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शिक्षा के चक्रव्यूह में अभिमन्यु विद्यार्थी।” : मुरली मनोहर तिवारी (सीपू)

 

मुरली मनोहर तिवारी (सीपू), बीरगंज । शिक्षाविदों के अनुसार विद्या दो प्रकार की होती है। प्रथम वह, जो हमें जीवन-यापन के लिए अर्जन करना सिखाती है और द्वितीय वह, जो हमें जीना सिखाती है। इनमें से एक का भी अभाव जीवन को निरर्थक बना देता है।

बिना कमाए जीवन-निर्वाह संभव नहीं। कोई भी नहीं चाहेगा कि वह परावलंबी हो-माता-पिता, परिवार के किसी सदस्य, जाति या समाज पर। पहली विद्या से विहीन व्यक्ति का जीवन दूभर हो जाता है, वह दूसरों के लिए भार बन जाता है। साथ ही विद्या के बिना सार्थक जीवन नहीं जिया जा सकता। बहुत अर्जित कर लेनेवाले व्यक्ति का जीवन यदि सुचारु रूप से नहीं चल रहा, उसमें यदि वह जीवन-शक्ति नहीं है, जो उसके अपने जीवन को तो सत्यपथ पर अग्रसर करती ही है, साथ ही वह अपने समाज, जाति एवं राष्ट्र के लिए भी मार्गदर्शन करती है, तो उसका जीवन भी मानव जीवन का अभिधान नहीं पा सकता। वह भारवाही गर्दभ बन जाता है या पूँछ सींगविहीन पशु कहा जाता है।

वर्तमान में दूसरी विद्या का प्राय: अभाव दिखाई देता है, परंतु पहली विद्या का रूप भी विकृत ही है, क्योंकि न तो स्कूल कॉलेजों में शिक्षा प्राप्त करके निकला छात्र जीविकार्जन के योग्य बन पाता है और न ही वह उन संस्कारों से युक्त हो पाता है, जिनसे व्यक्ति कु से सु बनता है, सुशिक्षित, सुसभ्य और सुसंस्कृत कहलाने का अधिकारी होता है।

वर्तमान शिक्षा-पद्धति के अंतर्गत हम जो विद्या प्राप्त कर रहे हैं, उसकी विशेषताओं को सर्वथा नकारा भी नहीं जा सकता। यह शिक्षा कुछ सीमा तक हमारे दृष्टिकोण को विकसित भी करती है. हमारी मनीषा को प्रबुद्ध बनाती है तथा भावनाओं को चेतन करती है, किंतु कला, शिल्प, प्रौद्योगिकी आदि की शिक्षा नाममात्र की होने के फलस्वरूप इस देश के स्नातक के लिए जीविकार्जन टेढ़ी खीर बन जाता है और बृहस्पति बना युवक नौकरी की तलाश में अर्जियाँ लिखने में ही अपने जीवन का बहुमूल्य समय बर्बाद कर लेता है।

जीवन के सर्वागीण विकास को ध्यान में रखते हुए यदि शिक्षा के क्रमिक सोपानों पर विचार किया जाए, तो विद्यार्थी को सर्वप्रथम इस प्रकार की शिक्षा दी जानी चाहिए. जो आवश्यक हो, दूसरी जो उपयोगी हो और तीसरी जो हमारे जीवन को परिष्कृत एवं अलंकृत करती हो। ये तीनों सीढ़ियाँ एक के बाद एक आती हैं, इनमें व्यतिक्रम नहीं होना चाहिए। इस क्रम में व्याघात आ जाने से मानव-जीवन का चारु प्रासाद खड़ा करना असंभव है। यह तो भवन की छत बनाकर नींव बनाने के सदृश है। वर्तमान में शिक्षा की अवस्था देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन दार्शनिकों ने अन्न से आनंद की ओर बढ़ने को जो विद्या का सार कहा था, वह सर्वथा समीचीन ही था।

वैदिकयुगीन एवं मध्ययुगीन शिक्षा व्यवस्था में शिक्षा के केवल दो ही स्तर थे-प्राथमिक एवं उच्च।  माध्यमिक शिक्षा का सूत्रपात करने का श्रेय यूरोपीय मिशनरियों को प्राप्त है। उन्होंने 18वीं शताब्दी के अन्त में माध्यमिक स्कूलों की स्थापना की।

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माध्यमिक स्तर की शिक्षा वास्तव में शिक्षा के क्षेत्र में रीढ़  का कार्य करती है। जिस प्रकार रीढ़ मनुष्य के समस्त शरीर को सम्भाले रहती है, ठीस उसी प्रकार बच्चे के जीवन के निर्माण में इस स्तर की शिक्षा का विशेष महत्व है। यह ऐसी महत्वपूर्ण अवस्था है, जिसमें बालक में तीव्र शारीरिक व मानसिक परिवर्तन होते हैं तथा यह उच्च शिक्षा की आधारशिला भी कही जाती है। अतः माध्यमिक शिक्षा देश की जनशक्ति का स्रोत है, विश्वविद्यालयों का शैक्षिक स्तर एवं विद्यार्थियों में सीखने की क्षमता आदि बहुत कुछ माध्यमिक स्तर की शैक्षिक नींव पर निर्भर रहते हैं।

समाज की शिक्षा के किसी भी कार्यक्रम में माध्यमिक शिक्षा का महत्वपूर्ण स्थान होता है। यहाँ से प्राथमिक तथा वयस्क शिक्षा के लिये अध्यापक मिलते हैं। ये छात्रों को विश्वविद्यालयों तथा उच्चतर अध्ययन की दूसरी संस्थाओं के लिये तैयार करते है। माध्यमिक शिक्षा उच्च कोटि की होने पर ही यह आधुनिक युग की आवश्यकताओं को पूरा कर सकती है। अतः माध्यमिक शिक्षा का शिक्षा के क्षेत्र में बहुत महत्व है।

देश के भावी कर्णधार माध्यमिक शिक्षा के ही ढाँचे में बनते और बिगड़ते है। सभी क्षेत्रों में नेतृत्व करने की क्षमता इसी स्तर पर उत्पन्न की जाती है। दुर्भाग्यवश शिक्षा की यह कड़ी जितनी महत्वपूर्ण और अनिवार्य है उतनी ही निर्बल और उपेक्षित भी।

लोकतान्त्रिक देश में स्वस्थ नागरिक का विकास आवश्यक है। नागरिक का अर्थ अधिकारों व कर्तव्यों के ज्ञान के द्वारा अपने दायित्व को पूरा करना है। एक कुशल नागरिक ही देश को विभिन्न समस्याओं का समाधान कर सकता है।

प्राय: अधिकांश बालक माध्यमिक स्तर तक ही शिक्षा ग्रहण करते हैं। अतः इस स्तर पर शिक्षा का उत्तरदायित्व बालकों को लोकतांत्रिक नागरिक की शिक्षा देना है। लोकतंत्र की सफलता हेतु बोलने व लिखने की योग्यता आवश्यक है। अतः आदर्श नागरिकों में सामाजिकता, अनुशासन, सहयोग, सहिष्णुता, सच्ची देश भक्ति व विश्व नागरिकता के गुणों का विकास होना आवश्यक है।

वर्तमान शिक्षा पद्धति मुख्यतः पुस्तकीय व सैद्धान्तिक होने के कारण इसमें कार्यानुभव व श्रम के महत्व का कोई प्रावधान नहीं है। अत: देश में औद्योगीकरण को देखते हुए शिक्षा का प्रत्यक्ष सम्बन्ध उत्पादन से करने हेतु छात्रों की व्यावसायिक कुशलता का विकास किया जाना आवश्यक माना गया, ताकि छात्रों में तकनीकी कुशलता व क्षमता का विकास किया जा सके।

 शिक्षा के प्रयोगात्मक पक्ष को अधिक सबल बनाने की आवश्यकता अनुभव की गई। इससे उद्योगों व तकनीकी संस्थाओं में काम करने के लिये कुशल व प्रशिक्षित लोग मिल सकेंगे व देश के प्राकृतिक स्रोतों का अधिकतम लाभ उठा सकने के कारण देश की राष्ट्रीय आय में भी वृद्धि होगी तथा शिक्षा समाप्ति के बाद छात्रों को नौकरी के लिये भटकना नहीं पड़ेगा, क्योंकि व्यावसायिक शिक्षा उन्हें किसी एक निश्चित व्यवसाय को करने के लिये तैयार कर देगी।

शिक्षा द्वारा छात्रों में ऐसी रचनात्मक शक्तियों का विकास किये जाने की आवश्यकता अनुभव की गई, जिससे वह अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझ सके तथा उनके व्यक्तित्व का भी सर्वांगीण विकास हो सके। इसमें शारीरिक, मानसिक, नैतिक, बौद्धिक तथा आध्यात्मिक सभी प्रकार का विकास सम्मिलित है।

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अध्यापक को छात्रों के विकास के लिये इस प्रकार का स्वस्थ वातावरण विकसित करना चाहिये, जिससे छात्र अपनी रुचि के अनुसार सृजनात्मक क्रियाओं में भाग ले सकें तथा अपनी रचनात्मक क्षमताओं का सदुपयोग करके अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकें।

लोकतंत्र की सफलता हेतु उसके नागरिकों का अनुशासित रहना तथा उनमें नेतृत्व के गुणों का होना आवश्यक है। अतः शिक्षा का उद्देश्य भी विद्यार्थियों को अनुशासन के साथ-साथ नेतृत्व की भी शिक्षा प्रदान करना है। नेतृत्व का अर्थ नेतागीरी से नहीं है, बल्कि नेतृत्व का तात्पर्य उच्च शैक्षिक स्तर पर सामाजिक समस्याओं को स्पष्ट और गहन समझदारी तथा अधिकाधिक कुशलता से है। अत: छात्रों को कुशल नागरिकता का प्रशिक्षण आरम्भ से दिया जाए तथा स्वस्थ नागरिकों की आवश्यकता पूर्ति द्वारा प्रजातन्त्र को सफल बनाया जाए।

शिक्षा का मूल उद्देश्य चरित्र का निर्माण करना है, क्योंकि उच्च चरित्र ही मनुष्य की सबसे बड़ी विशेषता है। अतः विद्यालयों का यह दायित्व होना चाहिए कि वे छात्रों का विकास चारित्रिक व नैतिक आधारों पर करें। सचरित्र से अनेक सद्गुण में का विकास होता है, अत: हमें छात्रों के चरित्र निर्माण पर विशेष बल दे सके।

देश में  शिक्षा का विकास तीव्र गति से हुआ है। किन्तु इस विकास का प्रबन्ध केवल उसकी संख्यात्मक वृद्धि से है, गुणात्मक उन्नति से नहीं। समय-समय पर करने वाले प्रयासों के बावजूद न तो उसकी संरचना में कोई विशेष परिवर्तन हुआ है और न उसकी उयोगिता में कोई विशेष अभिवृद्धि। वह हमारी शिक्षा व्यवस्था की अब भी सबसे निर्बल कड़ी है।

वर्तमान शिक्षा वास्तविक जीवन से असम्बद्ध है। वह उन मूलभूत आवश्यकताओं के प्रति कोई ध्यान नहीं देती जिनकी पूर्ति प्रत्येक व्यक्ति अपने प्रौढ़ जीवन में चाहता है। इस प्रकार हमारी प्रचलित शिक्षा में अनेक दोषों और समस्याओं का समावेश हो गया। हम कुछ प्रमुख समस्याओं और उनके समाधान पर निम्नलिखित पंक्तियों में प्रकाश डाल रहे हैं-

हमारी  शिक्षा की उद्देश्यहीनता एक वयंसिद्ध सत्य है। माध्यमिक शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रों के केवल दो उद्देश्य होते हैं- उच्च शिक्षा की किसी संस्था में प्रवेश पाना या जीविकोपार्जन हेतु कोई छोटी-मोटी नौकरी प्राप्त करना।

उपर्युक्त दो उद्देश्यों में से किसी एक की प्राप्ति के लिये विद्यार्थीगण अपने सुख एवं स्वास्थ्य को आहुति देकर पुस्तकों को विषय सामग्री को कण्ठस्थ करने में अपना समय व्यतीत करते हैं और उनके अभिभावक अपने सुख एवं स्वास्थ्य पर धन व्यय न करके, उसे उनको दे देते हैं। किन्तु कि विद्यार्थियों को अपने उद्देश्य की प्राप्ति में असफलता मिलती है, वे एवं उनके अभिभावक दोनों भग्नाश का शिकार बनकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं।

शिक्षा को उपकारी एवं गुणकारी बनाने के लिये उसके उद्देश्यों को सतर्कता से निश्चित किया जाना परम आवश्यक है। उपयुक्त उद्देश्यों के अभाव में उसका सफल और सार्थक होना असम्भव है। यहाँ एक स्वाभाविक प्रश्न यह उपस्थित होता है कि  शिक्षा के उद्देश्य किस आधार पर निर्धारित किये जाने चाहिये ?

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शिक्षा स्वयं में पूर्ण होनी चाहिये और उसे छात्रों को उच्च शिक्षा के लिये तैयार करना चाहिये। उसे कुछ छात्रों को जीवन में प्रवेश करने के लिये और दूसरों को विश्वविद्यालय में प्रवेश करने के लिये तैयार करना चाहिये।

वर्तमान शिक्षा की एक नवीन जटिल समस्या देशव्यापी छात्र अनुशासनहीनता की है। इसके लिये छात्रों पर दोषारोपण करना, उनके प्रति असीम अन्याय करना है। इसका कारण यह है कि अनुशासनहीनता के लिये छात्र नहीं, वरन् अनेक शैक्षिक, आर्थिक एवं सामाजिक कारण उत्तरदायी हैं।

इन कारणों में सबसे अधिक गम्भीर हैं अनुपयुक्त पाठ्यक्रम, दोषपूर्ण परीक्षा प्रणाली, उद्देश्यहीन शिक्षा, सहशिक्षा का प्रचलन, जातीय पक्षपात, आर्थिक कठिनाइयाँ, सामाजिक मान्यताओं में परिवर्तन, छात्रों के प्रति अध्यापकों की उदासीनता, राजनीतिक दलों का छात्रों को प्रोत्साहन, कामोद्दीपक चलचित्र, अश्लील गीत-साहित्य इत्यादि। इन सब कारणों के फलस्वरूप छात्रों में अनुशासनहीनता की इतनी तीव्र गति से वृद्धि हो रही है कि छात्र-वर्ग, समाज के भाल पर कलंक की कालिमा को प्रतिदिन अधिक ही अधिक गहरा करता चला जा रहा है। यदि इस समस्या का तुरन्त समाधान नहीं किया गया तो वह असाध्य रोग बनकर हमारे देश के लिये दारुण दुःख का कारण बन सकती है।

देश में सर्वत्र विद्यमान छात्र अनुशासनहीनता की समस्या का समाधान करने के लिये 6 उपायों का सुझाव दिया जा सकता है।

पहला, माध्यमिक शिक्षा को दोषमुक्त करके, समयानुकूल बनाया जाये, ताकि वह वयस्क जीवन की आवश्यकताओं को पूर्ण कर सके।

दूसरा, छात्रों को अनुशासन का महत्त्व बताकर, उनके हृदय में अनुशासन के प्रति प्रेम एवं श्रद्धा जाग्रत की जाये।

तीसरा, छात्रों एवं शिक्षकों में पारस्परिक प्रेम एवं आदर को भावना जाग्रत करके, उनमें मधुर सम्बन्धों की स्थापना की जाये। शिक्षक:- सर नही गुरुदेव बनने का प्रयास करें।

चौथा, एक कानून बनाकर छात्रों को राजनीतिक आन्दोलन में भाग लेना दण्डनीय अपराध घोषित कर दिया जाए।

पाँचवीं, सरकार द्वारा कामुक साहित्य, गीतों और चलचित्रों पर कठोर प्रतिबन्ध लगा दिया जाये।

छठवाँ, विद्यालयों में प्रदान की जाने वाली शिक्षा में नैतिक सामग्री को समाविष्ट करने का प्रयास किया जाए।

स्कूलों में निर्देशन कार्यक्रमों का अभाव है। इन स्कूलों में निर्देशन न केवल छात्रों की दृष्टि से, वरन् शिक्षकों एवं प्रधानाचायों की दृष्टि से भी आवश्यक है। छात्रों की दृष्टि से इसलिये आवश्यक है, क्योंकि अपरिपक्व मस्तिष्क वाले होने के कारण वे अपनी क्षमताओं के अनुकूल पाठ्य विषयों का चयन करने में असमर्थ होते हैं। त्रुटिपूर्ण चयन का परिणाम होता है परीक्षा में उनकी असफलता, और असफलता अपव्यय का कारण बनती है। जहाँ तक शिक्षकों एवं प्रधानाचायों का प्रश्न है, निर्देशन उनको अपने छात्रों की अभिरुचियों एवं योग्यताओं का ज्ञान प्रदान करता है, जिससे उत्पन्न होकर वे उनकी शैक्षिक प्रगति में अधिक योग दे सकते हैं।

मुरली मनोहर तिवारी (सीपू)

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