नेपाल की राजनीति में गठबंधन सरकार पर मंडराता संकट
साभार रातोपाटी
काठमांडू: नेपाल की राजनीति में हाल के दिनों में अनिश्चितता और आशंकाओं का माहौल गहराता जा रहा है। सत्तारूढ़ एमाले-कांग्रेस गठबंधन के भविष्य को लेकर सवाल उठ रहे हैं, और नई गठबंधन की संभावनाओं के साथ सरकार परिवर्तन की अटकलें तेज हो गई हैं। प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं के बयानों और घटनाक्रमों ने इन आशंकाओं को और बल दिया है।
देउवा की बैंकॉक यात्रा और बढ़ती आशंकाएँ
नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष और गठबंधन के प्रमुख सहयोगी शेरबहादुर देउवा की हालिया बैंकॉक यात्रा ने सियासी हलकों में हलचल मचा दी है। एमाले के एक शीर्ष नेता ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि देउवा की इस यात्रा ने सरकार के भविष्य को लेकर कई शंकाएँ पैदा की हैं। आशंका है कि देउवा ने बैंकॉक में विदेशी ताकतों से संपर्क किया हो सकता है, और इसकी जानकारी प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली तक भी पहुँची है। हालाँकि, यह स्पष्ट नहीं है कि देउवा ने किन विदेशी ताकतों से बात की।
देउवा शुक्रवार को स्वदेश लौट चुके हैं। काठमांडू के त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने गठबंधन में बदलाव की खबरों से अनभिज्ञता जताई। उन्होंने कहा, “समीकरण बदलने की बात किसने कही, मुझे नहीं पता। गठबंधन मजबूत है, कुछ नहीं हुआ है।” हालाँकि, उनकी अपनी पार्टी के नेताओं के बयान और सरकार की कार्यशैली पर उनकी आलोचना इस बात का संकेत देती है कि वे पूरी तरह अनजान नहीं हैं।
गठबंधन में बढ़ता तनाव
नेपाली कांग्रेस के महामंत्री गगन थापा ने गुरुवार को एक कार्यक्रम में कहा कि अगर सरकार अपनी कार्यशैली नहीं सुधारती, तो कांग्रेस सरकार से बाहर होने का फैसला ले सकती है। उन्होंने कहा, “हमें आधारभूत मुद्दों पर समझौता नहीं करना चाहिए। जरूरत पड़ी तो हम इस सरकार से बाहर निकल जाएँगे।” थापा का यह बयान गठबंधन में बढ़ते असंतोष को दर्शाता है।
वहीं, प्रमुख विपक्षी दल माओवादी केंद्र के अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचंड’ ने भी अपनी पार्टी की संसदीय बैठक में संकेत दिया कि ओली के नेतृत्व वाली सरकार ज्यादा दिन नहीं टिकेगी। उन्होंने कहा कि देउवा के स्वदेश लौटने के बाद कांग्रेस के साथ सहयोग पर चर्चा होगी। माओवादी के उपमहासचिव वर्षमान पुन ने भी कहा कि हालाँकि उनकी पार्टी 2084 तक सरकार में शामिल होने की योजना नहीं बना रही, लेकिन परिस्थितियाँ बदलने पर ऐसा करना पड़ सकता है।

ओली का ध्यान ‘मिशन-2084’ पर
प्रधानमंत्री और एमाले अध्यक्ष केपी शर्मा ओली भी गठबंधन की स्थिरता को लेकर आश्वस्त नहीं दिख रहे। गुरुवार को काठमांडू में ‘यूथ सेलिब्रेशन’ कार्यक्रम में उन्होंने कार्यकर्ताओं से सरकार की चिंता छोड़कर 2084 के आम चुनाव की तैयारी करने को कहा। उन्होंने कहा, “यह सरकार स्थिरता और स्थायित्व के लिए बनी है। सरकार की चिंता न करें, 2084 के चुनाव पर ध्यान दें।” ओली का यह बयान दर्शाता है कि उनकी प्राथमिकता अपनी सरकार को बचाने से ज्यादा अगले चुनाव में एमाले को सबसे बड़ी पार्टी बनाने की है।
हालाँकि, एमाले सचिव गोकर्ण बिष्ट ने इन अटकलों को खारिज करते हुए कहा कि सरकार सहमति के आधार पर चल रही है और किसी भी कमी को संयुक्त तंत्र के जरिए हल किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि अगले 14-15 महीनों में सरकार का नेतृत्व देउवा को सौंपा जाएगा, जैसा कि सहमति में तय हुआ है।
कांग्रेस का आधिकारिक रुख
कांग्रेस के मुख्य सचेतक श्यामकुमार घिमिरे ने शुक्रवार को प्रतिनिधि सभा में कहा कि उनकी पार्टी एमाले के साथ हुए समझौते का पूरी तरह पालन करेगी। उन्होंने सरकार परिवर्तन की अफवाहों को अस्थिरता पैदा करने की साजिश करार दिया। हालाँकि, उनके इस बयान को गठबंधन में मौजूद तनाव को कम करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
नेपाल की मौजूदा राजनीतिक स्थिति अनिश्चितता से भरी हुई है। गठबंधन के भीतर बढ़ता अविश्वास, नेताओं के परस्पर विरोधी बयान, और सरकार की कार्यशैली पर असंतोष ने सत्ता समीकरण को कमजोर किया है। देउवा की बैंकॉक यात्रा और प्रचंड के बयानों ने इन आशंकाओं को और हवा दी है। अगले कुछ दिनों में देउवा और अन्य नेताओं के बीच होने वाली चर्चाएँ इस संकट को सुलझाने या इसे और गहराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगी। तब तक, नेपाल की जनता और राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर नजर रखे हुए हैं कि क्या यह गठबंधन टिक पाएगा या नया सियासी समीकरण सामने आएगा।

