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नेपाल की संविधान सभा और केजरीवाल की जीत

dibesh jha
 
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देवेश झा

देवेश झा:भारत में दिल्ली विधानसभा का चुनाव हाल ही में सम्पन्न हुआ है । कुल ७० सीटों वाली विधानसभा में अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्ववाली “आप” पार्टी ने ६७ सीटों पर विजय प्राप्त करके कीर्तिमान हासिल किया है । भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को सिर्फ ३ सीटों में सीमित होना पड़ा है । इस प्रचण्ड बहुमत का आकलन करने में चुनावी विश्लेषक एवं चुनावपूर्व किये गये मीडिया प्रायोजित लगभग सभी सर्वेक्षण गलत साबित हुए हैं । जहाँ आप पार्टी को ५४% मत प्राप्त हुए हैं वहीं भाजपा को भी पिछले चुनाव से अधिक अर्थात ३३ % मत प्राप्त हुए हैं । काँग्रेस पार्टी १०% में सिमट गई है । मत परिणामों की समीक्षा और भी कई प्रश्न खड़े कर रही है । मसलन ५४ % वोट पाने वाली “आप” पार्टी को ९५% सीटों पर जीत हासिल हुई है । इसी प्रकार ३३% वोट पाने के बावजूद भाजपा को सिर्फ ५% सीट प्राप्त है । कांग्रेस समर्थक मतदाता की संख्या १०% होते हुए भी यह पार्टी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने में नाकाम रही है । भारत में कुछ विश्लेषक इसे निर्वाचन प्रणाली की असफलता के रूप में देख रहे हैं । जो भी हो दिल्ली के इस निर्वाचन को लेकर नेपाल में जमकर बहस हुई है । काठमाण्डू से प्रकाशित लगभग सभी राष्ट्रीय अखबारों ने इसे प्रमुखता से छापा है । कुछ को इस परिणाम का कारण भाजपा के नेताओं में बढ़ा हुआ अहंकार दिखा तो कुछ ने केजरीवाल की अपार लोकप्रियता को इस जीत का कारण बताया है । बहरहाल नेपाली संचार माध्यम द्वारा भारत के प्रान्तीय चुनाव के बारे में दिखाई गई यह अभिरुचि सराहनीय है ।
भारत में हुए इस प्रान्तीय निर्वाचन ने भारतीय लोकतन्त्र की विशेषता को एक बार पुनः स्थापित कर दिया है । लोकसभा निर्वाचन के परिणामों से क्षुब्ध समूह के लिए यह एक राहत की बात है । साथ ही मोदीलहर की स्वप्निल दुनिया में सोये हुए के लिये नींद से जागने का अवसर । परन्तु नेपाली राजनीति के लिये यह एक मार्गदर्शक परिणाम है । संघीयता से भयभीत समुदाय के लिये यह एक निश्चिन्तता के रूप में लिया जाने योग्य विषय है । एकल राज्य संरचना के एक पक्षीय परिणाम और उससे विजित समूह में आनेवाले सम्भावित अहंकार को रोकने का यह एक उपक्रम हो सकता है । दूसरे संविधान सभा निर्वाचन के साथ ही नेपाल अपने संविधान निर्माण के क्रम में है । एक सच्चे मित्र एवं पड़ोसी की हैसियत से भारत ने संविधान निर्माण के इस जटिल परन्तु अनिवार्य कार्यसिद्घि के लिये अपने अनुभवों से नेपाल को समय–समय पर अवगत कराया ही है । चाहे वह भारतीय प्रधानमंत्री सम्माननीय नरेन्द्र मोदीजी का नेपाल की व्यवस्थापिका संसद में ऋषि मन की आवश्यकता के लिये किया गया आग्रह हो या सार्क सम्मेलन के अवसर पर सहमति के लिये नेपाली नेताओं का ध्यानाकर्षण, इन सबके पीछे नेपाल को किसी भी प्रकार की दीर्घकालीन जटिलता से बचाना ही मूल ध्येय रहा है ।
नेपाल की राजनीति के पिछले घटनाक्रमों से यह स्पष्ट हो गया है कि संविधान निर्माण में मूल बाधा राज्य की आन्तरिक पुनर्संरचना अथवा संघीयता के प्रश्न को लेकर ही है । इस विषय पर सत्ता और विपक्ष के बीच परस्पर अविश्वास एवं संशय चरम बिन्दु पर है । सत्तापक्ष संघीयता को देश की एकता और अखण्डता के लिये खतरनाक देखता है तो वहीं विपक्ष के लिये यह राज्य संचालन में समानुपातिक भागीदारी का माध्यम है । पुरानी राजशाही द्वारा अपनी सत्ता को मजबूत बनाने हेतु जिस प्रशासनिक संरचना का निर्माण किया था, उसका लाभ वस्तुतः एक विशेष समुदाय को अधिक प्राप्त होने के कारण यह जटिलता उत्पन्न हो गई है । सत्तापक्षीय दलों में एक विशेष समुदाय की बाहुल्यता के कारण ही विपक्ष सशंकित है । इसके साथ ही सत्ताधारी दल के नेताओं की वाचाल प्रवृत्ति और अतिरंजित कटाक्ष के कारण भी विपक्ष चिढ़ा हुआ है । ऐसी अवस्था में जब माहौल अविश्वासपूर्ण हो तो सभी पक्षों का संयमित होना जरूरी है ।
तर्कहीन निर्णय राजनीति को जटिल बनाता है । दुर्भाग्यवश नेपाल में अक्सर होने वाले निर्णयों के पीछे तर्क का अभाव होता है । १२ सूत्रीय समझदारी के बाद जब माओवादियों को मूलधार की राजनीति में लाने के नाम पर तत्कालीन प्रतिनिधि सभा में एमाले के बराबर सीटें दी गई तो इसके लिये कोई तर्क नहीं दिया गया । सर्वोच्च अदालत ने पहले संविधान सभा के कार्यकाल को दो बार बढ़ाये जाने पर कोई एतराज नहीं जताया पर वहीं तीसरी बार कार्यकाल का बढ़ाया जाना सर्वोच्च को नागवार लगा और उसने संविधान सभा की आयु तय कर दी । हाल ही में संविधान सभा में हुए उठापटक  के बाद सभामुख महोदय ने स्वयं ही प्रस्ताव को पढ़ते हुए पारित भी कर दिया । खतरनाक परिणाम यह है कि अब भविष्य में कोई भी सभामुख सरकारी प्रस्तावों को ऐसे ही पारित करवा लिया करेंगे ।
जरूरी है समझदारी की और उसके लिये भी सत्तापक्ष की जवाबदेही अधिक है । संविधान सभाद्वारा संविधान का निर्माण परिवर्तन को स्थापित करने के लिये है । इसी प्रकार संघीयता मधेस विद्रोह का प्रमुख एजेण्डा था,  जिसे तत्कालीन नेपाल सरकार ने स्वीकार कर अन्तरिम संविधान में दर्ज करवाया । इन प्रतिबद्धताओं से मुकरना राजनीतिक विश्वासघात होगा और देर सवेर इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है । दूसरी संविधान सभा ने जनादेश परिवर्तित किया है, कार्यादेश नहीं । बहुमत के दम्भ का परिणाम दिल्ली विधानसभा के निर्वाचन में दिख ही चुका है । अगर मोदीलहर पर प्रश्नचिन्ह लगने में देर नहीं लगा तो यह समझना बेहतर होगा कि नेपाल भी उसी प्रकार की सामाजिक संरचनावाला देश है ।

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