दो कहानी-एक दर्द, सुरेश: निडर पत्रकार, जो सच्चाई के लिए शहीद हो गया
काठमांडू, 39 मार्च । काठमांडू के चंद्रागिरि में रहने वाले 34 वर्षीय सुरेश रजक एक जुझारू और निडर पत्रकार थे। जिस दिन वे राजावादी प्रदर्शन की रिपोर्टिंग के लिए निकले, उसी दिन उनके घर में भोज की तैयारी हो रही थी। उन्होंने अपने बड़े भाई दिनेश से वादा किया था कि वे जल्दी लौटेंगे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
सुरेश और उनके सहकर्मी अनिल रायमाझी तीनकुने में प्रदर्शन को कवर कर रहे थे। प्रदर्शन हिंसक हो गया और सुरेश एक इमारत के अंदर से इस घटना को रिकॉर्ड कर रहे थे। तभी भीड़ ने उस इमारत में आग लगा दी। अनिल ने उन्हें आग के बारे में इशारा करने की कोशिश की, लेकिन सुरेश तक वह संदेश नहीं पहुंच पाया। कुछ ही देर में आग विकराल हो गई और सुरेश उसमें फंस गए। दमकल और पुलिस की लापरवाही के कारण उन्हें बचाया नहीं जा सका।
सुरेश पहले मलेशिया में काम करते थे, लेकिन अपनी मां के निधन के बाद वे नेपाल लौट आए और पत्रकारिता को अपना करियर बनाया। वे हमेशा जोखिम भरे काम करने को तत्पर रहते थे और रिपोर्टिंग के दौरान सच्चाई को सामने लाने से पीछे नहीं हटते थे। उनके भाई दिनेश ने सरकार से उन्हें शहीद घोषित करने और दोषियों को सजा देने की मांग की है।
सविन: जो कभी राजनीति में नहीं था, लेकिन राजनीति ने उसकी जान ले ली
29 वर्षीय सविन महर्जन कीर्तिपुर के रहने वाले थे और काठमांडू-हेटौंडा रूट पर सुमो गाड़ी चलाते थे। शुक्रवार की सुबह वे अपनी गाड़ी को ठीक कराने के लिए निकले थे, लेकिन दोपहर में उनकी पत्नी भविषा को एक फोन आया जिसने उनकी दुनिया उजाड़ दी। फोन पुलिस ने उठाया और कहा, “आपके पति गंभीर हालत में हैं, अस्पताल आइए।” जब भविषा अस्पताल पहुंचीं, तो डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
सविन को तीनकुने में हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस की गोली लगी थी। पुलिस का कहना था कि प्रदर्शनकारियों ने हमला किया, इसलिए आत्मरक्षा में गोली चलाई गई, लेकिन सवाल यह उठता है कि सविन, जो कभी किसी राजनीतिक गतिविधि में शामिल नहीं थे, वहां पहुंचे ही कैसे? उनके परिवार को अब तक यह नहीं पता कि वे तीनकुने कैसे पहुंचे और पुलिस की गोली के शिकार क्यों बने।
सविन के घर में उनकी पत्नी भविषा और आठ साल की बेटी सुविषा थीं। वे परिवार के इकलौते कमाने वाले सदस्य थे। उनकी मौत के बाद पूरा परिवार सदमे में है। उनकी 75 वर्षीय दादी, जो दिल की मरीज हैं, इस घटना के बाद गंभीर रूप से बीमार हो गईं। सविन का परिवार सरकार से न्याय की मांग कर रहा है और उनका शव लेने से इनकार कर चुका है, जब तक कि सरकार उनकी मौत की जिम्मेदारी नहीं लेती।
एक जैसा अंत, अलग-अलग सफर
सुरेश और सविन का जीवन एक-दूसरे से बिल्कुल अलग था। एक पत्रकार था, तो दूसरा ड्राइवर। लेकिन दोनों की मौत राजनीति से जुड़ी हिंसा की भेंट चढ़ गई। एक ने सच्चाई दिखाने के प्रयास में जान गंवाई, तो दूसरा एक अनचाही परिस्थिति में फंसकर पुलिस की गोली का शिकार हो गया। दोनों परिवार न्याय की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन क्या सरकार उनकी आवाज सुनेगी?
एस. सुदर्शन


