पाकिस्तान ने शिमला संधि खत्म करने का लिया निर्णय, भारत पर क्या होगा असर ?
काठमान्डू 24अप्रैल
पहलगाम हमले के दूसरे दिन ही भारत के पीएम मोदी की अगुवाई में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की बैठक में सिंधु जल समझौता को रोकने जैसा कदम उठाया गया । इस निर्णय से पाकिस्तान को सीधा संदेश दिया गया कि इस बार भारत किसी भी प्रकार की रियायत करने के मूड में नहीं है । माेदी सरकार के कार्यकाल में पाकिस्तान काे दो बार मौका दिया जा चुका है कि वह सीमा पार से आतंकवाद पर लगाम लगाए। पर पाकिस्तान ने कभी सही कदम उठाने की काेशिश नहीं की है । पाकिस्तान आतंकवादियाें के लिए सुरक्षित जमीन मानी जाती है । पाकिस्तान हुक्मरान भारत के खिलाफ जहर उगलने से भी बाज नहीं आते हैं । पहले भी भारत-पाकिस्तान के बीच तीन-तीन युद्ध हो चुके हैं, लेकिन भारत ने कभी ऐसा कदम नहीं उठाया था । इस बार भारत का कडा रूख सामने दिख रहा है । अगर भारत ने अब यह फैसला किया है तो यह भविष्य में होने वाली कार्रवाई की एक आहट भर है। खासकर ऐसे समय में जब गर्मी के मौसम में पानी की सबसे ज्यादा आवश्यकता रहती है, भारत ने यह कदम उठाकर उसकी कमर तोड़ने का मन बना लिया है। इसलिए, अब अगला एक्शन क्या होगा इसका सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है।
भारत के इस फैसले से पाकिस्तान की कृषि अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ सकता है। यही कारण है कि वह बिलबिला गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे जल डेटा साझाकरण में रुकावट, फसल के मौसम में पानी की कमी और कृषि क्षेत्र को भारी नुकसान हो सकता है। हालांकि, इसका दीर्घकालिक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत पश्चिमी नदियों के पानी का पूरा इस्तेमाल करने के लिए कितने समय में बुनियादी ढांचा विकसित कर पाता है। इसमें एक दशक या उससे अधिक समय लग सकता है।
साथ ही पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सभी पाकिस्तानी नागरिकों के वीजा रद्द कर दिया है। भारत में मौजूद सभी पाकिस्तानी नागरिकों को 27 अप्रैल से पहले भारत छोड़ना होगा, उनका वीजा रद्द कर दिया गया है। पाकिस्तानी नागरिकों को जारी मेडिकल वीजा केवल 29 अप्रैल 2025 तक वैध रहेगा।
भारत के निर्णय के बाद पाकिस्तान का प्रतिउत्तर
भारत के उठाए गए कदम के बाद अब पाकिस्तान ने भी इसके बदले भारत के साथ 1972 में हुए शिमला समझौते को सस्पेंड करने का फैसला किया है। भारत के सिंधु जल समझौते पर एक्शन मोड के बाद पाकिस्तान ने भारतीय एयरलाइनों के लिए हवाई क्षेत्र बंद कर दिया है, साथ ही वाघा सीमा क्रॉसिंग भी बंद कर दी। इसके अलावा पाकिस्तान ने शिमला समझौते सहित सभी द्विपक्षीय समझौतों को निलंबित करने का निर्णय लिया है।
पाकिस्तान ने सिंधु जल समझौता तोड़ने को युद्ध के ऐलान जैसा बताया है। भारत के फैसले के जवाब में पाकिस्तान ने भारतीय उच्चायोग में राजनयिकों की संख्या घटा दी है। साथ ही भारत से व्यापार रोकने का ऐलान किया है। साथ ही कुल भूषण यादव को लेकर पाक ने भारत को धमकाते हुए याद दिलाया है कि ‘रॉ कमांडर’ कुलभूषण जाधव अब भी उनकी हिरासत में है और इसे भारत की राज्य प्रायोजित आतंकवादी गतिविधियों का प्रमाण बताया है।
शिमला संधि रद्द होने पर क्या हाेगा भारत पर असर ?
यहाँ यह सवाल उठता है कि भारत-पाकिस्तान के बीच हुए शिमला संधि काे यदि रद्द किया जाता है ताे भारत काे इसका कितना नुकसान उठाना पडेगा ? क्या पाकिस्तान के इस धमकी का असर भारत पर हाेगा ? विश्लेषकाें के अनुसार इस संधि का कुछ अधिक महत्तव नहीं रह गया है ।
भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के बीच हस्ताक्षरित शिमला समझौता (जिसे शिमला समझौता या शिमला संधि भी कहा जाता है) एक संधि थी जिसने उन सिद्धांतों को निर्धारित किया जो दोनों देशों के बीच भविष्य के द्विपक्षीय संबंधों को नियंत्रित करेंगे। इस पर 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के 8 महीने बाद 02 जुलाई 1972 को हस्ताक्षर किए गए थे, जिसके बाद पाकिस्तान का विभाजन हुआ और बांग्लादेश बना था।इस समझौते में वे कदम शामिल थे जो भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों के सामान्यीकरण को सुनिश्चित करने के लिए उठाए जाने थे। इस समझौते पर शिमला, हिमाचल प्रदेश के बार्न्स कोर्ट (राजभवन) में हस्ताक्षर किए गए।
शिमला समझौते के तहत भारत ने बांग्लादेश को मुक्त कराने के 1971 युद्ध के बाद आत्मसमर्पण करने वाले 93000 पाकिस्तानी युद्धबंदियों (POW) को रिहा कर दिया।
-भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर द्वारा नियंत्रित किया जाएगा।
-किसी भी मतभेद को शांतिपूर्ण तरीके से और द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से सुलझाया जाएगा और दोनों देशों के मामलों को किसी तीसरे प्लेटफॉर्म पर नहीं ले जाया जाएगा।
-दोनों देश एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करेंगे और एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
-1971 के युद्ध के बाद अंतर्राष्ट्रीय सीमा के एक-दूसरे की तरफ सेनाएं वापस बुलाई जाएंगी।
-17 दिसंबर 1971 (बांग्लादेश युद्ध के बाद) की युद्ध विराम रेखा का सम्मान किया जाएगा (और नियंत्रण रेखा के रूप में दोहराया जाएगा)।
संधि में कुछ अन्य शर्तें भी थीं जैसे संचार, टेलीग्राफ, डाक, एयरलाइन संबंधों में नई जान फूंकना। इसमें संस्कृति और विज्ञान के क्षेत्र में आदान-प्रदान करने की भी थी।
ऐसा कहा जाता है कि पाकिस्तान की करारी हार के बाद भारत के पास बातचीत का मजबूर पक्ष था, लेकिन इंदिरा गांधी और देश इसका फायदा उठाने में विफल रहा। भारत पाकिस्तान के साथ सीमा समस्या के लिए एक निश्चित समाधान के लिए दबाव बना सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया और युद्धबंदियों की स्थिति का लाभ उठाने में विफल रहा।
देखा जाए ताे शिमला समझौते ने भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों को बेहतर बनाने में कुछ खास मदद नहीं की और ना ही भारत को इससे कोई फायदा हुआ है। क्याेंकि सीमा का सम्मान करने की शर्त का उल्लंघन 1999 में ही पाकिस्तान ने कारगिल युद्ध के साथ कर दिया था। कश्मीर जैसे मामलों को दोनों देशों के बीच हल करने की शर्त का भी कुछ खास महत्व नहीं है क्योंकि धारा-370 के बाद अब भारत इन बातों को पहले ही खारिज कर चुका है और दुनिया में समर्थन जुटाने में भी पाकिस्तान को बहुत ज्यादा सफलता हाथ नहीं लगी।
ऐसे में शिमला समझौते से पाकिस्तान के पीछे हटने का भारत पर कोई बुरा असर पड़ने की बहुत कम संभावना है। शिमला समझौते ने दोनों देशों के बीच संबंधों में कुछ खास मदद नहीं की।


