिए नीति निर्धारण करता है । नेपाल में भारत र्समर्थन की बातें कम होती हैं विरोध की अवस्था अधिक होती है । सामान्य सी सोच यह है कि अब बातें बराबर की हों, रिश्तों में आर्थिक सम्बन्धों के मद्देनजर बातें हों । अगर भारत की सोच इन बातों से होकर गुजरती है, तो ठीक है वरना तनाव का आलम तो बना हुआ ही है ।
मधेश की बात करें, तो यह सभी जानते हैं कि भारत के जितना करीब मधेश है, भारत की राजनीतिक दृष्टिकोण से उतना ही दूर है । मधेश के लोग कभी भारतीय तो कभी धोती कहकर हमेशा उपेक्षित रहे, जिसका मैं खुद भुक्तभोगी हूँ । पहली बार जब मैं कक्षा आठ में पढÞने रुपन्देही गया तो सबने मुझे या तो भारतीय कहा या धोती कहा । यह बात मेरे दिमाग में बैठती चली गई कि, आखिर हमारा अस्तित्व क्या है – भारत में अपने रिश्तेदारों के यहाँ जाओ तो नेपाली कहते हैं और मधेश से पहाडÞ की ओर आओ तो भारतीय या मरसिया कहते हैं । नागरिकता मिलनी मुश्किल है । हमारी संस्कृति, वेश-भूषा, भाषा भारतीयों से मिलती जुलती है और इस वजह से हम अपने ही देश में दूसरे दर्जे के नागरिक होने का दर्द सह रहे हैं । जवकि भारत की नीति में मधेश कभी प्रमुखता के साथ नहीं रहा क्योंकि भारत जानता है कि,  राजनीतिक दृष्टिकोण से पहाडÞ उसके लिए ज्यादा महत्वपर्ूण्ा है, शायद इसलिए उसका पूरा ध्यान पहाडÞ की ओर ही रहा है और इसलिए सत्ता पक्ष में भी वह उन्हें ही साथ देता आया है । यह कोई नई बात नहीं है क्योंकि, हाइड्रो पावर जैसी समझौता सत्ता पक्ष से ही हो सकती है, यहाँ मधेश से उसे कोई फायदा नहीं है और हर पक्ष अपना फायदा पहले देखता है और दूसरों का उसके बाद । शायद इसलिए चुनाव के समय भी मधेशवादी दलों से अधिक भारत की निगाह काँग्रेस और एमाले की ओर ज्यादा रहती है । मधेश स्वयं को जितना भारत के करीब समझता है, वास्तव में भारत से उसकी उतनी ही दूरी दिखती है । शायद गैरों को खुश करने में अपनों को ही भुला दिया गया है । पर अगर यही स्थिति बनी रही तो जो भारत विरोधी भावना लेकर पहाडÞी जन्म लेते हैं वैसी ही भावना मधेशी वर्ग में भी बलवती होती चली जाएगी । भारत को यह समझना ही होगा कि मधेश से उसका बहुपक्षीय रिश्ता है । हमेशा मधेश और मधेशवादी दलों को ही समझौता के लिए दवाव दिया जाता रहा है । सत्ता पक्ष समझते हैं कि अगर मधेश को वश में करना है तो सीमापार का सहारा ले लो और कहीं ना कहीं भारत की राजनीति नेपाल की सत्ता से ही हाथ मिलाकर चलती आई है ।
किन्तु, इस बार की दिल्ली यात्रा ने यह अहसास दिलाया है कि माहौल बदल चुका है । भारत की नई सरकार रिश्तों को एक नए नजर से देख रही है । भारत कई बार यह जता चुका है कि मधेश अपनी लडर्Þाई स्वयं लडÞे क्योंकि इस सर्ंदर्भ में वह खुलकर मधेश का साथ नहीं दे सकता जो कूटनीतिक दृष्टिकोण से सही भी है । कोई भी देश किसी अन्य देश के आन्तरिक मामलों में दखल नहीं दे सकता किन्तु, यह भी सच है कि भारत के सहयोग के बिना आजतक नेपाल में कोई परिवर्तन सम्भव नहीं हो पाया है । भारतीय नेता यह मानते हैं कि अगर मधेश में असुरक्षा बढÞी तो उसका असर भारत के बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल पर किसी ना किसी रूप में अवश्य पडÞेगा । जब बात भारत और बांगला देश के सम्बन्धों की होती है तो पश्चिम बंगाल की सुरक्षा का सवाल सामने होता है । जब श्रीलंका और भारत के बीच की बात होती है तो तमिलनाडु सामने होता है और जब भारत और नेपाल के बीच की बात होती है तो भारत के तीन राज्यों का सवाल सामने होता है, बिहार, उत्तरप्रदेश और पश्चिम बंगाल । इन तीनों राज्यों की सीमा नेपाल के मधेश क्षेत्र से सम्बद्ध है पर मधेश कभी भी इनपर हावी नहीं रहा है और न ही क्षेत्रविस्तार की बात सामने आई है ।र्
कई एक उदाहरण हैं कि यहाँ किसी ना किसी मुद्दे पर भारत का विरोध होता रहा है । कुछ प्रतिशत को छोडÞ दिया जाय तो पहाडÞी मूल की मानसिकता भारत विरोधी होती है पर मधेशियों में यह कम पाया जाता है, इसकी वजह शायद हममें पायी जानेवाली समानता है । फिर भी मधेश भारत से दूर है । शायद दिल्ली को यह लगता हो कि अगर मधेशियों को खुश किया गया तो कहीं सत्ताधारी, गोर्खा रेजीमेंट और सुरक्षा गार्ड वगैरह नाराज ना हो जाएँ । एक कमजोरी तो मधेशियों में भी है कि वो छात्रवृत्ति, विकास अनुदान की राशि आदि से अलग कोई रिश्ता भारत से बना ही नहीं पाए हैं । शायद इसकी वजह से हम समकक्षी और मित्र ना होकर सूचक और आदेशपालक में सिमट कर रह गए हैं । हमें स्वयं को इस स्थिति से आगे निकालना होगा ।
भारत में भाजपा की सरकार बनने के बाद और भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेपाल भ्रमण के बाद इन दो देशों के रिश्ते में कुछ परिवर्तन तो अवश्य हुए हैं । नेपाल के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि  कोई भी भारतीय प्रधानमंत्री ने कार्यभार सम्भालने के बाद एक ही वर्षमें दो बार नेपाल भ्रमण किया हो । यह भ्रमण भी कई मायनों में विवादित रहा । पहली बार जब भारतीय प्रधानमंत्री मोदी नेपाल आए तो संसद में मधेशियों को यह सीख दी कि पहाडिÞयों से मिलकर चलें जिसने जहाँ एक पक्ष के मनोबल को हताश किया वहीं एक पक्ष ने काफी खुशियाँ मनाई । वहीं मोदी जब दूसरी बार नेपाल भ्रमण के साथ ही जनकपुर भ्रमण की इच्छा जताई तो सत्तापक्ष को सारे नियम कानून और मर्यादा के पाठ याद आने लगे और यह भ्रमण इतना विवादित हुआ कि अंततः उसे रोकना पडÞा । सत्तापक्ष को यह डर सता बैठा कि ना जाने मोदी जी मधेश जाकर क्या बोल दें और क्या दे दें । सत्तापक्ष की दोहरी मानसिकता खुलकर सामने आई और शायद इसी का असर था कि ट्रमा सेन्टर के उद्घाटन में वो बोल बैठे कि संविधान निर्माण की प्रक्रिया सहमति से होनी चाहिए ना कि बहुमत के दवाब के साथ । ओली जी ने तो साफ कह दिया कि गलत ब्रिफिंग की वजह से मोदी जी ने ऐसा कहा । यह बात सत्तापक्ष को पच नहीं रही थी कि मोदी की निगाह मधेश की ओर कैसे उठ गई ।
नेपाल में संविधान निर्माण के अवसर और चुनौती इस विषय की प्रस्तुति के लिए ही दिल्ली जाने का अवसर प्राप्त हुआ । ६ जनवरी से ९ जनवरी तक वहाँ रहने का अवसर मिला और नेपाल के विषय में कई जाने माने दिग्गज नेताओं से विचार विमर्श भी हुए । पर्ूव राजदूत जयन्त प्रसाद मुखर्जी, के.बी.राजन, एस.डी.मुनि जैसे महत्वपर्ूण्ा व्यक्तियों ने नेपाल से सम्बन्धित अपनी अपनी धारणाएँ रखीं । भाजपा के सत्ता में आने के बाद यहाँ के हिन्दुवादी पक्ष में यह भावना विस्तार पा रही है कि नेपाल में फिर से हिन्दु राज्य की स्थापना होगी और भाजपा उसका र्समर्थन करेगा । जब इस मुद्दे पर वहाँ बात उठी तो स्पष्ट रूप में यह बात सामने आई कि यह नेपाल का आन्तरिक मामला है, हमारा इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं है और हम धर्मनिरपेक्षता में विश्वास करते हैं और इसका र्समर्थन करते हैं । इस धारणा से यह तो स्पष्ट हो गया कि नेपाल में फिर से हिन्दु राष्ट्र बनने की सम्भावना क्षीण है । दूसरी जो बात देखने में आई वह यह थी कि अब तक जो व्यक्ति नेपाल की राजनीति में भारत की ओर से महत्वपर्ूण्ा भूमिका निर्वाह करते आए थे वो फिलहाल क्रियाविहीन हो गए हैं । उनकी जगह भाजपा के अजित सिंह, राममाधव जी, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और अप्रत्यक्ष रूप से आर.एस.एस. सक्रिय दिख रहे हंै । इनका मानना है कि संविधान निर्माण में सांस्कृतिक आधार को सामने रखना उचित होगा क्योंकि आर्थिक और सामाजिक विभेद का उन्मूलन नहीं करने से किसी भी राष्ट्र का विकास सम्भव नहीं है । जवकि इससे पहले काँग्रेस सरकार इस मामले में अनुदार थी । नेपाल के संविधान निर्माण की प्रक्रिया पर कटाक्ष करते हुए काँग्रेस के महासचिव डी.पी. ने तो यह भी कह दिया कि नेपाल पहला देश हैं जहाँ के संविधान में संविधान निर्माण के अलावा सभी काम होता है । वहाँ के परिवेश को देखकर यही समझ में आया कि भारत चाहता है कि नेपाल में जल्द से जल्द संविधान बने किन्तु सहमति के आधार पर बने । क्योंकि उनका मानना है कि काफी मुश्किलों के बाद माओवादी मूलधार में आ पाए हैं और उनकी तथा मधेश की संतुष्टि आवश्यक है, नहीं तो नेपाल फिर से आन्दोलित हो जाएगा । ऐसी कोई असहज बात ना हो कि माओवादी को फिर से जंगल जाना पडÞे, अगर ऐसा हुआ तो नेपाल एक बार फिर आन्तरिक द्वन्द्व का शिकार हो जाएगा । इस स्थिति में बने संविधान का कोई औचित्य नहीं है । पर सबने यह भी स्पष्ट किया कि यह नेपाल का आन्तरिक मामला है और इसे स्वयं ही सुलझाना होगा । कुछ उपाय भी सामने आए जिसमें यह शामिल था कि कुछ लचीला हर पक्ष को बनना होगा कुछ लेकर और कुछ देकर इस मामले को निपटाया जा सकता है । जैसे झापा पहाडÞ में और मोरगं, सुनसरी तर्राई में और कंचनपुर पहाडÞ में और कैलाली तर्राई में भी लिया जा सकता है । कहीं ना कहीं समझौता तो करना होगा । विगत की सहमति, समझौता और दूसरे संविधान सभा के मसौदे का सन्तुलन ही  मजबूत संविधान का आधार हो सकता है । एस.डी.मुनि ने तो स्पष्ट कहा कि सत्ता और साझेदारी का जब तक साथ नहीं होगा तब तक संविधान निर्माण असम्भव है । माननीय ओली जी के इस वक्तव्य से कि यू.पी.और बिहार दोनों ले लो पर भी सबने नाराजगी जताई उनका मानना था कि एक जिम्मेदार व्यक्ति का ऐसा वक्तव्य उचित नहीं है । पर वहीं एक पक्ष ऐसा भी नजर आया जिनका मानना था कि के.पी.ओली को जरा नरम कीजिए प्रधानमंत्री बना दीजिए और संविधान बना लीजिए वहीं यह बात भी उभर कर आई कि काँग्रेस, एमाओवादी और मधेशवादी दलों का मोर्चा बनाकर भी सरकार और संविधान निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढÞाया जा सकता है ।
नेपाल के विकास की बातों पर तो सभी सहमत दिखे किन्तु उनका मानना था कि सरकार दिलचस्पी नहीं ले रही है । मधेश विकास से सम्बन्धित हुलाकी मार्ग के लिए तो स्पष्ट रूप से कहा गया कि इसे बनाने के लिए दो महीने पर्ूव प्रस्ताव भेजे गए हैं किन्तु सम्बन्धित निकाय और भौतिक योजना तथा निर्माण विभाग की ओर से कोई जवाब नहीं आया है जिससे तो यही पता चलता है कि सम्बन्धित निकाय का विकास की ओर या हुलाकी मार्ग के निर्माण की ओर ध्यान ही नहीं है ।
माघ आठ आकर गुजर गया । विपक्षी पक्ष के हंगामें के बावजूद  सभामुख द्वारा प्रस्ताव का पढÞा जाना और पारित किया जाना तथा ओली के मनोबल को देखते हुए तो ऐसा लगता है कि इन सबके मूल में भारत के तटस्थ पक्ष ही काम कर रहे हैं । अभी के माहौल में भारत की सक्रियता की आवश्यकता महसूस की जा रही है क्योंकि बारह सूत्री समझौता और मधेश आन्दोलन के पश्चात् बाइस सूत्री समझौता भी भारत के मध्यस्थता में ही सम्भव हुआ था । इसलिए आज भी उसके पहल की आवश्यकता महसूस की जा रही है । वैसे भी भारत कुछ करे तो भी, ना करे तो भी उसकी भूमिका हमेशा नेपाल में विवादित रही है । मोदी के बडÞे भाई वाली भूमिका की आवश्यकता नेपाल महसूस तो कर रहा है, पर इस शर्त पर कि बात समानता की हो । अब जो भी पहल हो उसमें नेपाल का स्वाभिमान, उसकी स्वतन्त्रता और लोकतांत्रिक अवस्था पर कोई चोट नहीं पहुँचे । भारत को अपनी किसी भी नीति निर्धारण के पहले नेपाल की आम जनता की भावनाओं का ख्याल रखना होगा । लेकिन मधेश इन सबसे अधिक की अपेक्षा भारत से रखता है और भारत को भी मधेश के मर्म को समझना पडÞेगा । आज मधेश जिस दवाब और दमन का शिकार हो रहा है उसपर अर्न्तराष्ट्रीय निकायों को ध्यान देने और सबसे नजदीक पडÞोसी होने के नाते भारत के पहल की आवश्यकता भी है ।
-लेखक दीपेन्द्र झा नेपाल के सर्वोच्च अदालत के अधिवक्ता हैं ।)

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